नई दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में इन दिनों विरोध प्रदर्शन करने की जगह को लेकर एक बड़ा संकट खड़ा हो गया है। पहले से ही पाबंदियों और अनुमति की लंबी प्रक्रियाओं से जूझ रहे जंतर-मंतर के बाद अब शहर के दूसरे सबसे बड़े विरोध स्थल यानी रामलीला मैदान में भी धरना-प्रदर्शन करना आम लोगों के पहुंच से बाहर होता जा रहा है। स्थिति यह है कि रामलीला मैदान की एडवांस बुकिंग अगले ढाई महीने तक पूरी तरह फुल चल रही है। किसी भी नए संगठन या राजनीतिक दल को अपनी बात रखने के लिए अब लंबी कतार में खड़ा होना पड़ रहा है और महीनों इंतजार करना पड़ रहा है।
मैदान की बुकिंग फुल होने के साथ-साथ इसका आर्थिक बोझ भी कई गुना बढ़ गया है। रामलीला मैदान को बुक करने का शुल्क अब बढ़कर लाखों रुपये तक पहुंच गया है। इतनी भारी-भरकम फीस चुकाना छोटे सामाजिक संगठनों, छात्र संघों और असंतुष्ट समूहों के लिए मुमकिन नहीं हो पा रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या राजधानी में आम जनता की आवाज उठाने के रास्ते धीरे-धीरे बंद किए जा रहे हैं। बिना पैसे और बड़े संसाधनों के अब दिल्ली की धरती पर अपनी मांग रखना एक बहुत बड़ा सपना बनता जा रहा है, जिससे जमीनी स्तर के कार्यकर्ता खासे परेशान हैं।
प्रशासनिक नियम और सुरक्षा के कड़े घेरे
रामलीला मैदान और जंतर-मंतर जैसे प्रमुख स्थलों पर इस तरह की पाबंदियां केवल बुकिंग तक ही सीमित नहीं हैं। दिल्ली पुलिस और स्थानीय प्रशासन द्वारा सुरक्षा के नाम पर कई तरह की कड़ी शर्तें थोप दी जाती हैं। आयोजकों को यह साबित करना पड़ता है कि उनके कार्यक्रम में भीड़ नियंत्रण कैसे होगा और किसी भी प्रकार की अप्रिय घटना से निपटने के लिए उनके पास क्या इंतजाम हैं। इसके अलावा, सोशल मीडिया पर फैलने वाली अफवाहों पर भी पुलिस की पैनी नजर है। हाल ही में दिल्ली के कुछ प्रदर्शनों के दौरान फायरिंग जैसी झूठी अफवाहें फैलाई गईं, जिसके बाद पुलिस ने तुरंत एक्शन लेते हुए तीन सौ से ज्यादा आपत्तिजनक और भ्रामक सोशल मीडिया पोस्ट हटा दिए।
प्रशासन का तर्क है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने और शहर की शांति भंग न हो, इसलिए ये तमाम कदम उठाने जरूरी हो जाते हैं। लेकिन दूसरी तरफ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और विपक्षी दलों का कहना है कि यह सब विरोध की आवाज को दबाने का एक सुनियोजित तरीका है। जब धरना देने के लिए जगह ही नहीं मिलेगी और उसकी कीमत इतनी ज्यादा होगी कि गरीब या मध्यम वर्ग का संगठन वहां पहुंच ही न सके, तो लोकतंत्र में संवाद का रास्ता कैसे खुलेगा। प्रशासन की अनुमति मिलने में हफ्तों लग जाते हैं और तब तक आंदोलन की मूल भावना या मुद्दा ही ठंडा पड़ जाता है।
बढ़ती महंगाई और राजनीतिक सरगर्मी
राजधानी में केवल मैदानों की बुकिंग महंगी नहीं हुई है, बल्कि सार्वजनिक आयोजनों से जुड़े हर पहलू पर खर्च बढ़ गया है। टेंट, साउंड सिस्टम, बिजली और सुरक्षा गार्डों का खर्च भी आसमान छू रहा है। ऐसे माहौल में राजनीतिक दल तो अपनी रैलियों का खर्च किसी तरह उठा लेते हैं, लेकिन आम जनता के असल मुद्दों को उठाने वाले स्वतंत्र समूह पीछे छूट जाते हैं। देश के दूसरे राज्यों में भी चुनावी और राजनीतिक हलचल के बीच विरोध के तौर-तरीकों पर बहस छिड़ी हुई है। एक तरफ जहां असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा जैसे नेता कांग्रेस को चुनौती दे रहे हैं कि वे चाहें तो बैलेट पेपर से चुनाव लड़कर देख लें, वहीं दूसरी तरफ दिल्ली की सड़कों पर अपनी बात रखने के लिए तरसते आम नागरिक लोकतांत्रिक अधिकारों के सिकुड़ते दायरे पर सवाल उठा रहे हैं।
जमीनी हकीकत यह है कि रामलीला मैदान और जंतर-मंतर जैसी जगहों का इतिहास बड़े-बड़े आंदोलनों का गवाह रहा है, जहां से देश की राजनीति की दिशा बदली है। लेकिन आज उन्हीं ऐतिहासिक मैदानों पर ताले लटक रहे हैं या फिर उनके दरवाजे केवल ऊंची कीमत चुकाने वालों के लिए ही खुल रहे हैं। 'द फ्रीलान्स' की इस पड़ताल से साफ है कि आने वाले दिनों में राजधानी में आवाज उठाने के लोकतांत्रिक तरीकों पर संकट और गहरा सकता है। अगर यही हाल रहा तो आम आदमी अपनी नाराजगी दर्ज कराने के लिए सिर्फ वर्चुअल दुनिया यानी सोशल मीडिया तक सीमित रह जाएगा, जहां भी पुलिस और प्रशासन की एल्गोरिदम और सेंसरशिप का कड़ा पहरा बैठा हुआ है।





