मिडिल ईस्ट की जंग और कच्चे तेल बाजार का संकट
दुनियाभर में ऊर्जा बाजार इस समय एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहां अनिश्चितता और तनाव चरम पर है। पश्चिम एशिया में ईरान और अन्य ताकतों के बीच जारी संघर्ष ने वैश्विक अर्थव्यवस्था की धड़कनों को तेज कर दिया है। कच्चे तेल के अंतरराष्ट्रीय पैमाना माने जाने वाले ब्रेंट क्रूड की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के आंकड़े को पार कर चुकी हैं। इस उछाल ने दुनिया भर के देशों में महंगाई की आशंकाओं को फिर से गहरा दिया है, क्योंकि ऊर्जा के दाम बढ़ने से परिवहन, विनिर्माण और आम जनजीवन से जुड़े हर पहलू पर सीधा असर पड़ता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह का मूल्य उछाल आपूर्ति श्रृंखला में आई भारी रुकावटों का सीधा परिणाम है। ईरान से जुड़े घटनाक्रमों और खाड़ी देशों के समुद्री मार्गों पर सुरक्षा चिंताओं के कारण कच्चे तेल की आवाजाही प्रभावित हुई है। यही वजह है कि बाजार में इस बात की लगातार चर्चा थी कि प्रमुख उत्पादक देश आपूर्ति बढ़ाने के लिए कोई बड़ा कदम उठाएंगे, ताकि कीमतों को काबू में किया जा सके।
लेकिन तमाम उम्मीदों के विपरीत, दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादक देशों ने एक बार फिर सतर्क रुख अपनाते हुए उत्पादन बढ़ाने से इनकार कर दिया है। इस फैसले ने आने वाले दिनों में ईंधन की कीमतों को लेकर बनी अनिश्चितता को और अधिक बढ़ा दिया है, जिससे वैश्विक स्तर पर नीति निर्माताओं की चिंताएं स्पष्ट रूप से देखी जा सकती हैं।
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ओपेक प्लस का बड़ा फैसला: नवंबर में नहीं बढ़ेगा उत्पादन
तेल निर्यात करने वाले प्रमुख देशों के समूह ओपेक प्लस (OPEC+) के उप-समूह ने एक महत्वपूर्ण बैठक में यह तय किया है कि नवंबर महीने में कच्चे तेल के उत्पादन लक्ष्य को मौजूदा स्तर पर ही बनाए रखा जाएगा। इस समूह में सऊदी अरब, रूस, इराक, कुवैत, कजाकिस्तान, अल्जीरिया और ओमान जैसे दिग्गज देश शामिल हैं। इन देशों ने स्पष्ट किया है कि उत्पादन में न तो कोई बढ़ोतरी की जाएगी और न ही कटौती होगी, यानी बाजार में तेल की सप्लाई उतनी ही रहेगी जितनी फिलहाल बनी हुई है।
सूत्रों के अनुसार, खाड़ी क्षेत्र में चल रहे संघर्ष के कारण ये देश अपने निर्धारित कोटे से पहले ही कम उत्पादन कर पा रहे हैं। युद्ध की वजह से उत्पादन क्षमताओं की तकनीकी समीक्षा में भी देरी हुई है, जो भविष्य के कोटे तय करने के लिए बेहद जरूरी थी। यही कारण है कि ये देश बाजार में जोखिम मोल लेने के बजाय मौजूदा आपूर्ति को ही स्थिर रखना बेहतर समझ रहे हैं।
समूह के प्रतिनिधियों ने यह भी घोषणा की है कि वे बाजार की बदलती परिस्थितियों पर कड़ी नजर रख रहे हैं और आने वाले दिनों में स्थिति की समीक्षा के लिए दोबारा बैठक करेंगे। तब तक के लिए वैश्विक उपभोक्ताओं को उच्च कीमतों के साथ ही समझौता करना पड़ सकता है, क्योंकि अतिरिक्त आपूर्ति का फिलहाल कोई संकेत नहीं है.
