चेन्नई/ग्राउंड ब्यूरो — तमिलनाडु में राजनीतिक बैनरों को लेकर विवाद एक बार फिर अदालत की चौखट तक पहुंच गया है। ईसीआर सरवनन ने मद्रास हाईकोर्ट में एक विशेष याचिका दायर की है। इस याचिका में उन्होंने अपने खिलाफ दर्ज पुलिस एफआईआर को पूरी तरह रद्द करने की मांग की है। यह मामला बिना किसी प्रशासनिक मंजूरी के सड़क किनारे बैनर और होर्डिंग्स लगाने से जुड़ा है। स्थानीय पुलिस ने नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर उनके खिलाफ मामला दर्ज किया था। अब इस कानूनी लड़ाई ने राज्य के सियासी गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है।
चेन्नई की सड़कों पर सार्वजनिक सुरक्षा को लेकर प्रशासन लगातार अलर्ट पर है। बिना अनुमति के लगाए गए होर्डिंग्स से पहले भी कई बड़े हादसे हो चुके हैं। इसी वजह से पुलिस ने हाल ही में बिना इजाजत बैनर लगाने वालों पर कड़ी कार्रवाई शुरू की थी। पुलिस का आरोप है कि निर्धारित नियमों को ताक पर रखकर सार्वजनिक स्थान पर बड़े कटआउट लगाए गए थे। इससे सड़क पर चलने वाले आम लोगों की जान को खतरा हो सकता था। इसी आधार पर पुलिस ने संबंधित धाराओं में मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू की थी।
मद्रास हाईकोर्ट में दाखिल याचिका और कानूनी दलीलें
ईसीआर सरवनन ने उच्च न्यायालय में दायर अपनी याचिका में पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि यह एफआईआर दुर्भावना और राजनीतिक दबाव में दर्ज की गई है। याचिका में दावा किया गया है कि उनका इस तरह के बैनर लगाने में कोई सीधा हाथ नहीं था। कार्यकर्ताओं या समर्थकों के उत्साह में किए गए काम का दोष सीधे तौर पर उन पर नहीं मढ़ा जा सकता। याचिकाकर्ता के वकीलों का तर्क है कि बिना किसी पुख्ता सबूत के सीधे नामजद रिपोर्ट दर्ज करना कानूनन सही नहीं है।
याचिका में अदालत से गुहार लगाई गई है कि जब तक मामले की अंतिम सुनवाई न हो, तब तक पुलिस कार्रवाई पर रोक लगाई जाए। बचाव पक्ष का कहना है कि पुलिस ने बिना उचित कानूनी प्रक्रिया अपनाए जल्दबाजी में केस दर्ज किया। अगर इस तरह की एफआईआर को जारी रखा जाता है, तो इससे उनकी सामाजिक और राजनीतिक छवि को गहरा नुकसान पहुंचेगा। इसी आधार पर उन्होंने अदालत से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा के तहत इस मामले को तुरंत खारिज करने की अपील की है।
तमिलनाडु में सड़कों पर अवैध होर्डिंग्स का पुराना विवाद
तमिलनाडु की राजनीति में बड़े-बड़े कटआउट और होर्डिंग्स लगाने का चलन काफी पुराना रहा है। किसी भी राजनीतिक कार्यक्रम या नेता के दौरे पर पूरे शहर को बैनरों से पाट दिया जाता है। लेकिन बीते कुछ वर्षों में इन अवैध बैनरों की वजह से कई निर्दोष लोगों की जान जा चुकी है। कुछ साल पहले चेन्नई में एक युवती की मौत होर्डिंग गिरने और उसके बाद वाहन की चपेट में आने से हो गई थी। उस घटना के बाद से आम जनता और सामाजिक संगठनों में भारी गुस्सा देखा गया था।
इस दर्दनाक हादसे के बाद मद्रास हाईकोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अपनाया था। अदालत ने राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन को सख्त आदेश दिए थे कि किसी भी सूरत में सड़कों पर अवैध बैनर बर्दाश्त न किए जाएं। नगर निगम ने भी इसके लिए कड़े नियम बनाए हैं। अब किसी भी सार्वजनिक स्थान पर कोई भी बोर्ड लगाने के लिए पहले से अनुमति लेना अनिवार्य है। इसके बावजूद कई मौकों पर राजनीतिक दल और उनके समर्थक इन नियमों की अनदेखी करते पाए जाते हैं।
प्रशासन की सख्ती और आम जनता की सुरक्षा का सवाल
अदालत के कड़े निर्देशों के बाद चेन्नई पुलिस और ग्रेटर चेन्नई कॉरपोरेशन अब ऐसे मामलों में नरमी बरतने के मूड में नहीं हैं। अधिकारियों का साफ कहना है कि कानून सबके लिए बराबर है। चाहे कोई बड़ा नेता हो या आम नागरिक, बिना इजाजत सार्वजनिक रास्तों पर ढांचा खड़ा करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। ऐसे अवैध ढांचे अक्सर तेज हवाओं में गिर जाते हैं। इससे दोपहिया वाहन चालकों और पैदल चलने वालों के लिए गंभीर खतरा पैदा हो जाता है। पुलिस ने शहर के कई इलाकों में गश्त बढ़ा दी है और ऐसे बोर्ड तुरंत हटाए जा रहे हैं।
स्थानीय लोगों का भी यही मानना है कि शक्ति प्रदर्शन के लिए सड़कों को बंधक नहीं बनाया जाना चाहिए। लोगों का कहना है कि त्योहारों या सियासी आयोजनों के नाम पर फुटपाथ घेर लिए जाते हैं। इससे आने-जाने वालों को भारी परेशानी होती है। कई बार वाहन चालकों का ध्यान भटकने से भी छोटी-बड़ी दुर्घटनाएं हो जाती हैं। आम जनता अदालत की इस सख्ती का पूरी तरह समर्थन कर रही है। लोगों की मांग है कि पुलिस बिना किसी राजनीतिक भेदभाव के हर उल्लंघनकर्ता पर समान रूप से कार्रवाई करे।
अदालत के आगामी रुख और आगे की कानूनी राह पर नजर
मद्रास हाईकोर्ट आने वाले दिनों में इस याचिका पर विस्तार से सुनवाई कर सकता है। कानूनी जानकारों का मानना है कि अदालत सार्वजनिक सुरक्षा के मुद्दों पर पहले से बहुत सख्त है। ऐसे में याचिकाकर्ता को राहत पाने के लिए कई पुख्ता कानूनी दलीलें पेश करनी होंगी। अदालत यह देखेगी कि क्या वाकई एफआईआर में कोई कानूनी खामी है या फिर नियमों की सीधी अवहेलना की गई थी। सरकारी वकील भी पुलिस कार्रवाई के पक्ष में अपने दस्तावेज और तस्वीरें अदालत के सामने पेश करने की तैयारी में हैं।
द फ्रीलान्स की ग्राउंड पड़ताल में यह साफ हुआ है कि इस मामले का असर केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहेगा। अगर अदालत इस मामले में कोई सख्त टिप्पणी करती है, तो इसका सीधा असर पूरे राज्य की राजनीतिक गतिविधियों पर पड़ेगा। सभी राजनीतिक दलों को अपने कार्यकर्ताओं को कड़े निर्देश देने होंगे ताकि वे सार्वजनिक सुरक्षा से कोई समझौता न करें। अब हर किसी की नजर हाईकोर्ट के उस फैसले पर टिकी है जो यह तय करेगा कि ईसीआर सरवनन को कानूनी राहत मिलेगी या उन्हें मामले की नियमित जांच का सामना करना पड़ेगा।







