नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश के वित्तीय बाजार में अमेरिकी डॉलर को लेकर हलचल तेज हो गई है। प्राइवेट सेक्टर का बड़ा बैंक आईसीआईसीआई बैंक अब रिजर्व बैंक की स्वैप योजना के तहत विदेशी मुद्रा में कर्ज जुटाने की तैयारी कर रहा है। बैंक का यह कदम ऐसे समय में सामने आया है जब देश के विदेशी मुद्रा भंडार और रुपये की सेहत पर लगातार चर्चा हो रही है। इस प्रक्रिया से बाजार में डॉलर की मांग और आपूर्ति का संतुलन साधने में मदद मिलने की उम्मीद है।
दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर डॉलर की ताकत लगातार बनी हुई है और वैश्विक अर्थव्यवस्था में इसकी कूटनीति का असर साफ दिख रहा है। अमेरिकी मुद्रा के मजबूत होने से दुनिया भर की उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं पर दबाव बढ़ गया है। भारत में भी इसका असर दिखने लगा है और आयातकों के लिए विदेशी सामान खरीदना महंगा हो गया है। जानकारों का कहना है कि वैश्विक बाजार में हो रहे बदलावों का सीधा असर आम आदमी की जेब पर भी पड़ता है।
आईसीआईसीआई बैंक और रिजर्व बैंक की नई योजना
भारतीय रिजर्व बैंक की स्वैप खिड़की के जरिए बैंकों को विदेशी मुद्रा बाजार में स्थिरता बनाए रखने में मदद मिलती है। आईसीआईसीआई बैंक के इस कदम से दूसरे बैंकों को भी विदेशी बाजारों से सस्ते ब्याज दरों पर कर्ज जुटाने का रास्ता मिलेगा। बैंक इस विदेशी फंड का इस्तेमाल अपने व्यापारिक कामकाज और बड़ी कंपनियों को कर्ज देने के लिए करेंगे। जानकारों का मानना है कि इससे घरेलू बाजार में नकदी की स्थिति बेहतर होगी और डॉलर की कमी से जूझ रहे क्षेत्रों को राहत मिलेगी।
लेकिन इस पूरी प्रक्रिया के बीच बैंकिंग सेक्टर के सामने कुछ बड़ी चुनौतियां भी खड़ी हैं। विदेशी कर्ज लेने पर विनिमय दर का जोखिम हमेशा बना रहता है क्योंकि अगर रुपया कमजोर होता है तो कर्ज चुकाना महंगा हो जाता है। बैंक इस जोखिम से निपटने के लिए पहले से ही हेजिंग यानी सुरक्षा उपाय कर रहे हैं। रिजर्व बैंक भी पूरी स्थिति पर कड़ी नजर बनाए हुए है ताकि वित्तीय बाजार में किसी तरह की अफरातफरी न मचे।
रुपये में गिरावट और विशेषज्ञों की चेतावनी
ब्लूमबर्ग की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक कुछ वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये का गिरकर 100 के स्तर तक पहुंचना एक तयशुदा बात लग रही है। हालांकि रिजर्व बैंक लगातार बाजार में दखल देकर रुपये को संभालने की कोशिश कर रहा है, लेकिन वैश्विक दबाव इतना ज्यादा है कि गिरावट को रोक पाना मुश्किल हो रहा है। कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और विदेशी निवेशकों द्वारा भारतीय बाजार से पैसा निकालना भी रुपये की कमजोरी की बड़ी वजहें हैं।
यदि रुपया और ज्यादा कमजोर होता है तो देश में पेट्रोल, डीजल, खाने का तेल और इलेक्ट्रॉनिक सामान महंगे हो जाएंगे। इसका सीधा असर आम आदमी के महीने के बजट पर पड़ेगा और महंगाई दर ऊपर जा सकती है। सरकार और केंद्रीय बैंक दोनों मिलकर इस बात की कोशिश कर रहे हैं कि गिरावट की रफ्तार धीमी रहे ताकि अर्थव्यवस्था को अचानक कोई बड़ा झटका न लगे।
वैश्विक तकनीक और भविष्य का आर्थिक बाजार
केवल बैंकिंग और मुद्रा तक ही बात सीमित नहीं है बल्कि तकनीक की दुनिया में भी डॉलर का दबदबा कायम है। एंथ्रोपिक और ब्लैकस्टोन जैसी बड़ी वैश्विक कंपनियां अब एआई तकनीक के अगले दौर में खरबों डॉलर के निवेश की तैयारी कर रही हैं। यह निवेश केवल मॉडल बनाने पर नहीं बल्कि उन्हें जमीन पर उतारने और लागू करने पर केंद्रित है। तकनीक के इस नए दौर में भी अमेरिकी डॉलर ही मुख्य भुगतान और निवेश का जरिया बना हुआ है।
द फ्रीलान्स की ग्राउंड पड़ताल बताती है कि आने वाले महीनों में भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए विदेशी मुद्रा का प्रबंधन सबसे बड़ी प्राथमिकता रहने वाला है। एक तरफ जहां बैंकों को डॉलर जुटाने के लिए नए रास्ते तलाशने होंगे, वहीं दूसरी तरफ रुपये को बचाने के लिए नीतिगत मोर्चे पर कड़े फैसले लेने होंगे। आम नागरिकों को भी आने वाले समय में महंगाई के मोर्चे पर सतर्क रहने की जरूरत है क्योंकि वैश्विक मुद्रा बाजार की हलचल अब सीधे रसोई और बाजार तक पहुंच रही है।






