नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश के सबसे पुराने और बड़े बैंकों में शामिल आईडीबीआई बैंक के निजीकरण का रास्ता अब पूरी तरह साफ हो गया है। केंद्र सरकार ने इस बैंक में अपनी बड़ी हिस्सेदारी बेचने का ऐतिहासिक फैसला लिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में इस मेगा डील पर औपचारिक मुहर लगा दी गई है। इस फैसले के तहत सरकार और भारतीय जीवन बीमा निगम यानी एलआईसी मिलकर अपनी कुल 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचेंगे। इस पूरी बिक्री प्रक्रिया पर लगभग 52,877 करोड़ रुपये का निवेश होने का अनुमान है, जो देश के बैंकिंग इतिहास की सबसे बड़ी डील में से एक है।
इस पूरी बिक्री प्रक्रिया के बाद आईडीबीआई बैंक का स्वामित्व पूरी तरह से निजी हाथों में चला जाएगा। बाजार से मिल रही जानकारी के अनुसार, फेयरफैक्स समूह की एक कंपनी इस बैंक को खरीदने की दौड़ में सबसे आगे चल रही है। इस समूह के प्रमुख भारत में जन्मे कनाडाई अरबपति हैं जिनकी कुल नेट वर्थ 23 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा आंकी जाती है। एअर इंडिया के बाद सरकार का यह दूसरा सबसे बड़ा विनिवेश कदम माना जा रहा है। सरकार पिछले काफी समय से इस बैंक को बेचने की योजना बना रही थी और अब जाकर इस पर कानूनी व प्रशासनिक मुहर लगी है।
शेयर बाजार में बैंक के शेयरों में जोरदार तेजी
इस बड़ी खबर के सामने आते ही शेयर बाजार में आईडीबीआई बैंक के शेयरों को लेकर निवेशकों में भारी उत्साह देखा गया। हालांकि उस दिन शेयर बाजार का कुल मूड काफी खराब था और ज्यादातर कंपनियों के शेयर लाल निशान पर ट्रेड कर रहे थे। इसके बावजूद आईडीबीआई बैंक के शेयरों में करीब 13 प्रतिशत तक का जोरदार उछाल दर्ज किया गया। बाजार के जानकारों का मानना है कि बैंक के निजी हाथों में जाने से इसकी कार्यप्रणाली और वित्तीय सेहत में तेजी से सुधार होगा। यही वजह है कि निवेशक इस बैंक के शेयरों को खरीदने में खासी दिलचस्पी दिखा रहे हैं और बाजार में इसकी जबरदस्त चर्चा है।
बैंक के रीस्ट्रक्चरिंग यानी पुनर्गठन के काम को भी सरकार की तरफ से हरी झंडी दिखा दी गई है। इस पूरी डील को पूरा होने में अभी कुछ कानूनी और तकनीकी औपचारिकताएं बाकी हैं जिन्हें आने वाले कुछ महीनों में पूरा कर लिया जाएगा। रिपोर्ट के मुताबिक, अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी होने के बाद अगले तीन सालों के भीतर इस बैंक का नाम भी बदला जा सकता है। सरकार और खरीदार कंपनी के बीच उन सभी नियमों और शर्तों पर सहमति बन चुकी है जो बैंक के कर्मचारियों और ग्राहकों के हितों की रक्षा करती हैं।
62 साल पुराने बैंक का नया सफर और निजीकरण
यह बैंक करीब 62 साल पुराना है और देश के वित्तीय इतिहास में इसका एक अहम स्थान रहा है। कभी औद्योगिक विकास को गति देने वाला यह सरकारी बैंक अब पूरी तरह से एक निजी बैंक के रूप में काम करेगा। सरकार का मुख्य उद्देश्य घाटे और भारी दबाव वाली सरकारी संपत्तियों से बाहर निकलना है ताकि देश के खजाने पर बोझ कम हो सके। बैंकिंग सेक्टर के जानकारों का कहना है कि निजी हाथों में जाने के बाद यह बैंक अधिक आक्रामक तरीके से कारोबार कर सकेगा और नए ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाएगा।
आम ग्राहकों के मन में इस बदलाव को लेकर कई तरह के सवाल भी उठ रहे हैं कि क्या उनके खातों या लोन पर कोई असर पड़ेगा। हालांकि अधिकारियों ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि ग्राहकों की जमा पूंजी पूरी तरह सुरक्षित है और उनकी सेवाओं पर इसका कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा। बैंक की शाखाएं और एटीएम पहले की तरह ही सुचारू रूप से काम करते रहेंगे। द फ्रीलान्स की टीम इस मेगा डील से जुड़े हर नए अपडेट पर लगातार नजर बनाए हुए है और जैसे ही खरीददार कंपनी की तरफ से कोई आधिकारिक बयान आता है, हम सबसे पहले आप तक सटीक जानकारी पहुंचाएंगे।





