नई दिल्ली/तेहरान — मध्य पूर्व यानी पश्चिम एशिया के हालात एक बार फिर से बेहद खतरनाक मोड़ पर पहुंच चुके हैं। ईरान ने पाकिस्तान और तुर्किए को कड़ी चेतावनी दी है कि वे सऊदी अरब के इशारे पर यमन के मामलों में दखलंदाजी करने से बाज आएं। ईरान का कहना है कि अगर इन देशों ने यमन के युद्ध में सऊदी अरब का साथ देने के लिए अपनी सेना उतारी, तो हालात बेकाबू हो जाएंगे और इसके नतीजे बहुत भयानक होंगे। इस चेतावनी के बाद से इस्लामिक देशों के बीच कूटनीतिक हलचल बहुत तेज हो गई है और हर कोई इस नए समीकरण पर अपनी नजर गड़ाए बैठा है।
दूसरी तरफ, अमेरिका और ईरान के बीच जुबानी जंग थमने का नाम नहीं ले रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बड़ा दावा करते हुए कहा है कि फ्लाईदुबई की एक उड़ान में हुई आतंकी साजिश के पीछे सीधे तौर पर ईरान का हाथ था। इस सनसनीखेज दावे के बाद दोनों देशों के बीच तनाव चरम पर पहुंच गया है। वाशिंगटन और तेहरान के बीच चल रहे इस टकराव ने अब खाड़ी देशों की राजनीति को पूरी तरह से गरमा दिया है और हर देश अपनी सुरक्षा को लेकर नए सिरे से रणनीति बनाने में जुट गया है।
होर्मुज स्ट्रेट विवाद और अमेरिका का नया समुद्री नक्शा
ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर रखी गई सभी शर्तों को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सिरे से खारिज कर दिया है। इसके जवाब में अमेरिका ने एक बड़ा कदम उठाते हुए होर्मुज के बजाय 'ट्रंप स्ट्रेट' के नाम से एक नया समुद्री नक्शा दुनिया के सामने पेश कर दिया है। अमेरिका का यह कदम ईरान के लिए एक बहुत बड़ा आर्थिक और रणनीतिक झटका माना जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति के जानकारों का मानना है कि इस नए समुद्री रास्ते के आने से ईरान की उस ताकत को तगड़ा झटका लगा है जिसके दम पर वह दुनिया को तेल सप्लाई रोकने की धमकी देता रहा था।
अमेरिका के इस आक्रामक रुख के बाद खाड़ी के दूसरे देशों ने भी अपनी चाल बदल ली है। ईरान देखता रह गया और खाड़ी के अन्य देशों ने वैकल्पिक रास्तों का इस्तेमाल करके अपने तेल का निर्यात फिर से शुरू कर दिया है। पिछले कुछ दिनों में इन वैकल्पिक मार्गों से गुजरने वाले तेल टैंकरों की आवाजाही में भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इस बदलाव से ईरान की वह मोनोपोली टूटती नजर आ रही है जिसके जरिए वह तेल के रास्ते पूरी दुनिया पर अपना दबाव बनाने की कोशिश करता था। खाड़ी देशों का यह कदम क्षेत्रीय व्यापार और राजनीति में एक बहुत बड़ा बदलाव साबित हो सकता है।
ईरान की अमेरिका और उसके सहयोगियों को दो टूक धमकी
स्थिति को और अधिक तनावपूर्ण बनाते हुए ईरान ने अमेरिका को खुली धमकी दी है कि वह इस संघर्ष में अमेरिका के साथ देने वाले हर सहयोगी देश को भी दुश्मन का हिस्सा मानेगा। तेहरान ने साफ शब्दों में कहा है कि अमेरिकी नीतियों का समर्थन करने वाले किसी भी देश पर रहम नहीं किया जाएगा और उन्हें भी इस युद्ध का पूरा परिणाम भुगतना होगा। ईरान की इस आक्रामक भाषा से साफ है कि आने वाले दिनों में पश्चिम एशिया में शांति लौटने की कोई उम्मीद दूर-दूर तक नजर नहीं आ रही है, बल्कि यह संकट और अधिक गहरा सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच यह भी कयास लगाए जा रहे हैं कि अमेरिका में होने वाले मध्यावधि चुनावों के ठीक बाद पश्चिम एशिया में एक बड़ा सैन्य हमला हो सकता है। ईरान के परमाणु ठिकानों और उसके मददगारों पर बमबारी की आशंका लगातार बनी हुई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों पर भी इसका सीधा असर पड़ रहा है। भारत जैसे देशों के लिए यह स्थिति चिंताजनक है क्योंकि कच्चा तेल महंगा होने से घरेलू बाजार में महंगाई बढ़ सकती है और आर्थिक मोर्चे पर मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं।
कूटनीतिक मोर्चे पर भारत और दुनिया की पैनी नजर
इस पूरे भू-राजनीतिक उथल-पुथल पर भारत समेत दुनिया के तमाम बड़े देशों की नजरें टिकी हुई हैं। भारत के लिए पश्चिम एशिया से आने वाला तेल और वहां रहने वाले करोड़ों भारतीय नागरिकों की सुरक्षा सबसे बड़ी प्राथमिकता है। यमन संकट में पाकिस्तान और तुर्किए के कूदने की संभावना से क्षेत्रीय स्थिरता को तगड़ा झटका लग सकता है। द फ्रीलान्स की ग्राउंड रिपोर्ट बताती है कि आने वाले कुछ हफ्ते पश्चिम एशिया की राजनीति और वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिहाज से बहुत ज्यादा संवेदनशील रहने वाले हैं।












