नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना के नाम और चुनाव चिन्ह को लेकर छिड़ी कानूनी लड़ाई अब सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे पर पहुंच गई है। मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट ने उच्चतम न्यायालय में निर्वाचन आयोग के उस फैसले का खुलकर बचाव किया है जिसमें पार्टी का नाम और तीर-कमान का निशान शिंदे गुट को दिया गया था। शिंदे पक्ष के वकीलों ने अदालत में साफ शब्दों में कहा कि असली शिवसेना वही है जिसके पास बहुमत और संगठन का समर्थन है। इस मामले की सुनवाई देश की सबसे बड़ी अदालत में लगातार जारी है जिस पर पूरे देश की नजरें टिकी हुई हैं।
सुनवाई के दौरान शिंदे गुट की ओर से पेश वकीलों ने मुख्य न्यायाधीश के सामने अपनी दलीलें रखीं। वकीलों ने कहा कि पार्टी के भीतर लोकतांत्रिक प्रक्रिया का पालन करते हुए अधिकांश विधायक और सांसद उनके साथ आए थे। निर्वाचन आयोग ने सभी दस्तावेजों और सबूतों की बारीकी से जांच करने के बाद ही यह फैसला सुनाया था। शिंदे गुट का यह भी कहना है कि जनता के बीच भी उनकी विचारधारा को ही असली शिवसेना माना गया है। ऐसे में चुनाव आयोग के फैसले में किसी भी तरह की खामी निकालना पूरी तरह से गलत है।
निर्वाचन आयोग के फैसले का अदालत में कड़ा बचाव
दूसरी तरफ, इस पूरे कानूनी विवाद में उद्धव ठाकरे गुट की आपत्तियों पर भी लगातार बहस हो रही है। ठाकरे गुट का आरोप है कि चुनाव आयोग का फैसला एकतरफा था और उसने बिना पूरी बात सुने ही फैसला सुना दिया था। इसके जवाब में शिंदे गुट ने अदालत को बताया कि पार्टी के संविधान और आंतरिक चुनावों के नियमों के तहत ही बहुमत तय होता है। जब पार्टी के अधिकांश चुने हुए प्रतिनिधि उनके साथ हैं, तो नाम और निशान पर उनका स्वाभाविक हक बनता है। इस दलील के जरिए शिंदे खेमा अदालत में अपनी स्थिति बेहद मजबूत दिखाने की कोशिश कर रहा है।
कानूनी जानकारों का मानना है कि इस मामले में विधानसभा स्पीकर के फैसले की भूमिका भी बहुत अहम है। यदि स्पीकर द्वारा विधायकों को अयोग्य न ठहराने का फैसला किसी तकनीकी कारण से बदलता है, तो निर्वाचन आयोग द्वारा दिए गए चुनाव चिन्ह आवंटन पर भी असर पड़ सकता है। इसी को ध्यान में रखते हुए दोनों पक्ष अपनी-अपनी कानूनी रणनीतियां तैयार कर रहे हैं। कोर्ट रूम के बाहर और अंदर दोनों जगहों पर वकीलों के बीच तीखी बहस देखने को मिल रही है, जिससे इस मामले की जटिलता और ज्यादा बढ़ गई है।
बहुमत और संगठन के आधार पर तय होती है असली पार्टी
द फ्रीलान्स की टीम ने इस मामले से जुड़े कानूनी पहलुओं को समझने के लिए वरिष्ठ वकीलों से बातचीत की। वकीलों का कहना है कि जब किसी पार्टी में दो फाड़ होती है, तो चुनाव आयोग यह देखता है कि किसके पास विधायी बहुमत यानी विधायक और सांसद ज्यादा हैं। निर्वाचन आयोग ने इसी पैमाने पर फैसला लेते हुए शिंदे गुट को असली शिवसेना माना था। अब सुप्रीम कोर्ट यह तय करेगा कि आयोग का यह फैसला कानून की कसौटी पर कितना खरा उतरता है और इसमें किसी प्रकार के बदलाव की गुंजाइश है या नहीं।
महाराष्ट्र की सियासत के लिहाज से यह फैसला बहुत दूरगामी परिणाम देने वाला है। राज्य में स्थानीय निकाय के चुनाव और आगामी राजनीतिक भविष्य इसी कानूनी फैसले पर टिकी हुई हैं। आम जनता भी यह जानना चाहती है कि आखिर असली शिवसेना का अधिकार किसे पूरी तरह मिलेगा। कोर्ट की अगली तारीख पर सभी पक्षों की नजरें हैं क्योंकि इस मुकदमे का फैसला देश की दलीय राजनीति और चुनाव आयोग के अधिकारों पर एक बड़ा उदाहरण बन सकता है।
कानूनी दांवपेंच और राजनीतिक भविष्य की दिशा
सुप्रीम कोर्ट में चल रही इस मैराथन बहस के बीच दोनों खेमों के नेता अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने में जुटे हैं। शिंदे गुट का आत्मविश्वास इस बात से बढ़ा हुआ है कि उनके पास सरकार और संगठन दोनों का समर्थन है। वहीं उद्धव ठाकरे गुट इस कानूनी लड़ाई को अपनी राजनीतिक सहानुभूति हासिल करने का मुख्य जरिया बना रहा है। आने वाले दिनों में अदालत का यह फैसला भारतीय राजनीतिक इतिहास के सबसे बड़े फैसलों में से एक साबित हो सकता है।


