कोलकाता में इस समय राजनीतिक जमीन तेजी से खिसकती और बनती नजर आ रही है। पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस यानी टीएमसी पर अब बिना दफ्तर के होने का खतरा मंडराने लगा है। पार्टी मुख्यालय के मकान मालिक ने सीधे थाने का रुख किया है और तृणमूल से अपनी प्रॉपर्टी तुरंत खाली कराने की सख्त मांग की है। यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब राज्य में राजनीतिक दलों के बीच हर मोर्चे पर खींचतान चल रही है। मकान मालिक के इस कदम से टीएमसी की मुश्किलें काफी बढ़ गई हैं और पार्टी के भीतर भी इस बात की सुगबुगाहट शुरू हो गई है कि आखिर उनका नया ठिकाना कहां होगा।
दूसरी तरफ, मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी ने कोलकाता नगर निकाय चुनावों को लेकर अपनी रणनीति जमीन पर उतार दी है। पश्चिम बंगाल भाजपा ने ऐलान किया है कि पार्टी के जो भी नेता या कार्यकर्ता पार्षद बनना चाहते हैं, वे अपना पूरा बायोडाटा सीधे भाजपा कार्यालय के ड्रॉप बॉक्स में जमा कर सकते हैं। पार्टी का दावा है कि इस पारदर्शी तरीके से बिल्कुल जमीनी स्तर के और सही उम्मीदवारों को चुना जाएगा। सुकांत मजूमदार ने इस पूरी प्रक्रिया की रूपरेखा स्पष्ट करते हुए बताया कि टिकट वितरण में भाई-भतीजावाद से बचने के लिए यह कदम उठाया गया है। इससे पार्टी के भीतर टिकट चाहने वालों की लंबी कतार लग गई है और लोग अपने बायोडाटा जमा कराने में जुट गए हैं।
बड़ाबाजार की नवाब लेन का नाम बदलने की उठ रही मांग
राजधानी कोलकाता के ऐतिहासिक इलाके बड़ाबाजार से भी एक बड़ी राजनीतिक खबर सामने आ रही है। यहां की प्रसिद्ध नवाब लेन का नाम बदलने की मांग अब जोर पकड़ने लगी है। इस सिलसिले में एक स्थानीय भाजपा नेता ने आगे आकर प्रसिद्ध संत कार्तिक महाराज को एक औपचारिक पत्र सौंपा है। इस मांग के पीछे स्थानीय स्तर पर सांस्कृतिक पहचान से जुड़े तर्क दिए जा रहे हैं। हालांकि इस मांग के सामने आने के बाद इलाके में धार्मिक और राजनीतिक चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया है। प्रशासन और स्थानीय निकाय इस पूरे मामले पर बहुत ही फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं ताकि किसी भी तरह की अशांति न फैले।
इन राजनीतिक उठापटक के बीच बुनियादी ढांचे और विकास से जुड़े प्रोजेक्ट्स की रफ्तार भी प्रभावित हो रही है। बहुप्रतीक्षित वाराणसी-कोलकाता एक्सप्रेसवे का काम इन दिनों जमीन अधिग्रहण और मुआवजे को लेकर चल रहे विवाद के कारण रुक गया है। किसान और स्थानीय भूमि मालिक अपनी जमीन का सही और पूरा मुआवजा मिलने की मांग पर अड़े हुए हैं। इस प्रशासनिक गतिरोध के कारण प्रोजेक्ट की समय सीमा पर असर पड़ रहा है। हालांकि हाल ही में सरकार ने स्पष्ट किया है कि इस एक्सप्रेसवे को राजगीर और डोभी जैसे अहम इलाकों से भी जोड़ा जाएगा। इसके अलावा बोधगया को आमस-दरभंगा हाईवे से जोड़ने की बड़ी तैयारी भी चल रही है जिससे आने वाले समय में आवागमन बहुत आसान हो जाएगा।
बुनियादी विकास प्रोजेक्ट्स और मुआवजे का पेंच
वाराणसी-कोलकाता एक्सप्रेसवे प्रोजेक्ट के रुकने से उन लोगों में निराशा है जो इसे क्षेत्र की आर्थिक तरक्की का बड़ा जरिया मान रहे थे। स्थानीय किसानों का कहना है कि जब तक प्रशासन मुआवजे की राशि को लेकर पूरी स्पष्टता नहीं देता, तब तक वे अपनी जमीन छोड़ने को तैयार नहीं हैं। अधिकारी किसानों को मनाने और इस विवाद को जल्द से जल्द सुलझाने की कोशिश में लगे हुए हैं। दूसरी तरफ एक्सप्रेसवे के रूट में नए इलाकों को जोड़े जाने से इस प्रोजेक्ट का दायरा काफी बड़ा हो गया है। सरकार की कोशिश है कि बिहार और बंगाल के बीच व्यापारिक और सड़क संपर्क को जल्द से जल्द बेहतर बनाया जाए।
कोलकाता में इन सभी घटनाओं का असर आम जनता की रोजमर्रा की जिंदगी और सोच पर भी साफ दिखाई दे रहा है। चाहे वह टीएमसी के दफ्तर का विवाद हो या फिर भाजपा की तरफ से पार्षद पद के लिए बायोडाटा मंगाने की अनूठी पहल, हर मुद्दे पर चौराहों और चाय की दुकानों पर लंबी बहस छिड़ी हुई है। एक तरफ राजनीतिक दल अपने संगठन को मजबूत करने और जनता के बीच अपनी पकड़ बनाने में दिन-रात एक कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ प्रशासनिक एजेंसियां कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए पूरी ताकत झोंक रही हैं। आने वाले दिनों में ये सभी मुद्दे पश्चिम बंगाल की राजनीति की दिशा तय करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाने वाले हैं।









