नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश की राजधानी में संसद के विशेष सत्र को लेकर सुगबुगाहट बहुत तेज हो गई है। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि सरकार इसी महीने संसद का विशेष सत्र बुला सकती है। इस सत्र को लेकर कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। सबसे बड़ी चर्चा नए परिसीमन और लोकसभा की सीटें बढ़ाने को लेकर है। इसके साथ ही महिला आरक्षण कानून को लागू करने की समय-सीमा भी इससे जुड़ी हुई है। सरकारी स्तर पर अभी तक कोई आधिकारिक तारीख सामने नहीं आई है। लेकिन मंत्रालयों के भीतर इस मुद्दे पर कागजी तैयारी शुरू होने के संकेत मिले हैं। कई बड़े दल अपने सांसदों को दिल्ली में रहने के संकेत दे रहे हैं।
विशेष सत्र की खबरों ने विपक्ष को भी चौकन्ना कर दिया है। विपक्ष के नेता आपस में संपर्क साध रहे हैं। उनका मानना है कि सरकार बिना पूरी चर्चा के बड़ा फैसला ले सकती है। वहीं सत्ता पक्ष के सूत्रों का कहना है कि लंबित सुधारों को आगे बढ़ाना जरूरी है। अगर अभी प्रक्रिया शुरू नहीं हुई तो 2029 के आम चुनाव में देरी हो सकती है। खासतौर पर महिला आरक्षण को अगले चुनाव से पहले लागू करना एक बड़ा लक्ष्य है। इसके लिए देश में पहले जनगणना और फिर सीटों का नया परिसीमन होना जरूरी है। बिना इन दोनों कदमों के नया कानून जमीन पर नहीं उतर सकता है।
महिला आरक्षण और 2029 की समय सीमा का दबाव
संसद ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम को पहले ही पारित कर दिया था। इस कानून के तहत लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण मिलना है। लेकिन कानून में एक शर्त साफ तौर पर लिखी गई थी। यह आरक्षण नई जनगणना के आंकड़ों के आधार पर ही लागू होगा। जनगणना के बाद पूरे देश में निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को दोबारा तय किया जाएगा। इस पूरी प्रक्रिया को परिसीमन कहा जाता है। जानकारों का कहना है कि परिसीमन का काम बहुत बड़ा और समय लेने वाला होता है। इसमें कम से कम दो से तीन साल का समय लग सकता है।
अगर सरकार साल 2029 के लोकसभा चुनाव में महिलाओं को आरक्षण देना चाहती है तो वक्त बहुत कम है। साल 2025 तक अगर प्रक्रिया शुरू नहीं होती तो समय सीमा चूक सकती है। इसी वजह से सरकार पर जल्द कदम उठाने का भारी दबाव दिखाई दे रहा है। अगर विशेष सत्र में परिसीमन आयोग से जुड़ा बिल आता है तो काम में तेजी आ सकती है। चुनाव आयोग और गृह मंत्रालय को मिलकर एक बड़ा खाका खींचना होगा। राज्यों के स्तर पर भी काफी काम करना पड़ेगा। यही वजह है कि सरकार अब देर नहीं करना चाहती है।
लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत का बड़ा पेच
परिसीमन और सीटों की संख्या में बदलाव के लिए संविधान में संशोधन की जरूरत होगी। संविधान संशोधन बिल को पास कराने के लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत चाहिए। मौजूदा लोकसभा में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए के पास सामान्य बहुमत तो है। लेकिन एनडीए के पास अपने दम पर दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा नहीं है। लोकसभा में दो-तिहाई के लिए 362 से ज्यादा सांसदों के समर्थन की जरूरत पड़ेगी। एनडीए के पास अभी करीब 293 सांसद ही हैं। ऐसे में बिल पास कराने के लिए विपक्षी या तटस्थ दलों की मदद लेनी ही होगी।
राज्यसभा में भी संख्या बल का खेल उतना आसान नहीं है। वहां भी सरकार को दूसरे दलों का साथ जुटाना पड़ेगा। बीजू जनता दल और वाईएसआर कांग्रेस जैसे दलों की भूमिका अहम हो सकती है। लेकिन परिसीमन जैसे संवेदनशील मुद्दे पर कोई भी दल आंख मूंदकर समर्थन नहीं देगा। क्षेत्रीय दल अपनी राजनीति और राज्य के नफे-नुकसान को पहले देखेंगे। इसलिए सरकार को पहले सभी दलों को भरोसे में लेना होगा। क्या सरकार ने इस जादुई आंकड़े का कोई रास्ता निकाल लिया है? यह सवाल इस समय दिल्ली की राजनीति में सबसे बड़ा बना हुआ है।
दक्षिण के राज्यों की अपनी अलग चिंताएं
सीटों के नए परिसीमन की बात आते ही दक्षिण भारत के राज्य सतर्क हो जाते हैं। तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की अपनी वाजिब चिंताएं हैं। इन राज्यों ने पिछले दशकों में जनसंख्या नियंत्रण पर बहुत अच्छा काम किया है। उन्होंने अपनी आबादी की वृद्धि दर को काफी नीचे ला दिया है। वहीं उत्तर भारत के कई बड़े राज्यों में जनसंख्या तेजी से बढ़ी है। अगर केवल आबादी के आधार पर सीटें तय होंगी तो दक्षिण का नुकसान होगा। दक्षिण भारत के सांसदों की संख्या संसद में घट सकती है।
दक्षिण के नेताओं का साफ कहना है कि अच्छा काम करने की सजा उन्हें नहीं मिलनी चाहिए। उनका मानना है कि इससे संसद में उनकी राजनीतिक आवाज कमजोर पड़ जाएगी। इस वजह से जब भी सीटों के बंटवारे की बात उठती है तो विवाद खड़ा होता है। सरकार को ऐसा रास्ता निकालना होगा जिससे किसी भी राज्य के साथ अन्याय न हो। चर्चा है कि कुल सीटों की संख्या इतनी बढ़ा दी जाए जिससे किसी राज्य की मौजूदा सीटें कम न हों। नए संसद भवन में 888 लोकसभा सांसदों के बैठने की व्यवस्था पहले से ही मौजूद है।
राजनीतिक दलों की नजरें अब अगले कदम पर
विपक्षी दल सरकार की हर चाल पर पैनी नजर रखे हुए हैं। कांग्रेस और अन्य घटक दलों ने अपने रणनीतिकारों को सक्रिय कर दिया है। उनका कहना है कि सरकार को इतना बड़ा फैसला अकेले नहीं लेना चाहिए। पहले एक सर्वदलीय बैठक बुलाई जानी चाहिए। आम जनता के बीच भी इस बात को लेकर कौतूहल है कि क्या उनका सांसद क्षेत्र बदलने वाला है। निर्वाचन क्षेत्रों के भूगोल में बदलाव सीधे जनता और उनके प्रतिनिधियों को प्रभावित करता है।
द फ्रीलान्स की पड़ताल बताती है कि सरकार पूरी तैयारी के साथ ही सदन में कदम रखेगी। बिना नंबरों का पक्का इंतजाम किए सरकार जोखिम भरा बिल सदन में नहीं लाएगी। अगर विशेष सत्र की तारीखों का ऐलान होता है तो यह इस साल का सबसे बड़ा सियासी घटनाक्रम होगा। आने वाले कुछ दिन दिल्ली की राजनीति में बेहद हलचल भरे साबित हो सकते हैं। सभी की निगाहें अब संसदीय कार्य मंत्रालय और कैबिनेट की अगली बैठकों पर टिकी हैं।