"वर्तमान वैश्विक भू-राजनीतिक हालात और आपूर्ति में आ रही बाधाओं को देखते हुए यह जरूरी है कि बाजार की हर गतिविधि पर बारीकी से नजर रखी जाए और ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाए।" — ऊर्जा बाजार विशेषज्ञ
जी7 देशों का मास्टरस्ट्रोक: बाजार में उतरेगा 100 मिलियन बैरल ईंधन
एक तरफ जहां ओपेक प्लस ने उत्पादन बढ़ाने से हाथ खींच लिए हैं, वहीं दुनिया की सात प्रमुख विकसित अर्थव्यवस्थाओं के समूह जी7 ने बाजार को राहत देने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। जी7 देशों ने घोषणा की है कि वे आने वाले हफ्तों में अपने रणनीतिक भंडारों से 100 मिलियन बैरल तेल और ईंधन उत्पाद बाजार में जारी करेंगे। इस योजना की शुरुआत विशेष रूप से डीजल की भारी खेप के साथ की जाएगी।
जी7 के इस कदम का मुख्य उद्देश्य अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों में डीजल और पेट्रोल के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुके दामों को नीचे लाना है। अमेरिका में हाल ही में ईंधन की कीमतें बढ़ने से किसानों, ट्रांसपोर्टर्स और आम उपभोक्ताओं को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा था। इस योजना के तहत शुरुआती खेप अगले कुछ हफ्तों के भीतर ही जारी कर दी जाएगी, जबकि शेष हिस्सा आगामी महीनों में चरणबद्ध तरीके से बाजार में उतारा जाएगा।
इस कदम को विश्लेषक एक रणनीतिक हस्तक्षेप के रूप में देख रहे हैं, जिसका मकसद ओपेक देशों द्वारा आपूर्ति रोके जाने के प्रभाव को संतुलित करना है। हालांकि, यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह अतिरिक्त ईंधन वैश्विक कीमतों को 100 डॉलर से नीचे लाने में कामयाब हो पाता है या नहीं।
होर्मुज़ जलडमरूमध्य और वैकल्पिक मार्गों की हकीकत
वैश्विक तेल व्यापार में होर्मुज़ जलडमरूमध्य की भूमिका हमेशा से बेहद अहम रही है। ईरान संघर्ष की शुरुआत के बाद से यह आशंका जताई जा रही थी कि इस अहम समुद्री मार्ग पर पूरी तरह से रोक लग सकती है, जिससे तेल आपूर्ति ठप हो जाएगी। हालांकि, हालिया टैंकर ट्रैकिंग आंकड़ों से एक अलग और दिलचस्प तस्वीर सामने आई है। खाड़ी देशों के अरब देशों ने वैकल्पिक मार्गों और अतिरिक्त बंदरगाहों का इस्तेमाल कर अपनी तेल की खेप को सुचारू बनाए रखा है।
आंकड़ों के मुताबिक, होर्मुज़ जलडमरूमध्य के अलावा ओमान सागर और लाल सागर के रास्तों से भी बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का निर्यात किया जा रहा है। इससे यह साबित होता है कि भले ही ईरान का निर्यात लगभग शून्य हो चुका हो, लेकिन अन्य देशों ने अपनी क्षमता का विस्तार कर वैश्विक आपूर्ति को काफी हद तक संभाले रखा है।
इन तमाम रणनीतिक बदलावों और अंतरराष्ट्रीय बैठकों के बीच, वैश्विक अर्थव्यवस्था की नजरें आने वाले दिनों में होने वाली बैठकों और मिडिल ईस्ट के घटनाक्रमों पर टिकी हैं। ऊर्जा की कीमतें तय करेंगी कि आने वाले महीनों में महंगाई का ग्राफ किस दिशा में आगे बढ़ेगा।



