नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश के मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार इन दिनों अपनी प्रशासनिक जिम्मेदारियों और अंतरराष्ट्रीय नियुक्तियों को लेकर लगातार सुर्खियों में हैं। निर्वाचन आयोग के शीर्ष पदों पर बैठे ज्ञानेश कुमार के साथ-साथ अन्य चुनाव आयुक्तों के कामकाज और फैसलों पर इन दिनों देश की सियासत गरमाई हुई है। एक तरफ जहां उनकी नियुक्ति को वैश्विक मंच पर भारत के लोकतांत्रिक ढांचे की मजबूती के रूप में देखा जा रहा है, वहीं विपक्षी दल लगातार चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रहे हैं। द फ्रीलान्स की ग्राउंड पड़ताल के मुताबिक, इस समय देश की चुनावी व्यवस्था को लेकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दोनों ही स्तरों पर बड़े घटनाक्रम सामने आ रहे हैं।
ताजा घटनाक्रम के तहत, मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को वर्ष 2026 के लिए 'अंतरराष्ट्रीय लोकतंत्र और निर्वाचन सहायता संस्थान' यानी इंटरनेशनल आइडिया के अध्यक्ष पद का कार्यभार सौंपा गया है। इस संस्था का मुख्य काम दुनिया भर में लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करना और निष्पक्ष चुनाव कराना है। आकाशवाणी और दूरदर्शन की रिपोर्टों के अनुसार, इस वैश्विक जिम्मेदारी के मिलने से अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की चुनावी प्रक्रिया की मजबूत साख का संदेश जाएगा। दुनिया भर के देश भारत के इतने बड़े पैमाने पर चुनाव कराने के अनुभव से सीखना चाहते हैं और इस पद पर भारतीय अधिकारी का होना देश के लिए एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
पुणे में कांग्रेस का कड़ा विरोध और इस्तीफे की मांग
वैश्विक स्तर पर मिल रही इस बड़ी जिम्मेदारी के ठीक उलट, देश के भीतर राजनीतिक दलों की नाराजगी भी खुलकर सामने आ रही है। महाराष्ट्र के पुणे शहर में हाल ही में मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कांग्रेस पार्टी ने जोरदार प्रदर्शन किया है। ईटीवी भारत की रिपोर्ट के अनुसार, स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ताओं और नेताओं ने चुनाव आयोग के कामकाज के तरीकों पर गंभीर आरोप लगाए हैं और मुख्य निर्वाचन आयुक्त के इस्तीफे की मांग तक कर डाली है। विरोध प्रदर्शन कर रहे नेताओं का कहना है कि चुनाव प्रक्रिया में निष्पक्षता बनाए रखने के लिए आयोग को पूरी तरह स्वतंत्र और पारदर्शी तरीके से काम करना चाहिए, जिसे लेकर विपक्षी दलों में लगातार असंतोष बना हुआ है।
सियासी गलियारों में इन दिनों चुनाव आयोग के फैसलों को लेकर पक्ष और विपक्ष के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है। हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति पद के चुनाव के दौरान डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत की चुनाव व्यवस्था और मतदान प्रक्रिया का जिक्र किए जाने के बाद से यह मुद्दा वैश्विक चर्चा का केंद्र बन गया है। विश्लेषकों का मानना है कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के नाते भारत की चुनावी व्यवस्था पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी रहती हैं। ऐसे में मुख्य निर्वाचन आयुक्त की भूमिका और भी ज्यादा संवेदनशील और महत्वपूर्ण हो जाती है, जहां उन्हें देश के भीतर राजनीतिक दलों के दबाव को भी संभालना होता है और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर देश की साख को भी बनाए रखना होता है।
वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती भूमिका के मायने
अंतरराष्ट्रीय लोकतंत्र और निर्वाचन सहायता संस्था में भारत को मिली यह अध्यक्षता केवल एक प्रशासनिक पद नहीं है, बल्कि यह दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में देश की ताकत को दर्शाती है। ज्ञानेश कुमार और उनके साथियों के सामने एक तरफ जहां देश के भीतर चुनावी प्रक्रिया को लेकर उठ रहे सवालों के जवाब देने की चुनौती है, वहीं दूसरी तरफ उन्हें वैश्विक स्तर पर भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों का प्रतिनिधित्व भी करना है। जानकारों का कहना है कि भारत जैसे विविधता भरे देश में सफल चुनाव कराना अपने आप में एक मिसाल है और इसी अनुभव का फायदा अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को भी मिलेगा।
मैदान पर उतरी हमारी टीम ने पाया कि आम जनता और स्थानीय मतदाता इन बड़े राजनीतिक और अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों को बहुत बारीकी से देख रहे हैं। एक आम नागरिक के लिए यह जरूरी है कि देश की चुनावी संस्थाएं पूरी तरह निष्पक्ष और मजबूत बनी रहें। चाहे वह देश के भीतर होने वाले विरोध प्रदर्शन हों या फिर विदेश से मिलने वाली तारीफें, चुनाव आयोग की साख को बचाए रखना और उसे मजबूत करना ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी जरूरत है। द फ्रीलान्स इस पूरे मामले पर आगे भी अपनी पैनी नजर बनाए रखेगा और हर नए अपडेट से आपको अवगत कराता रहेगा।



