नई दिल्ली से ग्राउंड रिपोर्ट। देश की राजधानी दिल्ली में इन दिनों आर्थिक गलियारों में हलचल काफी तेज हो चुकी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ हुई खास बैठकों के बाद भारत में एक लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के भारी निवेश का रास्ता साफ हो गया है। ताजा आंकड़ों के अनुसार, यह कुल निवेश 14,72,910 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। इस बड़ी आर्थिक डील ने देश के बाजार और निवेशकों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। सरकारी सूत्रों के मुताबिक, यह पैसा देश के अलग-अलग सेक्टरों में लगाया जाएगा।
इस पूरी डील के पीछे विदेशी निवेशकों और बड़े कॉर्पोरेट दिग्गजों का भरोसा मुख्य वजह बताया जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात के बाद इन कंपनियों ने भारत की विकास यात्रा में अपना पैसा लगाने पर मुहर लगाई है। देश में चल रहे बड़े प्रोजेक्ट्स, डिजिटल क्रांति और मजबूत होती अर्थव्यवस्था के कारण बाहर के निवेशक यहां आने के लिए उत्सुक हैं। यह नया फंड आने वाले कुछ सालों में धीरे-धीरे देश की अलग-अलग विकास योजनाओं में खर्च किया जाएगा।
बिजली संकट और कोयले की कमी से उद्योगों की बढ़ी चिंता
एक तरफ जहां देश में बड़े निवेश के ऐलान हो रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ मैदानी इलाकों से कुछ गंभीर चुनौतियां भी सामने आ रही हैं। देश के कई औद्योगिक क्षेत्रों में कोयले की कमी यानी कोल क्रंच के चलते बिजली संकट गहराने लगा है। कमजोर मॉनसून और बिजली की बढ़ती मांग के कारण उद्योगों पर ब्लैकआउट का साया मंडराने लगा है। अगर समय रहते पावर प्लांटों को पर्याप्त कोयला नहीं मिला, तो कारखानों का कामकाज ठप हो सकता है। यह स्थिति हाल ही में हुए बड़े निवेश के लक्ष्यों के सामने एक बड़ी रुकावट बन सकती है।
उद्योग जगत के जानकारों का मानना है कि जब तक बिजली और ऊर्जा की सप्लाई लगातार बनी नहीं रहेगी, तब तक नए कारखाने और उत्पादन इकाइयां सही से काम नहीं कर पाएंगी। सरकार इस मामले पर लगातार नजर बनाए हुए है और बिजली कंपनियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे अपने भंडार को तुरंत सुधारें। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर छोटे कारखाने अभी भी बिजली कटौती और महंगे पावर बैकअप से परेशान चल रहे हैं।
विदेशों में बैठे भारतीयों की कमाई और रेमिटेंस पर मंडराता जोखिम
देश के बाहर खाड़ी देशों और पश्चिमी मुल्कों में रहने वाले करोड़ भारतीयों की गाढ़ी कमाई पर भी अब भू-राजनीतिक तनाव का साया मंडराने लगा है। अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच चल रही तनातनी के कारण भारत के करीब 4.12 लाख करोड़ रुपये के रेमिटेंस खतरे में पड़ सकते हैं। विदेशों में काम करने वाले हमारे करीब एक करोड़ नागरिकों के परिवार इस पैसे पर निर्भर हैं। अगर युद्ध के हालात और ज्यादा बिगड़ते हैं, तो इन देशों से भारत आने वाले पैसे पर सीधा असर पड़ेगा।
बैंक और वित्तीय मामलों के जानकारों का कहना है कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष अगर लंबा खिंचता है, तो वहां की अर्थव्यवस्था कमजोर होगी। इसका सीधा असर प्रवासी भारतीयों की नौकरियों और उनकी सैलरी पर पड़ेगा। भारत के कुल रेमिटेंस का एक बड़ा हिस्सा इसी इलाके से आता है, इसलिए सरकार और रिजर्व बैंक दोनों ही इस स्थिति पर अपनी पैनी नजर रखे हुए हैं ताकि समय रहते जरूरी कदम उठाए जा सकें।
सरकारी कंपनियों के लिए वरदान बनेगा नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का आईपीओ
इन तमाम आर्थिक उथल-पुथल के बीच शेयर बाजार से एक राहत भरी खबर भी सामने आई है। घाटे में चल रही तीन प्रमुख सरकारी कंपनियों के लिए नेशनल स्टॉक एक्सचेंज यानी एनएसई का आने वाला आईपीओ किसी वरदान से कम साबित नहीं होगा। सरकार इन कंपनियों की वित्तीय सेहत सुधारने के लिए बाजार के जरिए पूंजी जुटाने की तैयारी कर रही है। इस कदम से न सिर्फ इन कंपनियों को कर्ज के दलदल से बाहर निकलने में मदद मिलेगी, बल्कि इनकी कार्यप्रणाली में भी पारदर्शिता आएगी।
द फ्रीलान्स की टीम ने जब बाजार के एक्सपर्ट्स से बात की, तो उन्होंने बताया कि इस आईपीओ से मिलने वाले फंड का इस्तेमाल इन कंपनियों के पुराने नुकसान की भरपाई के लिए किया जाएगा। आम निवेशकों के पास भी इन सरकारी कंपनियों में पैसा लगाकर मुनाफा कमाने का एक नया मौका होगा। हालांकि, बाजार की मौजूदा चाल को देखते हुए निवेशकों को सलाह दी जा रही है कि वे किसी भी शेयर में पैसा लगाने से पहले उसकी पूरी वित्तीय स्थिति की जांच जरूर कर लें।






