मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ हालिया प्रोटेस्ट के दौरान सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद सुरक्षा के नाम पर मेट्रो स्टेशनों की तालाबंदी और प्रदर्शनकारियों की बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां देखने को मिलीं। लॉ एंड ऑर्डर के नाम पर अदालती आदेशों को ठेंगा दिखाने का यह ट्रेंड नया नहीं है। सवाल उठता है कि क्या अवमानना का खौफ अब सिर्फ कागजी रिप्लाई तक सीमित रह गया है?
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर दिल्ली में जब कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) और विपक्ष के विरोध प्रदर्शन का ऐलान हुआ, तो राजधानी में सुरक्षा के नाम पर अभूतपूर्व पाबंदियां लगा दी गईं। मामला सर्वोच्च अदालत तक पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने बहुत सख्त लहजे में कहा कि "मक्खी मारने के लिए हथौड़े का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता"। अदालत ने साफ हिदायत दी कि लॉ एंड ऑर्डर की आड़ में मेट्रो स्टेशन पूरी तरह बंद न किए जाएं और न ही ट्रेनों की आवाजाही पर मुकम्मल रोक लगाई जाए। लेकिन अगले ही दिन जमीनी हकीकत कुछ और ही थी। करीब 57 मेट्रो स्टेशन पूरी तरह सील कर दिए गए, दिल्ली आने वाली तमाम ट्रेनें रद्द रहीं और करीब 7,000 लोगों को शांति बहाली के नाम पर हिरासत में ले लिया गया।
अदालती आदेश और जमीनी हकीकत का फासला
कानून की किताबों में अदालत के आदेश का पालन न करना या उसकी अवहेलना करना अदालत की अवमानना माना जाता है। इसके लिए सजा और जुर्माने के कड़े प्रावधान हैं। लेकिन जब मामला पुलिस और प्रशासनिक तंत्र से जुड़ा होता है, तो कागजी आदेश और मौके पर की जाने वाली कार्रवाई के बीच एक बड़ी खाई दिखती है। प्रशासन अदालत के सामने तो बेहद अदब से आदेश का पालन करने की हामी भर देता है, लेकिन मैदान में उतरते ही उसकी रणनीति पूरी तरह बदल जाती है।
जब सुप्रीम कोर्ट ने मेट्रो और ट्रेनों को आंशिक रूप से चालू रखने और 'प्रिंसिपल ऑफ प्रोपोर्शनैलिटी' का पालन करने को कहा, तब सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को भरोसा दिलाया था कि स्थिति को नियंत्रित करते हुए आवाजाही सुचारू रखी जाएगी। मगर हकीकत में प्रशासन ने सुरक्षा के नाम पर पूरी राजधानी की घेराबंदी कर दी। सवाल यह उठता है कि क्या पुलिस-प्रशासन सुप्रीम कोर्ट के रुख को भांपकर यह मान चुका है कि अवमानना का नोटिस महज एक औपचारिकता है?
इतिहास के झरोखे से: बाबरी मस्जिद से लेकर हालिया मामलों तक
अदालती आदेशों के नजरअंदाज होने का यह सिलसिला नया नहीं है। देश के इतिहास में ऐसे कई मोड़ आए हैं जब सुप्रीम कोर्ट के सीधे और स्पष्ट आदेशों को ठेंगा दिखाया गया। 1992 में बाबरी ढांचा गिराए जाने से ठीक पहले उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में बाकायदा हलफनामा दाखिल करके आश्वस्त किया था कि विवादित ढांचे की हर हाल में सुरक्षा की जाएगी। लेकिन 6 दिसंबर 1992 को जो हुआ, वह पूरे देश ने देखा।
इसी तरह मध्यप्रदेश में सिंगरौली खदानों की माइनिंग के खिलाफ प्रोटेस्ट पर पुलिस प्रशासन की मनमानी के खिलाफ भी अदालत ने अवमानना का नोटिस दिया। हर बार यही दलील दी गई कि "जमीनी हालात ऐसे थे कि तुरंत कड़े कदम उठाना जरूरी था।" ये मामले साबित करते हैं कि जब-जब कार्यपालिका को लगा है कि उसके राजनीतिक या प्रशासनिक हित अदालत के फैसलों से टकरा रहे हैं, तब-तब उसने अवमानना के खतरे को दरकिनार करना ही बेहतर समझा है।
संस्थागत गरिमा का संकट: क्या 'टूथलेस' हो रहा है सुप्रीम कोर्ट?
किसी भी लोकतंत्र में न्यायपालिका का आधार उसकी साख और उसके आदेशों का इकबाल होता है। अगर देश की सबसे बड़ी अदालत के आदेशों को शासन तंत्र एक आम 'सरकारी कागज' समझकर रद्दी की टोकरी में फेंकने लगे, तो यह पूरी संवैधानिक व्यवस्था के लिए खतरे की घंटी है। यदि अवमानना की कार्रवाई केवल कागजी नोटिस तक सीमित रह जाएगी और दोषी अधिकारियों पर सख्त दंडात्मक कार्रवाई नहीं होगी, तो अवमानना का खौफ पूरी तरह खत्म हो जाएगा।
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