नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश की राजनीति में एक बार फिर चुनाव आयोग और विपक्षी दलों के बीच सीधी तनातनी देखने को मिल रही है। कांग्रेस सांसद राहुल गांधी और समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव समेत भारत गठबंधन के 11 प्रमुख नेताओं ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। इन नेताओं ने चुनाव प्रक्रिया और निष्पक्षता को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं। इस याचिका पर जल्द ही देश की सबसे बड़ी अदालत में सुनवाई होने की संभावना है, लेकिन सुनवाई से ठीक पहले याचिका में कई बड़ी तकनीकी अड़चनें सामने आ गई हैं।
कानूनी जानकारों और अदालत की शुरुआती जांच के अनुसार राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं द्वारा दाखिल की गई इस याचिका में कुल 14 तरह की कमियां पाई गई हैं। अदालत के नियमों के मुताबिक किसी भी याचिका को सुनवाई के योग्य बनाने के लिए उसके सभी कानूनी दस्तावेजों और प्रपत्रों का सटीक होना अनिवार्य होता है। इन 14 खामियों में कुछ दस्तावेज अधूरे होना, हस्ताक्षर की औपचारिकताएं पूरी न होना और तकनीकी प्रारूप से जुड़ी आपत्तियां शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार द्वारा इन कमियों को पॉइंट आउट किए जाने के बाद अब याचिकाकर्ताओं को सुनवाई से पहले इन्हें दुरुस्त करना होगा।
याचिका में खामियों और कानूनी पेचीदगियों का पूरा सच
विपक्षी गठबंधन के नेताओं की यह याचिका देश की चुनावी व्यवस्था में पारदर्शिता लाने के दावे के साथ दायर की गई है। लेकिन तकनीकी मोर्चे पर हुई इस चूक ने याचिका की गंभीरता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अदालत में मामलों की सुनवाई के दौरान इस तरह की कमियों को दूर कराना एक अनिवार्य प्रक्रिया है। यदि तय समय के भीतर इन 14 खामियों को ठीक नहीं किया जाता है, तो मामले की सुनवाई में और अधिक देरी हो सकती है। विपक्षी दल के वकील अब इन कमियों को तेजी से दूर करने में जुटे हुए हैं ताकि जल्द से जल्द अदालत में तारीख मिल सके।
इस पूरे घटनाक्रम पर सत्ता पक्ष यानी भारतीय जनता पार्टी ने बेहद तीखी प्रतिक्रिया दी है। बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं ने राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कहा है कि जो व्यक्ति या दल अपनी पार्टी के आंतरिक मामलों और कानूनी याचिकाओं को ठीक से संभाल नहीं सकता, वह देश की जनता का भला क्या करेगा। भाजपा ने इसे सिर्फ एक सियासी स्टंट करार दिया है जिसका मकसद सिर्फ सुर्खियों में बने रहना है। राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि कानूनी मोर्चे पर हुई यह गलती विपक्ष के लिए भारी पड़ सकती है।
विपक्षी एकता और अन्य नेताओं के तीखे सियासी बोल
चुनाव आयोग के खिलाफ इस याचिका में राहुल और अखिलेश के अलावा कई अन्य क्षेत्रीय दलों के दिग्गज नेता भी शामिल हैं। विपक्षी खेमा इसे लोकतंत्र को बचाने की एक बड़ी लड़ाई बता रहा है। उनका दावा है कि चुनाव आयोग निष्पक्ष रूप से काम नहीं कर रहा है और विपक्ष की आवाज को दबाया जा रहा है। दूसरी ओर, असदुद्दीन ओवैसी जैसे विपक्षी दायरे के अन्य नेता भी इस पूरे घटनाक्रम पर लगातार बयान दे रहे हैं। ओवैसी ने एक बयान में कहा कि वे वैचारिक रूप से बीजेपी के खिलाफ हैं, लेकिन विपक्ष को अपनी रणनीति बहुत ही सोच-समझकर और कानूनी रूप से मजबूत होकर बनानी होगी।
मैदान पर उतरी हमारी फील्ड टीम ने पाया कि इस सियासी हलचल के बीच राजधानी दिल्ली में तनावपूर्ण माहौल बना हुआ है। एक तरफ विपक्षी दल मार्च निकाल रहे हैं और सरकार पर आरएसएस को खुली छूट देने का गंभीर आरोप लगा रहे हैं, तो दूसरी तरफ पुलिस प्रशासन भी पूरी तरह मुस्तैद है। राहुल गांधी ने हाल ही में कुछ वीडियो भी शेयर किए हैं जिनमें युवाओं पर कार्रवाई के आरोप लगाए गए हैं। इन तमाम मुद्दों के बीच सुप्रीम कोर्ट में होने वाली आगामी सुनवाई पर पूरे देश की निगाहें टिकी हुई हैं कि अदालत इस याचिका पर क्या रुख अपनाती है।
शीर्ष अदालत में सुनवाई से पहले की प्रशासनिक तैयारियां
सुप्रीम कोर्ट के गलियारों में इस समय इसी याचिका की चर्चा सबसे ज्यादा हो रही है। वकीलों की टीम उन 14 कमियों को दूर करने के लिए दिन-रात एक कर रही है ताकि अदालत में याचिका खारिज होने का कोई खतरा न बचे। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव जैसे संवेदनशील मुद्दे पर अदालत में जाने से पहले पूरी गृहकार्य न करना विपक्ष की लापरवाही को दर्शाता है। अब देखना यह होगा कि जब यह मामला अदालत के सामने औपचारिक रूप से आता है, तो न्यायपालिका इस पर क्या निर्देश देती है और राजनीतिक दलों का अगला कदम क्या होगा।






