नई दिल्ली ग्राउंड ब्यूरो — केंद्र सरकार संसद का एक विशेष सत्र बुलाने पर गंभीरता से विचार कर रही है। राजधानी के सियासी गलियारों में इस बात की हलचल बहुत तेज हो गई है। सूत्रों का कहना है कि सरकार इसी महीने संसद की विशेष बैठक बुला सकती है। इस विशेष सत्र का मुख्य एजेंडा लोकसभा सीटों का परिसीमन हो सकता है। सरकार सदन में नया परिसीमन बिल पेश करने की तैयारी में जुटी है। इस बिल के जरिए देश भर में लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाई जा सकती है।
संसद में महिला आरक्षण कानून पहले ही पास किया जा चुका है। नारी शक्ति वंदन कानून में एक अहम शर्त जोड़ी गई थी। इसके तहत देश में आरक्षण नई जनगणना और परिसीमन के बाद ही लागू होगा। अगला लोकसभा चुनाव साल 2029 में होना तय है। अगर परिसीमन की प्रक्रिया अभी शुरू नहीं होती, तो 2029 में महिला आरक्षण देना बहुत मुश्किल हो जाएगा। चुनाव आयोग और प्रशासन को पूरे देश का चुनावी नक्शा बदलने में सालों लग जाते हैं। इसी कारण सरकार अब इस मामले में बिल्कुल भी देर नहीं करना चाहती है।
संसद के विशेष सत्र की अटकलें क्यों तेज हुईं?
संसदीय कार्य से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि सरकार आंतरिक रूप से पूरा खाका तैयार कर चुकी है। नए संसद भवन को भविष्य की जरूरतों को देखकर ही बनाया गया था। नए संसद भवन के लोकसभा कक्ष में 888 सांसदों के बैठने की पूरी व्यवस्था है। वर्तमान समय में लोकसभा में केवल 543 चुनी हुई सीटें हैं। देश में सीटों की संख्या को 1976 में 42वें संविधान संशोधन के जरिए रोक दिया गया था। उस समय का नियम साल 2026 तक के लिए तय किया गया था।
साल 1971 के बाद से देश की आबादी बहुत ज्यादा बढ़ चुकी है। उस समय देश की जनसंख्या करीब 55 करोड़ थी। आज भारत की कुल आबादी 140 करोड़ को पार कर चुकी है। कई संसदीय क्षेत्रों में वोटरों की संख्या 25 से 30 लाख तक पहुंच चुकी है। एक सांसद के लिए इतने बड़े इलाके की निगरानी करना बहुत कठिन काम बन गया है। आबादी के इस दबाव को कम करने के लिए सीटों की संख्या बढ़ाना जरूरी माना जा रहा है।
महिला आरक्षण और 2029 की समय सीमा का पेंच
महिला आरक्षण कानून के तहत महिलाओं को 33 प्रतिशत सीटें मिलनी हैं। देश की जनता और महिला संगठन लंबे समय से इसका इंतजार कर रहे हैं। कानून के जानकारों के अनुसार इस काम के लिए सबसे पहले परिसीमन आयोग बनाना होगा। आयोग देश के हर जिले और कस्बे में जाकर आबादी का अनुपात देखेगा। इसके बाद तय किया जाएगा कि कौन सी सीट महिला उम्मीदवार के लिए आरक्षित होगी।
इस पूरी कानूनी प्रक्रिया में कम से कम तीन साल का समय लगता है। राज्यों में राजनीतिक दलों के साथ बैठकें भी करनी पड़ती हैं। लोगों की आपत्तियों को सुनकर उनका निपटारा करना होता है। अगर यह पूरी प्रक्रिया साल 2025 में शुरू नहीं हुई, तो 2029 की डेडलाइन निकल जाएगी। केंद्र सरकार महिलाओं से जुड़े इस वादे को हर हाल में अगले चुनाव से पहले पूरा करना चाहती है। इसी मजबूरी के कारण विशेष सत्र बुलाने की बात सामने आ रही है।
दक्षिण भारत के राज्यों की क्या हैं बड़ी चिंताएं?
परिसीमन के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा दक्षिण के राज्यों का विरोध है। तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना ने आबादी नियंत्रण पर बहुत अच्छा काम किया है। इन राज्यों में जन्म दर काफी तेजी से नीचे आई है। दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश में आबादी बहुत तेजी से बढ़ी है। यदि केवल आबादी को आधार बनाया गया, तो उत्तर भारत की सीटें बहुत ज्यादा बढ़ जाएंगी।
दक्षिण के राज्यों को डर है कि संसद में उनका राजनीतिक दखल कम हो जाएगा। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन और उनकी पार्टी डीएमके इसका लगातार कड़ा विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि परिवार नियोजन में अच्छा काम करने की सजा उन्हें नहीं मिलनी चाहिए। दक्षिण के कई दल 1971 की आबादी के अनुपात को ही बनाए रखने की मांग कर रहे हैं। केंद्र सरकार के सामने इन राज्यों की चिंताओं को दूर करना सबसे बड़ी चुनौती है।
संख्या बल जुटाने और दलों को साधने की क्या है रणनीति?
सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए अब सर्वमान्य रास्ता तलाशने में लगा है। सूत्रों के मुताबिक सरकार ऐसा नया फॉर्मूला बना रही है जिससे दक्षिण को नुकसान न हो। इसके तहत सीटों के वितरण में केवल जनसंख्या को ही पैमाना नहीं बनाया जाएगा। इसमें राज्यों के विकास और आर्थिक योगदान जैसे पैमानों को भी जोड़ा जा सकता है। सरकार चाहती है कि दक्षिण के राज्यों का प्रतिनिधित्व पहले जैसा मजबूत बना रहे।
इसके लिए सरकार ने क्षेत्रीय दलों और छोटे दलों से अनौपचारिक बातचीत शुरू कर दी है। रक्षा मंत्री और गृह मंत्री के स्तर पर भी बैकचैनल बातचीत चलने की खबरें हैं। सरकार की पूरी कोशिश है कि इस ऐतिहासिक बिल पर सदन में आम राय बन सके। यदि सरकार दक्षिण के दलों को समझाने में सफल हो जाती है, तो आने वाले दिनों में देश का सियासी नक्शा पूरी तरह बदल सकता है। 'द फ्रीलान्स' की टीम संसद और मंत्रालयों की हर हलचल पर लगातार नजर बनाए हुए है।





