मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ किसानों का बड़ा ऐलान
देश की राजधानी दिल्ली एक बार फिर बड़े किसान आंदोलन की आहट से सुगबुगा उठी है। संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) के बैनर तले विभिन्न किसान संगठनों ने आगामी 23 अक्टूबर को दिल्ली कूच करने का ऐलान किया है। इस विरोध प्रदर्शन का मुख्य केंद्र मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा है। किसानों का आरोप है कि मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताएं बरती जा रही हैं, जिससे लोकतांत्रिक प्रणाली की निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं।
शुक्रवार को आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में किसान नेताओं ने इस आगामी आंदोलन की रूपरेखा साझा की। अखिल भारतीय किसान सभा के वरिष्ठ नेताओं ने दो टूक शब्दों में कहा कि प्रशासनिक रोक या पाबंदियां किसानों के बुलंद हौसलों को नहीं डिगा सकतीं। देश के अलग-अलग कोनों से आने वाले अन्नदाता जंतर-मंतर और आसपास के इलाकों में अपनी मांगों को लेकर मुखर होने की तैयारी कर चुके हैं।
मतदाता सूची पुनरीक्षण में अनियमितताओं का आरोप
किसान संगठनों का मुख्य रोष मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर प्रक्रिया को लेकर है। एसकेएम का दावा है कि इस पूरी प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर धांधली और कमियां छोड़ी जा रही हैं, जिससे आम नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों पर सीधा असर पड़ रहा है। किसानों का तर्क है कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की निष्पक्षता सर्वोपरि होनी चाहिए, लेकिन मौजूदा कार्यप्रणाली ने संदेह पैदा कर दिया है।
इसी मुद्दे को आधार बनाते हुए किसान संगठन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को उनके पद से हटाने की मांग कर रहे हैं। आंदोलन की तैयारी से जुड़े जानकारों का मानना है कि यह विरोध प्रदर्शन आने वाले दिनों में राजनीतिक सरगर्मी को काफी तेज कर सकता है। ग्रामीण इलाकों से लेकर शहरी चौपालों तक इस मुद्दे पर चर्चाएं शुरू हो चुकी हैं, और किसान अपनी इस मांग को लेकर पूरी तरह अडिग नजर आ रहे हैं।
देशभर के जिला मुख्यालयों पर भी गूंजेगी आवाज
महज दिल्ली तक ही सीमित न रहकर, इस आंदोलन की आंच देश के कोने-कोने तक पहुंचाई जाएगी। संयुक्त किसान मोर्चा की रणनीति के तहत 23 अक्टूबर को केवल दिल्ली कूच ही नहीं होगा, बल्कि देश भर के तमाम जिला, तहसील और ब्लॉक मुख्यालयों पर भी एक साथ विरोध प्रदर्शन आयोजित किए जाएंगे। स्थानीय स्तर पर ज्ञापन सौंपकर प्रशासन और केंद्र सरकार तक किसानों की नाराजगी साफ तौर पर पहुंचाई जाएगी।
इस राष्ट्रव्यापी अभियान को और व्यापक बनाने के लिए किसानों ने समाज के अन्य वर्गों से भी समर्थन मांगा है। श्रमिक संगठनों से लेकर छात्र संघों और महिलाओं को भी इस मुहिम से जोड़ा जा रहा है। किसान नेताओं का कहना है कि यह लड़ाई सिर्फ किसानों की नहीं, बल्कि देश के हर उस नागरिक की है जो लोकतांत्रिक मूल्यों और निष्पक्ष व्यवस्था में विश्वास रखता है।
"एसआईआर के खिलाफ यह देश के सबसे बड़े संघर्षों में से एक होने जा रहा है। सरकार और प्रशासन हमारे लोकतांत्रिक अधिकारों को कुचलने की जितनी भी कोशिश कर लें, किसान पीछे हटने वाले नहीं हैं। हम अपनी मांगों पर पूरी तरह कायम हैं।" — अशोक धवले, अध्यक्ष, अखिल भारतीय किसान सभा
दमनकारी नीतियों के खिलाफ आर-पार की लड़ाई का आह्वान
किसान नेताओं ने यह भी चेतावनी दी है कि यदि प्रशासन ने आंदोलन को रोकने के लिए बल प्रयोग किया या दमनकारी नीतियां अपनाईं, तो उसका कड़ा जवाब दिया जाएगा। जंतर-मंतर के आसपास प्रदर्शनों पर लगाई गई कड़ी पाबंदियों के बावजूद किसानों का जोश ठंडा नहीं पड़ा है। उनका साफ कहना है कि शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखना उनका संवैधानिक अधिकार है और वे पीछे हटने का कोई विचार नहीं रखते।
इसके साथ ही, किसानों ने आने वाले महीनों में अन्य राष्ट्रीय मुद्दों जैसे व्यापार समझौतों के खिलाफ भी बड़े आंदोलन की चेतावनी दी है। कुल मिलाकर, अक्टूबर का यह महीना प्रशासनिक गलियारों और राजनीतिक हलकों के लिए बेहद सुगबुगाहट भरा रहने वाला है, जहां एक तरफ चुनाव आयोग सवालों के घेरे में है, तो दूसरी तरफ अन्नदाता एक बार फिर सड़क पर उतरने को पूरी तरह तैयार हैं।












