केरल की राजनीति में इन दिनों पलक्कड़ उपचुनाव को लेकरवान गरमाया हुआ है। कांग्रेस पार्टी से बगावत करने वाले युवा नेता डॉक्टर पी. सरिन अब वाम मोर्चे यानी एलडीएफ के पाले में खड़े नजर आ रहे हैं। कांग्रेस नेतृत्व द्वारा टिकट न दिए जाने से नाराज चल रहे सरिन को एलडीएफ ने पलक्कड़ सीट से अपना आधिकारिक उम्मीदवार घोषित कर दिया है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब कुछ दिन पहले ही सरिन ने कांग्रेस पार्टी के अंदरूनी कामकाज पर तीखा सवाल उठाया था और राज्य नेतृत्व को खुली चेतावनी दी थी।
अपनी बगावत के दौरान डॉक्टर पी. सरिन ने मीडिया से खुलकर बात की थी। उन्होंने पार्टी आलाकमान को साफ शब्दों में चेताया था कि उम्मीदवारों की सूची में तुरंत बदलाव किया जाए। सरिन का कहना था कि अगर मनमाने तरीके से टिकट बांटे गए, तो कांग्रेस को हरियाणा विधानसभा चुनाव जैसी बुरी हार का सामना पलक्कड़ में भी करना पड़ सकता है। उनकी इस सीधी चेतावनी के बाद कांग्रेस में हड़कंप मच गया था। पार्टी नेताओं ने फौरन कार्रवाई करते हुए उन्हें अनुशासनात्मक कारणों का हवाला देकर पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया था।
कांग्रेस की अनदेखी के बाद वाम मोर्चे का दांव
डॉक्टर पी. सरिन लंबे समय से कांग्रेस के सक्रिय और मुखर नेताओं में गिने जाते थे। युवा कांग्रेस और पार्टी के अन्य मंचों पर उन्होंने हमेशा अपनी बात मजबूती से रखी थी। लेकिन पलक्कड़ उपचुनाव के लिए जब उम्मीदवारों के नाम तय हो रहे थे, तब उनकी दावेदारी को दरकिनार कर दिया गया। अपनी अनदेखी से आहत सरिन ने सार्वजनिक रूप से पार्टी की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए। उनका मानना था कि जमीनी कार्यकर्ताओं की राय को दरकिनार करके फैसले लिए जा रहे हैं, जिससे आम कार्यकर्ताओं का मनोबल टूट रहा है।
कांग्रेस से निष्कासन के बाद वाम मोर्चे यानी एलडीएफ ने इस मौके को भुनाने में देर नहीं लगाई। एलडीएफ ने तुरंत रणनीति बदलते हुए डॉक्टर पी. सरिन को अपने पाले में खींच लिया और उन्हें पलक्कड़ से चुनावी मैदान में उतार दिया। वाम दलों का मानना है कि सरिन की छवि एक साफ-सुथरे और युवा नेता की है, जिसका फायदा उन्हें चुनाव में मिल सकता है। एलडीएफ के इस कदम से पलक्कड़ का राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल गया है और मुकाबला अब त्रिकोणीय हो गया है।
क्या भाजपा के वोटों में सेंध लगा पाएंगे सरिन?
पलक्कड़ सीट पर इस समय राजनीतिक गलियारों में एक ही सवाल सबसे ज्यादा पूछा जा रहा है कि क्या डॉक्टर पी. सरिन यहां भाजपा के वोटों में बड़ी सेंध लगा पाएंगे। स्थानीय जानकारों का मानना है कि सरिन के आने से कांग्रेस के पारंपरिक वोटों के साथ-साथ कुछ तटस्थ वोट भी प्रभावित हो सकते हैं। चूंकि वे पहले कांग्रेस में थे, इसलिए पार्टी के भीतर उनकी अच्छी पकड़ और पहचान है। ऐसे में वे कांग्रेस के कुछ वोट अपने पाला खींच सकते हैं, जिससे सीधा नुकसान कांग्रेस को उठाना पड़ सकता है।
दूसरी तरफ, भाजपा भी इस सीट पर अपनी पूरी ताकत झोंक रही है। पलक्कड़ में भाजपा का अच्छा खासा जनाधार माना जाता है। राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी आकलन है कि अगर सरिन चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करते हैं, तो इससे भाजपा और कांग्रेस दोनों के समीकरण बिगड़ सकते हैं। चुनाव प्रचार का दौर जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा है, सरिन की मौजूदगी ने सभी दलों की नींद उड़ा दी है। अब देखना यह होगा कि पलक्कड़ की जनता इस बगावत और राजनीतिक उठापटक पर क्या फैसला सुनाती है।
मैदान में उतरीं सभी पार्टियों की नई चुनावी रणनीतियां
पलक्कड़ उपचुनाव के मद्देनजर सभी प्रमुख राजनीतिक दलों ने अपनी रणनीति में बदलाव करना शुरू कर दिया है। कांग्रेस पार्टी के लिए यह सीट बचाना प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है, क्योंकि अपने ही बागी नेता के खिलाफ उन्हें अब जमीन पर उतरकर संघर्ष करना पड़ रहा है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता लगातार निर्वाचन क्षेत्र में डेरा डाले हुए हैं और मतदाताओं को यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि पार्टी सर्वोपरि है। वहीं, एलडीएफ खेमा डॉक्टर पी. सरिन की उम्मीदवारी के सहारे अपनी जीत की जमीन तैयार करने में जुटा हुआ है।
द फ्रीलान्स की जमीनी पड़ताल बताती है कि पलक्कड़ के मतदाता इस बार काफी सोच-समझकर अपने मताधिकार का प्रयोग करने के मूड में हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि अचानक हुए इन राजनीतिक घटनाक्रमों ने चुनाव को बहुत दिलचस्प बना दिया है। हर गली और नुक्कड़ पर बस इसी बात की चर्चा है कि बगावत का यह दांव किसके पक्ष में जाएगा। जैसे-जैसे मतदान की तारीख नजदीक आ रही है, सियासी दलों के बीच जुबानी जंग और तेज होती जा रही है।












