नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों में इस समय भारत की एक नई और बहुत बड़ी भूमिका की चर्चा हो रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव जीतने के बाद से ही डोनाल्ड ट्रंप लगातार यह दावा कर रहे थे कि वे रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध को कुछ ही दिनों में खत्म करवा देंगे। लेकिन ट्रंप और उनकी टीम इस मोर्चे पर लगातार नाकाम साबित हुई और कोई ठोस शांति समझौता सामने नहीं आ सका। अब इस बीच भारत ने एक ऐसा कूटनीतिक दांव चला है जिसने दुनिया भर के बड़े देशों को हैरान कर दिया है। भारत ने पुतिन और जेलेंस्की दोनों के साथ अपने मजबूत संबंधों का इस्तेमाल करते हुए युद्ध रोकने का एक नया प्रस्ताव पेश किया है।
द फ्रीलान्स की टीम द्वारा जुटाई गई जानकारी के मुताबिक, भारत की यह नई पहल केवल युद्ध रोकने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दोनों देशों के बीच स्थायी शांति की एक मजबूत रूपरेखा तैयार करती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले भी कई बार यह बात दोहराई थी कि यह युग युद्ध का नहीं है और हर विवाद का समाधान केवल बातचीत के जरिए ही निकल सकता है। जब पश्चिमी देश और अमेरिका रूस पर लगातार कड़े प्रतिबंध लगा रहे थे और अमेरिकी सीनेट में रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर सौ फीसदी टैरिफ लगाने जैसे दबाव के बिल पास हो रहे थे, तब भारत ने अपनी स्वतंत्र विदेश नीति का परिचय दिया। भारत ने बिना किसी दबाव के अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखते हुए रूस के साथ तेल व्यापार भी जारी रखा और शांति की मध्यस्थता का यह नया रास्ता भी खोल दिया।
रूस और यूक्रेन दोनों के साथ भारत के कैसे हैं संबंध?
इस पूरी कूटनीतिक सफलता के पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि भारत दुनिया का इकलौता ऐसा देश है जिसके रूस और यूक्रेन दोनों राष्ट्रपतियों के साथ सीधे और भरोसेमंद संबंध हैं। एक तरफ जहां भारत के रूस के साथ दशकों पुराने रक्षा और ऊर्जा के गहरे रिश्ते हैं, वहीं प्रधानमंत्री मोदी ने यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की से भी कई बार आमने-सामने मुलाकात की है। जेलेंस्की ने भी कई मंचों पर यह माना है कि भारत इस भीषण युद्ध को रोकने में एक बहुत बड़ी और सकारात्मक भूमिका निभा सकता है। पश्चिमी मीडिया और यूरोपीय देशों में भी अब यह माना जा रहा है कि अमेरिका और ट्रंप जिस काम को पूरा करने में असफल रहे, उसे भारत अपनी संतुलित और निष्पक्ष कूटनीति के दम पर संभव बना सकता है।
दूसरी तरफ, अमेरिका और पश्चिमी देशों की तरफ से भारत पर लगातार दबाव बनाने की कोशिशें भी जारी हैं। हाल ही में अमेरिकी सीनेट में रूसी तेल खरीदने वाले देशों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का प्रस्ताव सामने आया है, जिसमें सौ फीसदी तक टैरिफ लगाने की बात कही गई है। इसके अलावा, अमेरिका में एच-1बी वीजा के नियमों को और ज्यादा सख्त करने की सुगबुगाहट चल रही है, जिससे वहां रह रहे भारतीयों की चिंताएं बढ़ गई हैं। इसके बावजूद भारत सरकार ने साफ कर दिया है कि उसकी विदेश नीति किसी बाहरी दबाव में नहीं झुकेगी और देश का राष्ट्रीय हित सबसे पहले आता है। भारत ने कूटनीतिक मोर्चे पर रूस और यूक्रेन को एक टेबल पर लाने के लिए जो प्रस्ताव तैयार किया है, उसकी रूपरेखा को बेहद गोपनीय रखा गया है ताकि बातचीत में कोई अड़चन न आए।
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वैश्विक राजनीति पर इस नए प्रस्ताव का क्या असर पड़ेगा?
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर भारत की यह मध्यस्थता सफल होती है, तो यह वैश्विक राजनीति में एक बहुत बड़ा ऐतिहासिक मोड़ साबित होगा। शीत युद्ध के बाद से यह पहला मौका होगा जब कोई एशियाई देश अमेरिका और यूरोप की मध्यस्थता के बिना सीधे तौर पर दो यूरोपीय देशों के बीच चल रहे महायुद्ध को रोकने में मध्यस्थ की भूमिका निभाएगा। संयुक्त राष्ट्र संघ में भी भारत के इस कदम की सराहना की जा रही है, हालांकि पश्चिमी देशों के कुछ अधिकारी अभी भी इस बात को लेकर पशोपेश में हैं कि भारत रूस के साथ अपने पुराने रिश्तों को निभाते हुए यूक्रेन को कैसे संतुष्ट करेगा। लेकिन पुतिन प्रशासन ने पहले ही संकेत दे दिया है कि वे भारत की मध्यस्थता पर विचार करने के लिए तैयार हैं।
मैदान पर उतरी हमारी टीम ने जब दिल्ली के कूटनीतिक जानकारों से बात की, तो उन्होंने बताया कि भारत का यह प्रस्ताव केवल युद्ध विराम के लिए नहीं बल्कि युद्ध के बाद के पुनर्निर्माण और क्षेत्रीय सुरक्षा की गारंटी पर भी आधारित है। अमेरिका में भले ही डोनाल्ड ट्रंप अपने पुराने दावों को लेकर सुर्खियां बटोर रहे हों, लेकिन जमीन पर शांति स्थापना का वास्तविक काम अब भारत की कूटनीति के पाले में आता दिख रहा है। आने वाले कुछ हफ्तों में इस प्रस्ताव के और भी कई अहम पहलू सामने आ सकते हैं, जिस पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं। द फ्रीलान्स इस पूरे घटनाक्रम पर लगातार अपनी पैनी नजर बनाए रखेगा और हर ताजा अपडेट अपने पाठकों तक पहुंचाता रहेगा।





