हैदराबाद/ग्राउंड ब्यूरो — देश के दक्षिणी राज्यों में मौसम का मिजाज तेजी से बदल रहा है। इस बदलाव के पीछे प्रशांत महासागर में सक्रिय हो रहे अल नीनो का साया साफ तौर पर देखा जा रहा है। किसानों की मुश्किलें बढ़ने वाली हैं क्योंकि मौसम विभाग और राज्य सरकारों ने इसे लेकर गंभीर चिंता जताई है। तेलंगाना सरकार ने इस खतरे को भांपते हुए राज्य के किसानों के लिए एक बहुत बड़ा निर्देश जारी किया है। सरकार की तरफ से साफ कह दिया गया है कि किसान इस बार रबी या यासंगी के मौसम में दूसरी फसल उगाने का जोखिम बिल्कुल न उठाएं।
राज्य के कृषि और सिंचाई से जुड़े बड़े नेताओं और मंत्रियों ने इस मामले पर ज़मीनी हकीकत का जायजा लिया है। मंत्रियों का कहना है कि आने वाले महीनों में पानी की भारी किल्लत हो सकती है। तालाबों और जलाशयों में पानी का स्तर तेजी से नीचे गिर रहा है। ऐसे हालात में अगर किसानों ने अपनी पारंपरिक फसलों के अलावा दूसरी फसल लगाने की कोशिश की, तो उनके खेतों तक पानी पहुंचाना नामुमकिन हो जाएगा। सरकार का यह निर्देश किसानों की गाढ़ी कमाई और मेहनत को बचाने के लिए उठाया गया एहतियाती कदम है।
भूजल स्तर में गिरावट और गहराता जल संकट
मौसम के जानकारों का मानना है कि अल नीनो का यह असर इस बार काफी लंबे समय तक रह सकता है। इससे न सिर्फ मानसून की चाल बिगड़ी है बल्कि सर्दियों और गर्मियों के मौसम का चक्र भी प्रभावित हुआ है। तेलंगाना के कई जिलों में भूजल स्तर पहले ही सामान्य से नीचे चला गया है। बोरवेल सूखने की कगार पर पहुंच चुके हैं और बिजली की मांग भी खेतों में अचानक बढ़ गई है। अगर किसानों को समय पर पानी नहीं मिला, तो उनकी फसलें बीच रास्ते में ही सूख जाएंगी, जिससे उन्हें भारी कर्ज के जाल में फंसना पड़ सकता है।
स्थानीय प्रशासन और कृषि विभाग के अधिकारी अब गांव-गांव जाकर किसानों को इसकी जानकारी दे रहे हैं। उन्हें समझाया जा रहा है कि इस साल पानी की एक-एक बूंद की कीमत बहुत ज्यादा है। सरकार उन फसलों को चुनने की सलाह दे रही है जिनमें बहुत कम पानी की जरूरत पड़ती है। धान जैसी ज्यादा पानी मांगने वाली फसलों से पूरी तरह तौबा करने की अपील की जा रही है। किसान भी अब धीरे-धीरे इस खतरे की गंभीरता को समझ रहे हैं, हालांकि उनके सामने रोजी-रोटी का बड़ा संकट खड़ा हो गया है।
राजनीतिक सरगर्मी और किसानों का भविष्य
इस बीच, अल नीनो के इस संकट पर राज्य की राजनीति भी गरमाने लगी है। विपक्ष और सत्ता पक्ष के नेता इस मुद्दे पर आमने-सामने हैं। सरकार जहां किसानों को बचाने के लिए सख्त फैसले ले रही है, वहीं विपक्षी दल किसानों के लिए तुरंत आर्थिक मदद और मुआवजे की मांग कर रहे हैं। राजनीतिक बैठकों और रैलियों में इस बात पर बहस छिड़ गई है कि क्या सरकार के पास पानी के संकट से निपटने का कोई ठोस वैकल्पिक प्लान तैयार है या नहीं।
मैदान पर उतरी हमारी टीम ने जब ग्रामीण इलाकों का दौरा किया, तो वहां मायूसी और चिंता साफ दिखाई दी। किसानों का कहना है कि अगर वे दूसरी फसल नहीं उगाएंगे, तो उनके परिवार का गुजारा कैसे होगा। बैंक का कर्ज और खेती का खर्चा चुकाना उनके लिए सिरदर्द बन गया है। हालांकि, समझदारी इसी में है कि सरकार की चेतावनी को नजरअंदाज न किया जाए। आने वाले हफ्तों में मौसम के कड़े तेवर तय करेंगे कि दक्षिणी भारत के इन खेतों को बचाने के लिए प्रशासन और कितने कड़े कदम उठाता है।









