लखनऊ/प्रयागराज — उत्तर प्रदेश की ग्रामीण राजनीति से जुड़ी इस वक्त की सबसे बड़ी खबर सामने आ रही है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि उत्तर प्रदेश में अगले तीन महीने के भीतर पंचायत चुनाव संपन्न कराए जाएं। अदालत के इस कड़े आदेश के बाद प्रदेश के प्रशासनिक हलकों में सरगर्मी अचानक बहुत तेज हो गई है। गांव की राजनीति करने वाले संभावित उम्मीदवारों और राजनीतिक दलों ने अपनी कमर कस ली है। ग्रामीण इलाकों में अब बैठकों का दौर शुरू हो गया है और हर कोई अपने हिसाब से समीकरण बैठाने में जुट गया है। कोर्ट के इस फैसले से साफ है कि चुनाव आयोग और राज्य सरकार को अब तय समय सीमा के भीतर अपनी सारी तैयारियां पूरी करनी होंगी।
इस पूरे मामले की खास बात यह है कि अदालत ने चुनाव कराने के साथ-साथ आरक्षण के नियमों पर भी बहुत जोर दिया है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से कहा है कि पंचायत चुनावों के दौरान 27 प्रतिशत आरक्षण के नियमों का पूरी ईमानदारी से पालन किया जाना चाहिए। जानकारों का मानना है कि आरक्षण के नियमों को लेकर पहले भी कई तरह के विवाद सामने आते रहे हैं। ऐसे में अदालत का यह निर्देश बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है। राज्य के चुनाव आयोग और पंचायती राज विभाग के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे कम समय में पूरी पारदर्शिता के साथ आरक्षण की सूची तैयार करें और निष्पक्ष चुनाव कराएं।
तीन महीने की सख्त समयसीमा और प्रशासनिक तैयारियां
हाईकोर्ट के इस नए आदेश के बाद राज्य के निर्वाचन आयोग पर भारी दबाव बढ़ गया है। तीन महीने का समय चुनाव जैसी बड़ी प्रक्रिया के लिए बहुत ज्यादा लंबा नहीं होता है। वोटर लिस्ट को अपडेट करना, पोलिंग बूथ तय करना और सुरक्षा बलों की तैनाती जैसे बड़े काम अब बहुत कम वक्त में पूरे करने होंगे। जिला प्रशासन के अधिकारियों का कहना है कि उन्हें अभी तक आदेश की आधिकारिक प्रति मिल चुकी है और वे बहुत जल्द जमीनी स्तर पर काम शुरू कर देंगे। गांवों में तैनात कर्मचारियों की छुट्टियां रद्द की जा सकती हैं ताकि समय पर सभी जरूरी प्रशासनिक औपचारिकताएं पूरी की जा सकें। जिलाधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे अपने-अपने जिलों में चुनावी तैयारियों की समीक्षा तुरंत शुरू कर दें।
दूसरी तरफ, गांव की चौपालों और बैठकों में अब सिर्फ और सिर्फ चुनाव की ही चर्चा हो रही है। प्रधान पद, बीडीसी और जिला पंचायत सदस्य बनने की चाह रखने वाले लोग अभी से अपने इलाकों में सक्रिय हो गए हैं। कई संभावित उम्मीदवारों ने तो अपने प्रचार का हल्का-फुल्का दौर भी शुरू कर दिया है। हालांकि, वे लोग अभी कोर्ट के आदेश और आरक्षण की फाइनल सूची का इंतजार कर रहे हैं ताकि उन्हें अपनी सीट के सही समीकरण का पता चल सके। ग्रामीण जनता भी इस बात को लेकर उत्साहित है कि उन्हें अपनी स्थानीय सरकार चुनने का मौका जल्द ही मिलने वाला है। सड़क, पानी, नाली और बिजली जैसे बुनियादी मुद्दों पर इस बार चुनाव में बड़ी बहस होने की पूरी उम्मीद है।
आरक्षण के नए नियमों पर टिकी सबकी निगाहें
इस बार के पंचायत चुनावों में सबसे बड़ा पेच आरक्षण के फार्मूले को लेकर फंसा हुआ है। हाईकोर्ट ने जिस प्रकार से 27 प्रतिशत आरक्षण के पालन की बात कही है, उससे कई पुरानी सीटों का गणित बदल सकता है। कई गांवों में लोग इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि किस वार्ड या सीट पर कौन सी श्रेणी लागू होगी। प्रशासन के सामने यह भी चुनौती होगी कि वह बिना किसी विवाद के पूरी पारदर्शिता के साथ आरक्षण का निर्धारण करे। अगर इसमें कोई भी गड़बड़ी पाई जाती है, तो मामला एक बार फिर अदालत में जा सकता है, जिससे चुनाव में देरी हो सकती है। इसलिए स्थानीय प्रशासन बहुत फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है और हर एक दस्तावेज की बारीकी से जांच की जा रही है।
राजनीतिक दल भी इस फैसले के बाद अंदरखाने अपनी रणनीति तैयार करने में जुट गए हैं। भले ही पंचायत चुनाव दलीय आधार पर नहीं होते हैं, लेकिन हर पार्टी का छिपा हुआ समर्थन अपने-अपने उम्मीदवारों को रहता है। विधायक और सांसद स्तर के नेता भी अब अपने-अपने विधानसभा क्षेत्रों में सक्रिय होने लगे हैं ताकि स्थानीय निकायों पर मजबूत पकड़ बनाई जा सके। गांव की सरकार का यह चुनाव अगले साल होने वाले बड़े राजनीतिक घटनाक्रमों का सेमीफाइनल भी माना जाता है। यही वजह है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही इस चुनाव को हल्के में लेने की गलती नहीं करना चाहते हैं।
द फ्रीलान्स की ग्राउंड पड़ताल और आगे की राह
द फ्रीलान्स की टीम ने जब उत्तर प्रदेश के कुछ ग्रामीण इलाकों का दौरा किया, तो लोगों में एक अलग ही जोश दिखाई दिया। लोग मानते हैं कि समय पर चुनाव होने से गांवों का विकास रुकता नहीं है। पिछले कुछ महीनों से चुनाव टलने की वजह से कई विकास कार्य ठप पड़े थे, क्योंकि पुरानी पंचायतों के पास सीमित अधिकार रह गए थे। अब नए प्रतिनिधियों के आने से गांवों में विकास की रफ्तार फिर से पटरी पर लौटने की उम्मीद है। लोग यह भी चाहते हैं कि चुनाव पूरी तरह निष्पक्ष हों और किसी तरह का प्रशासनिक दबाव न दिखे।
आने वाले कुछ दिनों में राज्य निर्वाचन आयोग अपनी विस्तृत कार्ययोजना सार्वजनिक कर सकता है। सीलबंद लिफाफों और अदालती बहसों के दौर से निकलकर अब मामला सीधे जमीन पर उतर आया है। राज्य सरकार और निर्वाचन आयोग के अगले कदम पर पूरे प्रदेश की नजर टिकी हुई है। क्या प्रशासन सचमुच तीन महीने के भीतर इस बड़ी चुनौती को पार कर पाएगा, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। लेकिन इतना तय है कि उत्तर प्रदेश की ग्रामीण राजनीति में अब अगले कुछ महीनों तक सरगर्मी बहुत ज्यादा रहने वाली है। 'द फ्रीलान्स' इस पूरे घटनाक्रम पर लगातार अपनी पैनी नजर बनाए रखेगा और हर छोटी-बड़ी खबर आप तक पहुंचाता रहेगा।








