नई दिल्ली के मध्य में स्थित रामलीला मैदान हमेशा से आम आदमी की आवाज का सबसे बड़ा केंद्र रहा है। जब भी देश की सियासत में कोई बड़ा भूचाल आता है, इस मैदान की याद सबसे पहले आती है। दशकों से यह जगह विरोध प्रदर्शनों, रैलियों और ऐतिहासिक अनशनों का गवाह बनती रही है। लोग अपनी मांगों को लेकर यहां इकट्ठा होते हैं और सरकारें उनकी ताकत के आगे झुकने को मजबूर हो जाती हैं।
इस मैदान के इतिहास को पलटकर देखें तो सत्तर के दशक में जयप्रकाश नारायण यानी जेपी का आंदोलन यहां का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट था। आपातकाल के विरोध में उठी उस आंधी ने देश की सियासत का नक्शा ही बदल दिया था। जेपी ने इसी रामलीला मैदान से संपूर्ण क्रांति का आह्वान किया था। उस ऐतिहासिक जनसैलाब ने तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार की नींव को हिलाकर रख दिया था।
अन्ना हजारे के 12 दिन जिन्होंने देश की राजनीति बदल दी
साल 2011 का वह दौर शायद ही कोई देशवासी भूल पाएगा जब सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने यहां ऐतिहासिक अनशन शुरू किया था। भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल बिल की मांग को लेकर पूरा देश रामलीला मैदान के इर्द-गिर्द सिमट गया था। बच्चे, बूढ़े, युवा और महिलाएं, हर वर्ग का इंसान बदलाव की आस में यहां पहुंचा था। अन्ना के उस बारह दिन के अनशन ने मजबूत मानी जाने वाली यूपीए सरकार को पूरी तरह घुटनों पर ला दिया था।
देश की राजधानी में अनशन और धरने के लिए यूं तो जंतर-मंतर को भी जाना जाता है, लेकिन बड़े पैमाने पर जब जनसैलाब उमड़ता है तो रामलीला मैदान ही एकमात्र विकल्प बचता है। निर्भया इंसाफ आंदोलन और अन्य कई सामाजिक मुद्दों पर भी दिल्ली की सड़कों और मैदानों ने जनता का भारी आक्रोश देखा है। सरकारें समझ चुकी हैं कि इस मैदान पर उठने वाली आवाज को लंबे समय तक नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।
गांधी, जेपी और अन्na की राह पर सोनम वांगचुक का अनशन
हाल के दिनों में पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक के आंदोलन और अनशन को मिल रहा भारी समर्थन भी इसी पुरानी परंपरा की याद दिलाता है। लद्दाख के लिए संवैधानिक सुरक्षा और छठी अनुसूची की मांग को लेकर लोग एक बार फिर गांधीवादी तरीकों से अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं। इतिहास गवाह है कि जब भी अहिंसक तरीके से अनशन और सत्याग्रह का रास्ता अपनाया जाता है, सत्ता के गलियारों में हलचल जरूर मच जाती है।
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि रामलीला मैदान की माटी में ही कुछ ऐसा है जो आम जनता की ऊर्जा को एक बड़ी ताकत में बदल देता है। यहां मंच से जब कोई नेता या सामाजिक कार्यकर्ता बोलता है, तो उसकी गूंज सीधे संसद तक पहुंचती है। इतिहास से लेकर वर्तमान तक, यह मैदान इस बात का प्रमाण है कि लोकतंत्र में असली ताकत जनता के हाथों में ही होती है।
सत्ता और जनता के बीच संवाद का सबसे बड़ा केंद्र
आज भी जब कोई नया आंदोलन शुरू होता है, तो उसकी तुलना सीधे जेपी या अन्ना के आंदोलनों से की जाती है। रामलीला मैदान केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं बल्कि भारतीय लोकतंत्र का जीवंत दस्तावेज है। आने वाले समय में भी जब-जब जनता अपने अधिकारों के लिए लड़ेगी, इस ऐतिहासिक मैदान की भूमिका उतनी ही अहम बनी रहेगी। द फ्रीलान्स की ग्राउंड रिपोर्ट बताती है कि लोगों का इस जगह पर भरोसा आज भी उतना ही मजबूत है जितना दशकों पहले हुआ करता था।



