नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — राजधानी दिल्ली में सीजेपी यानी छात्र और युवा प्रदर्शन के दौरान पुलिस द्वारा किए गए लाठीचार्ज और बल प्रयोग का मामला अब बेहद गंभीर मोड़ पर आ गया है। द फ्रीलान्स की टीम ने जब इस पूरे घटनाक्रम की जमीनी पड़ताल की, तो सामने आया कि प्रदर्शन के दौरान कई छात्रों को बिना किसी ठोस कानूनी आधार के हिरासत में लिया गया था। पुलिस कार्रवाई के इन वीडियो और तस्वीरों ने मानवाधिकार संगठनों और छात्र समूहों को झकझोर कर रख दिया है। अब इस पूरे मामले में देश की सबसे बड़ी अदालत ने स्वतः संज्ञान लेते हुए बड़ा हस्तक्षेप किया है।
सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट ने इस घटना पर गहरी नाराजगी जताई है और केंद्र सरकार तथा दिल्ली पुलिस को औपचारिक नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। अदालत ने अपने कड़े आदेश में साफ कहा है कि प्रदर्शन स्थल और उसके आसपास लगे सभी सीसीटीवी कैमरों के वीडियो फुटेज को तुरंत सुरक्षित रखा जाए। किसी भी फुटेज से छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए ताकि यह साफ हो सके कि लाठीचार्ज की शुरुआत किसने और किन हालात में की थी। बार एंड बेंच और अन्य कानूनी रिपोर्टों के अनुसार, कोर्ट ने यह कदम इसलिए उठाया है ताकि कानून लागू करने वाली एजेंसियों की जवाबदेही तय की जा सके।
बिना आपराधिक रिकॉर्ड वाले छात्रों की तुरंत रिहाई का आदेश
शीर्ष अदालत ने अपने अंतरिम आदेश में यह भी स्पष्ट किया है कि जिन छात्रों या प्रदर्शनकारियों का कोई पुराना आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है, उन्हें बिना किसी देरी के तुरंत रिहा किया जाना चाहिए। इसके अलावा, प्रदर्शन में शामिल रहे नाबालिग बच्चों को भी फौरन उनके परिवार के सुपुर्द करने के निर्देश दिए गए हैं। एबीपी न्यूज और द प्रिंट की रिपोर्ट बताती है कि कोर्ट के इस फैसले से हिरासत में मौजूद छात्रों के परिजनों को बड़ी राहत मिली है। पिछले कुछ दिनों से देश के अलग-अलग हिस्सों में छात्रों के परिवारों में अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर भारी डर और तनाव का माहौल बना हुआ था।
दिल्ली हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान वकीलों ने दलील दी कि शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांग रख रहे छात्रों पर पुलिस ने जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग किया। पुलिस की इस कार्रवाई में कई छात्र गंभीर रूप से घायल हुए हैं जिन्हें अस्पतालों में भर्ती कराना पड़ा। एनडीटीवी इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, अदालत ने पुलिस प्रशासन से पूछा है कि आखिर किस कानून के तहत छात्रों को हिरासत में रखा गया और उन पर लाठीचार्ज करने के क्या कारण थे। केंद्र सरकार और पुलिस प्रशासन को इस मामले में अपना विस्तृत जवाब दाखिल करने के लिए कहा गया है।
सभी राज्यों में प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई पर रोक
इस कानूनी लड़ाई का दायरा अब सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी राज्यों को निर्देश जारी कर दिए हैं। कोर्ट ने आदेश दिया है कि हालिया प्रदर्शनों के सिलसिले में किसी भी राज्य में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दंडात्मक और अनुचित कार्रवाई नहीं की जाएगी। ईटीवी भारत की रिपोर्ट के अनुसार, संसद मार्च और अन्य जगहों पर हुए प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की कार्यशैली सवालों के घेरे में आ गई है। विश्लेषकों का मानना है कि इस आदेश से लोकतांत्रिक तरीके से विरोध प्रदर्शन करने के नागरिकों के मौलिक अधिकारों को और मजबूती मिलेगी।
जमीनी स्तर पर हमारे संवाददाताओं ने पाया कि यूनिवर्सिटी परिसरों और छात्र संगठनों में कोर्ट के इस फैसले के बाद राहत की सांस ली गई है। छात्र नेताओं का कहना है कि वे शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का हक जारी रखेंगे और न्यायपालिका पर उनका भरोसा और मजबूत हुआ है। हालांकि, पुलिस और प्रशासन की ओर से अभी तक इस मामले पर कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। आने वाले दिनों में जब केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस अपना जवाब कोर्ट में पेश करेंगी, तब इस मामले की तस्वीर और अधिक साफ होगी।
सीसीटीवी फुटेज और पुलिस जवाबदेही पर आगे की कानूनी राह
इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या पुलिस सीसीटीवी फुटेज को अदालत के सामने निष्पक्ष रूप से पेश करेगी। कानूनी जानकारों का मानना है कि वीडियो सबूत ही इस मामले में सबसे बड़ा आधार बनेंगे जो यह तय करेंगे कि पुलिस ने कानून के दायरे में रहकर काम किया या फिर शक्ति का दुरुपयोग हुआ। द फ्रीलान्स की टीम इस मामले की अगली सुनवाई तक हर कानूनी अपडेट और जमीनी हलचल पर अपनी पैनी नजर बनाए रखेगी। देश के नागरिकों की निगाहें अब सुप्रीम कोर्ट की अगली तारीख पर टिकी हैं जहां इस गंभीर मामले पर फिर से सुनवाई होनी है।










