भारत के हर जिले और उप-खंड में 'तहसीलदार' शब्द प्रशासनिक व्यवस्था की धुरी माना जाता है। जब भी जमीन की खरीद-फरोख्त, म्यूटेशन, जाति प्रमाण पत्र या आय प्रमाण पत्र की बात आती है, तो सबसे पहले इसी अधिकारी का दरवाजा खटखटाया जाता है। हमारी ग्राउंड रिपोर्ट बताती है कि देश के कई हिस्सों में आज भी आम आदमी को छोटे-छोटे सरकारी कामों के लिए भारी भागदौड़ करनी पड़ती है। ग्रामीण इलाकों में रहने वाले किसानों के लिए तहसीलदार का दफ्तर किसी बड़े कोर्ट कचहरी जैसा होता है, जहां हर एक दस्तखत के लिए महीनों इंतजार करना पड़ सकता है।
राजस्व मामलों के जानकारों का कहना है कि डिजिटलाइजेशन के आने के बाद कुछ प्रक्रियाओं में तेजी जरूर आई है। ऑनलाइन पोर्टल पर आवेदन करने की सुविधा से लोगों को घर बैठे रसीद और नक्शा मिलने की उम्मीद जगी है। इसके बावजूद तकनीकी खामियां और सर्वर डाउन होने की समस्या आम बात बन चुकी है। जब लोग अपने कागजात में नाम सुधारने या सीमांकन कराने के लिए तहसील पहुंचते हैं, तो उन्हें कई दिनों तक चक्कर काटने पड़ते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में बिचौलियों और दलालों का दखल भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है, जिससे पार पाना आम आदमी के लिए आसान नहीं होता है।
जमीन के मामलों में क्यों लंबी खिंचती है प्रक्रिया
तहसील कार्यालयों में सबसे ज्यादा दबाव जमीन के बंटवारे और उत्तराधिकार के मामलों को लेकर रहता है। परिवार के किसी सदस्य के निधन के बाद संपत्ति का नाम वारिसों के नाम दर्ज कराने की प्रक्रिया को म्यूटेशन कहा जाता है। कानून के मुताबिक इस काम के लिए एक तय समय सीमा होती है, लेकिन मैदानी हकीकत इससे काफी अलग है। पटवारी की रिपोर्ट आने में देरी और फिर तहसीलदार स्तर पर फाइलों के लंबित रहने से विवाद कई-कई साल तक खिंच जाते हैं। कई बार ग्रामीण इलाकों में पैतृक जमीन के पुराने रिकॉर्ड दीमक या सीलन की वजह से खराब मिल ाते हैं, जिससे कागजी कार्रवाई में और ज्यादा वक्त लग जाता है।
आम नागरिकों का यह भी अनुभव रहा है कि यदि समय पर सही दस्तावेज जमा न किए जाएं तो फाइल रिजेक्ट होने का डर बना रहता है। गरीब और कम पढ़े-लिखे लोग अक्सर इन जटिल कानूनी प्रक्रियाओं को समझ नहीं पाते हैं। ऐसे में उन्हें स्थानीय एजेंटों की मदद लेनी पड़ती है, जो अवैध रूप से पैसों की मांग करते हैं। सरकार ने भ्रष्टाचार रोकने के लिए कई जगहों पर एंटी करप्शन हेल्पलाइन नंबर जारी किए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर प्रशासनिक कसावट की कमी आज भी चिंता का विषय बनी हुई है।
डिजिटल तहसील और ऑनलाइन सेवाओं का सच
सरकार भले ही डिजिटल इंडिया के दावे कर रही हो, लेकिन गांवों के अंदरूनी हिस्सों में इंटरनेट की कनेक्टिविटी आज भी एक बड़ी बाधा है। कई तहसीलों में कंप्यूटरीकरण का काम अधूरा है, जिससे पुरानी और नई फाइलों का मिलान करने में कर्मचारियों को पसीना छूट जाता है। अधिकारियों का तर्क है कि उनके पास स्टाफ की भारी कमी है। एक तहसीलदार के पास दो से तीन तहसीलों का अतिरिक्त प्रभार होता है, जिससे वे जनता की शिकायतों पर तुरंत सुनवाई नहीं कर पाते हैं। जब तक प्रशासनिक अमले में कर्मचारियों की संख्या नहीं बढ़ाई जाएगी, तब तक व्यवस्था में सुधार होना मुश्किल नजर आता है।
द फ्रीलान्स की इस पड़ताल से साफ है कि केवल कानून बना देने से आम जनता की परेशानियां कम नहीं होने वाली हैं। इसके लिए प्रशासनिक जवाबदेही तय करनी होगी और प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी बनाना होगा। जब तक हर नागरिक को तय समय सीमा के भीतर उसकी जमीन के कागजात और प्रमाण पत्र नहीं मिल जाते, तब तक तहसील कार्यालयों के चक्कर काटने का यह सिलसिला यूं ही जारी रहेगा।
भविष्य की चुनौतियां और प्रशासनिक सुधार की उम्मीद
आने वाले समय में भूमि रिकॉर्ड को पूरी तरह आधार कार्ड और सैटेलाइट मैप से जोड़ने की योजना पर काम चल रहा है। अगर यह तकनीक सही तरीके से लागू हो जाती है, तो फर्जीवाड़े के मामलों पर काफी हद तक लगाम लग सकेगी। हालांकि, इसके लिए जरूरी है कि सरकार मैदानी कर्मचारियों को आधुनिक तकनीक का प्रशिक्षण दे और जनता के लिए शिकायत निवारण तंत्र को मजबूत करे। असली बदलाव तभी आएगा जब सिस्टम जनता के प्रति संवेदनशील और जवाबदेह बनेगा।








