नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश के निर्वाचन आयोग के कामकाज और इसके शीर्ष अधिकारियों की भूमिका पर इन दिनों राजनीति और कूटनीति के गलियारों में बहस तेज हो गई है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार और उनके साथी चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी लगातार सुर्खियों में बने हुए हैं। एक तरफ जहां चुनाव आयोग निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव कराने की अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी निभा रहा है, वहीं दूसरी तरफ राजनीतिक दलों की तीखी प्रतिक्रियाओं का सामना भी कर रहा है। हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तरफ से भी भारतीय चुनाव व्यवस्था और ज्ञानेश कुमार के संदर्भ में बयान सामने आने के बाद यह मामला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा का विषय बन गया है।
जमीनी स्तर पर इस विवाद की गूंज अब देश के कई हिस्सों में साफ सुनाई देने लगी है। हाल ही में महाराष्ट्र के पुणे शहर में मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कांग्रेस पार्टी ने बड़ा प्रदर्शन किया। कार्यकर्ताओं ने सड़क पर उतरकर नारेबाजी की और आयोग के कामकाज पर सवाल उठाते हुए उनके इस्तीफे की मांग तक कर डाली। राजनीतिक दलों का आरोप है कि चुनाव आयोग के फैसले कुछ खास राजनीतिक दिशा में झुके हुए हैं, जिससे देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं। हालांकि, चुनाव आयोग हमेशा से यह कहता आया है कि वह पूरी तरह स्वतंत्र है और बिना किसी दबाव के अपने संवैधानिक कर्तव्यों का पालन करता है।
अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत के चुनाव प्रमुख को मिली बड़ी जिम्मेदारी
एक तरफ जहां देश की घरेलू राजनीति में आयोग के फैसलों को लेकर विरोध के स्वर उठ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ वैश्विक स्तर पर भारत के चुनाव प्रबंधन की साख मजबूत होती दिख रही है। आधिकारिक घोषणा के मुताबिक, मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार वर्ष 2026 के लिए 'अंतर्राष्ट्रीय लोकतंत्र और निर्वाचन सहायता संस्थान' यानी इंटरनेशनल IDEA के अध्यक्ष पद का कार्यभार संभालेंगे। यह संस्थान दुनिया भर में लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को मजबूत करने और चुनावी सुधारों पर काम करने के लिए जाना जाता है। इस वैश्विक पद के मिलने से यह साबित होता है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में भारत का चुनावी अनुभव और ढांचा वैश्विक स्तर पर काफी सम्मानित और प्रभावशाली माना जाता है।
आकाशवाणी और डीडी न्यूज से मिली रिपोर्टों के अनुसार, इंटरनेशनल IDEA की अध्यक्षता संभालना भारत के लिए एक बड़ा कूटनीति कदम है। दुनिया के कई देश भारत के ईवीएम यानी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन और विशाल मतदाता सूची प्रबंधन की प्रणालियों का अध्ययन करना चाहते हैं। ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में भारत इस अंतरराष्ट्रीय मंच पर लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करने के अपने अनुभव दुनिया के साथ साझा करेगा। जानकारों का मानना है कि घरेलू राजनीति में चाहे जितना विरोध हो, लेकिन वैश्विक पटल पर भारत के चुनाव आयोग का कद लगातार बढ़ रहा है और यह देश के लिए गर्व की बात है।
विपक्ष के तीखे सवाल और आयोग की कार्यप्रणाली पर उठते कदम
बावजूद इसके, देश के भीतर विपक्षी दलों और चुनाव आयोग के बीच का यह तनाव नया नहीं है। जब भी चुनाव परिणाम आते हैं या चुनावी सरगर्मी बढ़ती है, आयोग के फैसलों की समीक्षा को लेकर बहस छिड़ जाती है। पुणे में हुआ कांग्रेस का विरोध प्रदर्शन इस बात का प्रमाण है कि राजनीतिक दल अपनी जमीनी लड़ाई को अब सीधे संवैधानिक संस्थाओं के फैसलों के खिलाफ ले जाने से नहीं हिचकिचा रहे हैं। विपक्षी नेताओं का कहना है कि चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने के लिए आयोग को सभी राजनीतिक दलों के साथ अधिक खुलकर संवाद करना चाहिए और उनकी शिकायतों का समय पर संतोषजनक समाधान निकालना चाहिए।
आम नागरिकों और चुनावी मामलों के जानकारों का मानना है कि लोकतंत्र की असली ताकत उसकी स्वतंत्र संस्थाओं में ही निहित होती है। जनता यह चाहती है कि चुनाव आयोग पूरी तरह निष्पक्ष रहे ताकि हर नागरिक का वोट पूरी ईमानदारी से गिने जा सके। चाहे वह देश के भीतर हो रहे राजनीतिक विरोध हों या फिर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मिलने वाली बड़ी जिम्मेदारियां, मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के सामने आने वाले दिन काफी महत्वपूर्ण और चुनौतीपूर्ण रहने वाले हैं। द फ्रीलान्स की टीम इस पूरे मामले पर अपनी पैनी नजर बनाए रखेगी और आगे भी आपको पल-पल की सटीक जानकारी देती रहेगी।




