अरुणाचल प्रदेश की हरी-भरी घाटियों में इन दिनों एक बड़ा तनाव चल रहा है। एक तरफ चीन तिब्बत की ब्रह्मपुत्र नदी पर दुनिया का सबसे बड़ा बांध बना रहा है। इस बांध को भारत के खिलाफ वाटर बम के रूप में देखा जा रहा है। चीन कभी भी इस बांध के जरिए भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में अचानक कृत्रिम बाढ़ ला सकता है या पानी रोक सकता है। इस खतरे से निपटने के लिए भारत सरकार ने भी अरुणाचल प्रदेश में एक बड़ा काउंटर प्लान तैयार किया है। सरकार यहां सियांग नदी पर एक विशाल जलविद्युत और बांध परियोजना बनाना चाहती है।
लेकिन इस योजना के सामने एक बहुत बड़ी स्थानीय दीवार खड़ी हो गई है। अरुणाचल प्रदेश का प्रमुख आदिवासी समुदाय 'आदि' इस प्रोजेक्ट का डटकर विरोध कर रहा है। आदि समुदाय के लोगों का कहना है कि यह बांध उनकी जीवन रेखा को ही खत्म कर देगा। सियांग नदी उनके लिए सिर्फ पानी का स्रोत नहीं है, बल्कि उनकी संस्कृति और पहचान का मुख्य हिस्सा है। समुदाय के बुजुर्गों और युवाओं का एक ही सवाल है कि अगर चीन के खतरे से बचना है, तो क्या इसके लिए उनकी अपनी ही जमीन को डुबो दिया जाए। विरोध प्रदर्शनों का दौर लगातार तेज हो रहा है और लोग प्रशासन के सामने अपनी नाराजगी खुलकर जता रहे हैं।
सियांग नदी पर बन रहे मेगा प्रोजेक्ट से क्यों सहमा है आदि समुदाय
आदि समुदाय के लोगों की मुख्य चिंता उनके पारंपरिक घरों और उपजाऊ जमीनों का उजड़ना है। इस नए डिफेंस प्रोजेक्ट के तहत भारी-भरकम निर्माण कार्य होना है। इसके लिए पहाड़ों को काटा जा रहा है और सुरंगें बनाई जा रही हैं। स्थानीय लोगों का डर है कि बड़े पैमाने पर होने वाले इन विस्फोतों से इलाके में भूस्खलन का खतरा बहुत बढ़ जाएगा। इसके अलावा, बांध बनने से सियांग नदी का प्राकृतिक प्रवाह रुक जाएगा। नदी का पानी थमने से मछलियां और जलीय जीव खत्म हो जाएंगे। जिन लोगों की आजीविका पूरी तरह नदी और जंगल पर टिकी है, उनके सामने रोजी-रोटी का बहुत बड़ा संकट खड़ा हो जाएगा।
समुदाय के नेताओं का यह भी कहना है कि सरकार ने इस प्रोजेक्ट को शुरू करने से पहले उनसे कोई ठोस बातचीत नहीं की। ग्राम सभाओं की अनुमति के बिना इतने बड़े प्रोजेक्ट की रूपरेखा तैयार कर दी गई। आदि समुदाय के युवा संगठनों का साफ कहना है कि वे अपनी आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के साथ कोई समझौता नहीं करेंगे। उनका विरोध इस बात को लेकर भी है कि विकास के नाम पर हमेशा आदिवासियों को ही अपनी जमीन और जंगल क्यों छोड़ने पड़ते हैं। प्रशासन और सरकार के नुमाइंदे लगातार उन्हें समझाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन स्थानीय लोग अपनी मांगों पर पूरी तरह अड़े हुए हैं।
क्या हैं आदि समुदाय की मुख्य मांगें और आगे का रास्ता
आदि समुदाय और स्थानीय संगठनों ने सरकार के सामने कुछ बहुत स्पष्ट मांगें रखी हैं। उनकी सबसे पहली मांग है कि सियांग नदी पर बनने वाले इस मेगा डैम प्रोजेक्ट को तुरंत प्रभाव से रद्द किया जाए। उनका कहना है कि अगर देश की सुरक्षा के लिए सीमा पर कोई ढांचागत बदलाव जरूरी भी है, तो आदिवासियों की सहमति और उनके हितों की रक्षा के बिना कोई काम नहीं होना चाहिए। समुदाय चाहता है कि सरकार विकल्प के तौर पर किसी दूसरे तकनीकी रास्ते पर विचार करे जिससे नदी का प्राकृतिक रूप सुरक्षित रहे और स्थानीय लोगों को विस्थापन का दर्द न झेलना पड़े।
दूसरी तरफ, भारत सरकार के रणनीतिक विशेषज्ञों और रक्षा जानकारों का मानना है कि चीन के नापाक इरादों को रोकने के लिए यह जल कवच बेहद जरूरी है। यदि भारत ने समय रहते सियांग नदी पर पानी रोकने और नियंत्रित करने की क्षमता नहीं विकसित की, तो भविष्य में पूर्वोत्तर भारत गंभीर जल संकट या अचानक बाढ़ की चपेट में आ सकता है। राष्ट्रीय सुरक्षा और स्थानीय आदिवासियों के अधिकारों के बीच इस टकराव ने एक पेचीदा स्थिति पैदा कर दी है। जिला प्रशासन स्थिति पर पैनी नजर रखे हुए है और बातचीत के जरिए इस गतिरोध को सुलझाने के प्रयास जारी हैं ताकि देश की सुरक्षा भी बनी रहे और स्थानीय आदिवासियों के हक सुरक्षित रहें।











