नई दिल्ली/भोपाल — देश की राजनीति में एक बार फिर बुलडोजर एक्शन को लेकर बड़ी बहस छिड़ गई है। मध्य प्रदेश में प्रशासन द्वारा हाल ही में की गई बुलडोजर कार्रवाई पर केंद्रीय कृषि मंत्री और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने खुलकर अपनी नाराजगी जताई है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा है कि इस तरह की कार्रवाई में न्याय के बजाय जुल्म और अन्याय साफ दिखाई देता है और अब अति की हदें पार हो रही हैं। जमीन पर हो रही इस तरह की कार्रवाई से आम जनता के बीच भारी रोष और डर का माहौल बना हुआ है, जिसे लेकर अब राजनीतिक गलियारों में भी चर्चाएं तेज हो गई हैं।
स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पिछले कुछ समय से राज्य के कई जिलों में अवैध निर्माण और अपराध से जुड़े मामलों में आरोपियों के घरों पर बुलडोजर चलाने का सिलसिला तेजी से चल रहा था। लेकिन इस बार जिस तरह से बिना पूरे दस्तावेजों की जांच किए और जल्दबाजी में लोगों के आशियाने उजाड़े गए, उसने कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। शिवराज सिंह चौहान का यह बयान ऐसे समय में सामने आया है जब पीड़ितों की तरफ से लगातार यह गुहार लगाई जा रही थी कि उनके साथ ज्यादती हो रही है। प्रशासन की इस शैली पर अब खुद पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की तरफ سے सवाल उठने लगे हैं।
बुलडोजर कार्रवाई पर क्यों भड़के पूर्व मुख्यमंत्री?
शिवराज सिंह चौहान ने अपने तीखे तेवर दिखाते हुए कहा कि किसी भी दोषी पर कानून के मुताबिक कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उसके परिवार या बेकसूर लोगों को भी सड़क पर ला दिया जाए। उन्होंने माना कि कई मामलों में प्रशासन ने हद पार कर दी है और गरीब व मजदूर वर्ग के लोगों को निशाना बनाया गया है। एक तरफ जहां सरकार अपराधियों में खौफ पैदा करने के लिए इस नीति को सही मानती है, वहीं दूसरी तरफ मानवाधिकार कार्यकर्ता और अब खुद पार्टी के भीतर से उठने वाली ये आवाजें इस मॉडल पर गंभीर सवालिया निशान लगा रही हैं।
जमीनी स्तर पर पड़ताल करने पर यह बात सामने आई है कि जिन मकानों को तोड़ा गया, उनमें से कई घरों में महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग रहते थे जिन्हें संभलने का भी पूरा मौका नहीं मिला। ठंड और बारिश के मौसम में सिर से छत छिन जाने के कारण इन परिवारों का जीवन पूरी तरह तबाह हो गया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर किसी ने गलती की है तो सजा उसे मिलनी चाहिए, न कि उसके पूरे खानदान और पड़ोसी तक को बेघर कर दिया जाए। प्रशासन की इस कार्यप्रणाली के खिलाफ अब प्रभावित लोग अदालतों का दरवाजा खटखटाने की तैयारी कर रहे हैं।
प्रशासनिक कार्यशैली और न्याय के बीच बढ़ती दूरी
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि क्या त्वरित न्याय के नाम पर नागरिकों के बुनियादी अधिकारों का हनन किया जा रहा है। कानूनी जानकारों का मानना है कि किसी भी संपत्ति को ध्वस्त करने से पहले उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य होता है, जिसमें पक्ष रखने का पूरा मौका दिया जाना चाहिए। लेकिन हालिया मामलों में जिस तरह की ताबड़तोड़ कार्रवाई देखने को मिली है, उससे कानून के राज पर कई तरह के गंभीर सवाल खड़े होते हैं। शिवराज सिंह चौहान की इस नाराजगी को प्रशासनिक मनमानी पर लगाम लगाने के एक बड़े संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
मध्य प्रदेश के कई जिलों में इस कार्रवाई के बाद से स्थानीय नागरिकों में भारी मायूस और गुस्सा है। लोग अब खुलकर अपने जनप्रतिनिधियों और प्रशासन के अधिकारियों से जवाब मांग रहे हैं कि आखिर बिना नोटिस के उनके आशियाने क्यों उजाड़े गए। दूसरी तरफ, जिला प्रशासन और पुलिस विभाग अपने बचाव में लगातार यह दलील दे रहा है कि सभी कदम नियमों के दायरे में रहकर ही उठाए गए हैं। हालांकि, केंद्रीय स्तर से इस तरह की तीखी प्रतिक्रिया आने के बाद अब स्थानीय अधिकारी भी फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं और अपनी रिपोर्ट तैयार कर रहे हैं।
द फ्रीलान्स की ग्राउंड रिपोर्ट और आगे की सुगबुगाहट
द फ्रीलान्स की टीम ने जब इस पूरे मामले की गहराई से पड़ताल की तो यह साफ हुआ कि जमीनी हकीकत कागजी दावों से काफी अलग है। कई जगहों पर ऐसे लोगों के मकान भी जद में आ गए जिनका किसी भी आपराधिक गतिविधि से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं था। शिवराज सिंह चौहान का यह बयान इस बात का सबूत है कि पार्टी के भीतर भी अब इस बात पर मंथन शुरू हो गया है कि जनता के बीच जा रही गलत छवि को कैसे सुधारा जाए। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राज्य सरकार और संगठन के स्तर पर कुछ बड़े दिशा-निर्देश जारी किए जा सकते हैं ताकि इस तरह के बुलडोजर एक्शन पर रोक लग सके।












