नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — भारतीय राजनीति की चाल और चरित्र में इन दिनों बहुत तेजी से बदलाव आ रहा है। देश के अलग-अलग कोनों से आ रही राजनीतिक खबरें इस बात की गवाही दे रही हैं कि सियासत अब केवल सत्ता का खेल नहीं, बल्कि भावनाओं, संघर्ष और नए बदलावों का अखाड़ा बन चुकी है। एक तरफ जहां जमीनी स्तर के पुराने नेता अपने फैसलों पर भावुक हो रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ देश का युवा वर्ग यानी Gen-Z भी अब पारंपरिक राजनीति के दायरे से बाहर निकलकर सीधे मैदान में अपनी बात रख रहा है। द फ्रीलान्स की टीम ने जब इन तमाम पहलुओं की गहराई से पड़ताल की, तो कई ऐसे दिलचस्प तथ्य सामने आए जो आज देश की राजनीति की दशा और दिशा दोनों तय कर रहे हैं।
पश्चिम बंगाल की राजनीति से एक बेहद चौंकाने वाली खबर सामने आई है। कभी बाबरी मस्जिद की नींव रखने से जुड़े मामलों में चर्चा में आए विधायक हुमायूं कबीर ने अचानक राजनीति से संन्यास लेने का ऐलान कर दिया है। मीडिया के सामने आते ही वे खुद को रोक नहीं पाए और फफककर रो पड़े। उनके इस तरह अचानक टूटने और राजनीति छोड़ने के ऐलान ने राजनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी है। स्थानीय लोगों और उनके समर्थकों के बीच इस बात की चर्चा है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि एक मजबूत और मुखर नेता को इस तरह आंसुओं के साथ सियासत को अलविदा कहना पड़ा। यह घटना दिखाती है कि जमीनी राजनीति का दबाव और अंदरूनी खींचतान कई बार बड़े-बड़े नेताओं को अंदर से तोड़ देती है।
पीएम मोदी का 25 साल का सफर और जश्न
दूसरी तरफ राष्ट्रीय राजधानी से लेकर देश के हर कोने तक भारतीय जनता पार्टी के नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 25 साल के राजनीतिक सफर का जश्न मना रहे हैं। इस लंबे सफर के दौरान मुख्यमंत्री से लेकर देश के प्रधानमंत्री तक की उनकी यात्रा को भाजपा नेताओं ने अपनी उपलब्धियों के रूप में जनता के सामने रखा है। इस जश्न के जरिए पार्टी एक तरफ जहां अपनी राजनीतिक ताकत का प्रदर्शन कर रही है, वहीं दूसरी तरफ कार्यकर्ताओं में नया जोश भरने का काम भी कर रही है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि एक चौथाई सदी का यह सफर भारतीय राजनीतिक इतिहास में एक बड़ा मील का पत्थर है, जिसका असर आने वाले कई सालों तक देश की चुनावी दिशा पर दिखाई देगा।
केवल चुनावी नेता ही नहीं, बल्कि प्रशासनिक सेवा यानी आईएएस की नौकरी छोड़कर राजनीति में आने वाले अफसरों का ट्रैक रिकॉर्ड भी इन दिनों चर्चा का केंद्र बना हुआ है। दिव्या मित्तल और उनके जैसे कई अन्य आईएएस अधिकारियों ने अपनी सुरक्षित नौकरियां छोड़कर राजनीति की अनिश्चित राह को चुना। लेकिन सवाल यह है कि प्रशासनिक अनुभव रखने वाले इन अफसरों का राजनीति में आकर असल में क्या हुआ? क्या वे जनता की उम्मीदों पर खरे उतरे या फिर राजनीति की जटिल चालों में उलझकर रह गए? पिछले कुछ सालों के आंकड़ों को देखें तो पता चलता है कि बाबू से नेता बनने की यह राह जितनी चमक-धमक वाली दिखती है, उतनी ही कांटों भरी भी होती है। कई अधिकारियों ने राजनीति में आने के बाद बड़ी सफलता हासिल की, तो कई लोगों को शुरुआती झटकों के बाद किनारा करना पड़ा।
युवाओं की बदलती भूमिका और Gen-Z का तेवर
इन तमाम राजनीतिक उठापटक के बीच देश का युवा वर्ग भी चुप नहीं बैठा है। आज का Gen-Z केवल घर बैठकर प्रार्थना करने या चुपचाप तमाशा देखने के मूड में नहीं है। देश के विश्वविद्यालयों और सड़कों पर युवाओं के प्रदर्शन इस बात का सबूत हैं कि उनकी नाराजगी और उनके सवाल अब सिर्फ सरकार बदलने तक सीमित नहीं हैं। वे शिक्षा, रोजगार, सामाजिक न्याय और अपने भविष्य से जुड़े बुनियादी मुद्दों पर सीधे सवाल पूछ रहे हैं। यह नई पीढ़ी पारंपरिक राजनीतिक दलों के पुराने बयानों और वादों से प्रभावित होने के बजाय खुद डेटा और तर्कों के साथ बहस में उतर रही है। यही वजह है कि आज के राजनीतिक दलों को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर होना पड़ रहा है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी राजनीति के रंग बदल रहे हैं। यूरोप से लेकर भारत तक, वामपंथी और नए राजनीतिक दल अब महंगे मकान, कम किराए और महंगाई जैसे आम आदमी के बुनियादी मुद्दों को अपनी राजनीति का मुख्य हथियार बना रहे हैं। जर्मनी और अन्य यूरोपीय देशों में जिस तरह से किफायती आवास के मुद्दों पर चुनाव लड़े जा रहे हैं, उसका असर पूरी दुनिया की राजनीतिक सोच पर पड़ रहा है। भारत के शहरी युवा भी अब इन्हीं मुद्दों को अपनी प्राथमिकताओं में शामिल कर रहे हैं। वे साफ तौर पर चाहते हैं कि राजनीति केवल नारों और भाषणों तक सीमित न रहे, बल्कि उनकी रोजमर्रा की जिंदगी को आसान बनाने का जरिया बने।
द फ्रीलान्स की अंतिम ग्राउंड पड़ताल
इन सभी घटनाओं का कुल मिलाकर यही निचोड़ है कि भारतीय राजनीति एक बहुत बड़े मोड़ पर खड़ी है। एक तरफ जहां पुराने नेताओं का भावुक होकर सियासत छोड़ना यह बताता है कि यह क्षेत्र अब बहुत कठिन और मानसिक रूप से थका देने वाला हो चुका है, वहीं दूसरी तरफ युवा पीढ़ी का आक्रामक रुख यह संकेत दे रहा है कि अब नेताओं को जनता के प्रति ज्यादा जवाबदेह होना पड़ेगा। चाहे वह प्रशासनिक अफसरों का राजनीति में आना हो या प्रधानमंत्री मोदी के लंबे सफर का जश्न हो, हर घटना अपने पीछे एक गहरी कहानी छोड़ रही है। द फ्रीलान्स की नजर इस बात पर बनी रहेगी कि आने वाले दिनों में ये बदलाव देश के आम मतदाताओं के जीवन पर क्या और कितना असर डालते हैं।



