मुंबई की राजनीति इस समय बेहद गर्म है और हर दिन नए समीकरण बन रहे हैं। शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे के सामने इस समय एक साथ कई मोर्चों पर राजनीतिक लड़ाई लड़ने की चुनौती खड़ी हो गई है। आगामी बीस अक्टूबर को होने वाली दशहरा रैली को लेकर राजनीतिक पारा सातवें आसमान पर पहुंच चुका है। शिवाजी पार्क या गोरेगांव में शक्ति प्रदर्शन को लेकर एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे आमने-सामने आ चुके हैं। दोनों पक्षों के टीजर और बयानों से साफ हो गया है कि इस साल की दशहरा रैली का मुकाबला बेहद तीखा होने वाला है। मैदान चाहे कोई भी हो, असली जंग शिवसेना पर असली हक जताने की है।
दूसरी तरफ राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी दलों के INDIA गठबंधन के भीतर भी सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। हाल ही में हुई गठबंधन की एक अहम बैठक के दौरान उद्धव ठाकरे ने कांग्रेस पार्टी को खरी-खोटी सुनाई। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि कांग्रेस का रवैया और कार्यशैली ठीक नहीं है, जिससे गठबंधन के साथियों को परेशानी हो रही है। यह नाराजगी केवल बंद कमरों तक सीमित नहीं रही, बल्कि मीडिया के गलियारों में भी चर्चा का बड़ा विषय बन गई। जानकारों का मानना है कि राज्य चुनावों के रणनीतिक मामलों पर क्षेत्रीय दलों और राष्ट्रीय नेतृत्व के बीच तालमेल की भारी कमी साफ दिखाई दे रही है।
शिवाजी पार्क का मौन प्रदर्शन और राज ठाकरे के साथ समीकरण
राष्ट्रीय राजनीति की इन उठापटक के बीच मुंबई के ऐतिहासिक शिवाजी पार्क में एक अलग ही नजारा देखने को मिला। यहां उद्धव ठाकरे की शिवसेना और उनके चचेरे भाई राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना यानी मनसे ने मिलकर एक मौन प्रदर्शन का आह्वान किया था। ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आयोजित इस संयुक्त विरोध प्रदर्शन में दोनों भाइयों का एक मंच पर आना सियासी गलियारों में बड़ी चर्चा का विषय बन गया। हालांकि दोनों दलों ने अपने रास्ते अलग कर रखे हैं, लेकिन कुछ मुद्दों पर उनकी यह अनूठी गोलबंदी जनता के बीच अलग संदेश दे रही है।
लेकिन इन सियासी गतिविधियों के बीच उद्धव ठाकरे के घर में ही आंतरिक कलह खुलकर बाहर आ गई है। INDIA गठबंधन के प्रदर्शन और पार्टी की बदलती कार्यशैली के बीच एक प्रमुख प्रवक्ता ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। इस इस्तीफे ने पार्टी के भीतर चल रही अंदरूनी नाराजगी और संवादहीनता की पोल खोल दी है। चुनाव के ठीक मुहाने पर खड़े होकर इस तरह का झटका लगना उद्धव गुट के लिए एक बड़ा मानसिक और सांगठनिक आघात माना जा रहा है। कार्यकर्ताओं के बीच भी असमंजस की स्थिति पैदा हो गई है कि पार्टी आखिर किस वैचारिक और राजनीतिक दिशा में आगे बढ़ रही है।
दशहरा रैली का टीजर वॉर और आगामी सियासी दिशा
दशहरा रैली के टीजर के जरिए दोनों शिवसेना गुटों ने अपनी-अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने का एजेंडा पहले ही सेट कर दिया है। एकनाथ शिंदे जहां सरकार की योजनाओं और बालासाहेब ठाकरे के नाम पर अपनी पकड़ मजबूत कर रहे हैं, वहीं उद्धव ठाकरे मराठी मानुष और सहानुभूति के कार्ड के सहारे अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने की जुगत में हैं। इस बार की रैली का भाषण तय करेगा कि आने वाले दिनों में महाराष्ट्र की राजनीति किस करवट बैठेगी। आम जनता की नजरें भी इसी बात पर टिकी हैं कि कौन सा नेता अपने भाषण से ज्यादा प्रभावी असर छोड़ पाता है।
जमीनी स्तर पर काम कर रहे हमारे रिपोर्टर्स के मुताबिक, मुंबई और आसपास के शहरी इलाकों में मतदाता इस बार काफी असमंजस में हैं। एक तरफ पारंपरिक वफादारियाँ हैं तो दूसरी तरफ पार्टी टूटने के बाद पैदा हुए नए राजनीतिक विकल्प हैं। उद्धव ठाकरे के सामने अपनी पुरानी साख बचाने और पार्टी को एकजुट रखने की सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा यही समय है। सहयोगी दलों से नाराजगी मोल लेना और पार्टी के भीतर से हो रहे विरोध को थामना उनके लिए आसान नहीं होगा। आने वाले कुछ सप्ताह तय करेंगे कि महाराष्ट्र का यह सियासी ऊंट किस करवट बैठता है।
गठबंधन की खींचतान और पार्टी संगठन की अंदरूनी हकीकत
पार्टी सूत्रों का कहना है कि निचले स्तर के कार्यकर्ताओं में इस बात को लेकर बेचैनी है कि राष्ट्रीय गठबंधन में उनकी पार्टी को वह तवज्जो नहीं मिल रही है जिसके वे हकदार हैं। कांग्रेस के साथ सीटों के तालमेल और स्थानीय स्तर पर होने वाले फैसलों को लेकर भी मतभेद लगातार गहरे हो रहे हैं। प्रवक्ता का इस्तीफा इसी नाराजगी का एक छोटा सा हिस्सा मात्र है। यदि समय रहते इन आंतरिक असंतोषों को नहीं दबाया गया, तो चुनाव के वक्त यह पार्टी के लिए बहुत भारी पड़ सकता है। उद्धव ठाकरे को अब बहुत फूंक-फूंक कर कदम रखने होंगे।
कुल मिलाकर, उद्धव ठाकरे इस समय अपने राजनीतिक जीवन के सबसे दौर से गुजर रहे हैं। एक तरफ सत्ताधारी गुट से सीधी टक्कर है, तो दूसरी तरफ अपनों का साथ छूटने का डर सता रहा है। राष्ट्रीय स्तर पर भी सहयोगियों के साथ सीट शेयरिंग और नीतियों पर खींचतान जारी है। 'द फ्रीलान्स' की इस ग्राउंड पड़ताल से यह साफ है कि आने वाले दिन महाराष्ट्र की राजनीति में भूचाल लाने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। जनता और मतदाता सब कुछ बहुत बारीकी से देख रहे हैं और आने वाला चुनाव ही इसका अंतिम फैसला करेगा।





