बाकू से आई ग्राउंड रिपोर्ट बताती है कि अज़रबैजान के स्कूलों और कॉलेजों में हिजाब पहनने पर पाबंदी लगा दी गई है। इस फैसले के बाद देश भर की मुस्लिम छात्राओं और उनके परिवारों में भारी गुस्सा देखने को मिल रहा है। कई जगहों पर रोती हुई छात्राएं कक्षाओं से बाहर नजर आई हैं। अज़रबैजान सरकार का तर्क है कि देश के सेक्युलारिज्म यानी पंथनिरपेक्षता को बनाए रखने के लिए यह कड़ा कदम उठाना जरूरी था। लेकिन इस फैसले ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ी बहस छेड़ दी है।
इस पूरे मामले पर तुर्की ने कड़ी नाराजगी जताई है और अज़रबैजान सरकार के इस फैसले की आलोचना की है। तुर्की के राष्ट्रपति रेचप तैयप एर्दोगन की सरकार मानती है कि धार्मिक स्वतंत्रता का इस तरह हनन नहीं होना चाहिए। दोनों देशों के बीच इस बात को लेकर जुबानी जंग तेज हो गई है। खास बात यह है कि अज़रबैजान और तुर्की दोनों ही पाकिस्तान के बहुत करीबी दोस्त माने जाते हैं। ऐसे में इन दोनों मुस्लिम देशों के आमने-सामने आने से कूटनीतिक गलियारों में नई हलचल मच गई है।
कक्षाओं से बाहर होती छात्राएं और बढ़ता रोष
स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार अज़रबैजान के कई शिक्षण संस्थानों में पुलिस और सुरक्षा बलों को तैनात किया गया है। जो छात्राएं हिजाब पहनकर आ रही हैं, उन्हें मुख्य गेट पर ही रोक दिया जा रहा है। प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि यूनिफॉर्म के नियमों का सख्ती से पालन कराया जाएगा। दूसरी तरफ विरोध प्रदर्शन कर रही छात्राओं का कहना है कि यह उनकी आस्था पर सीधा हमला है। वे अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहती हैं लेकिन अपने धार्मिक विश्वासों से समझौता करने को तैयार नहीं हैं।
अज़रबैजान के इस फैसले के पीछे सोवियत संघ के दौर से चली आ रही सख्त सेक्युलारिज्म की नीति को मुख्य वजह माना जा रहा है। देश का संविधान धर्म और राज्य को पूरी तरह अलग रखता है। सार्वजनिक संस्थानों में धार्मिक प्रतीकों के प्रदर्शन पर पहले भी पाबंदियां रही हैं। लेकिन स्कूलों के स्तर पर हिजाब पर पूरी तरह रोक लगाने का यह नया आदेश स्थिति को और अधिक तनावपूर्ण बना रहा है। मानवाधिकार संगठनों ने भी इस मामले में चिंता जताई है।
तुर्की और अज़रबैजान के रिश्तों पर मंडराया संकट
तुर्की के साथ अज़रबैजान के संबंध हमेशा से बहुत गहरे रहे हैं। दोनों देशों को एक राष्ट्र, दो राज्य के रूप में देखा जाता है। नागोर्नो-काराबाख युद्ध के दौरान भी तुर्की ने अज़रबैजान का खुलकर समर्थन किया था। लेकिन हिजाब के मुद्दे पर आई इस दरार ने दोनों सरकारों के बीच की नजदीकी पर सवाल खड़े कर दिए हैं। तुर्की के मीडिया और राजनीतिक दलों ने अज़रबैजान के इस फैसले को इस्लाम विरोधी करार दिया है, जिससे बाकू की सरकार खासी नाराज है।
विश्लेषकों का मानना है कि इस विवाद का असर आने वाले समय में क्षेत्रीय राजनीति पर भी पड़ सकता है। पाकिस्तान के लिए यह स्थिति असहज करने वाली है क्योंकि उसके दोनों प्रमुख सहयोगी आपस में उलझ रहे हैं। अज़रबैजान अपनी आंतरिक नीतियों को लेकर किसी भी बाहरी हस्तक्षेप के पक्ष में नहीं है। वहीं तुर्की खुद को मुस्लिम दुनिया के बड़े नेता के रूप में पेश करने की कोशिश करता रहा है। देखना यह होगा कि कूटनीतिक बातचीत के जरिए इस तनाव को कैसे शांत किया जाता है।
द फ्रीलान्स की अंतिम ग्राउंड पड़ताल
हमारी टीम ने जब बाकू और अंकारा के राजनीतिक घटनाक्रम को परखा, तो यह साफ हुआ कि मामला सिर्फ कपड़ों या ड्रेस कोड का नहीं है। यह वैचारिक स्वतंत्रता और सरकारी नियंत्रण के बीच की पुरानी लड़ाई का नया रूप है। अज़रबैजान की सरकार किसी भी धार्मिक ध्रुवीकरण से बचना चाहती है, इसलिए वह सख्ती दिखा रही है। लेकिन तुर्की का दबाव इस बात का संकेत है कि मुस्लिम देशों के बीच भी धार्मिक मामलों पर अब खुली बयानबाजी शुरू हो गई है। इस पूरी स्थिति पर हमारी नजर लगातार बनी रहेगी।












