नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — भारतीय क्रिकेट टीम के चाइनामैन गेंदबाज कुलदीप यादव इन दिनों अपने खेल को लेकर एक बार फिर चर्चा में हैं। क्रिकेट के मैदान पर अपनी फिरकी का जादू बिखेरने वाले कुलदीप ने हाल ही में सफेद गेंद के छोटे फॉर्मेट से निकलकर लाल गेंद यानी पारंपरिक टेस्ट क्रिकेट में वापसी के सफर पर अपनी बात रखी है। हर खिलाड़ी के लिए टी-20 और टेस्ट क्रिकेट के बीच खुद को ढालना एक बड़ी चुनौती होती है। कुलदीप यादव ने भी इस बात को स्वीकार किया है कि यह बदलाव जितना बाहर से आसान दिखता है, मैदान पर उतना ही मुश्किल साबित होता है।
क्रिकेट के जानकारों और आंकड़ों के अनुसार कुलदीप यादव का खिलाड़ी प्रोफाइल हमेशा से ही विविधता से भरा रहा है। उन्होंने अपनी फिरकी से देश और दुनिया के बल्लेबाजों को कई बार चौंकाया है। लेकिन जब बात आईपीएल जैसे व्यस्त और तेज-तर्रार टी-20 टूर्नामेंट से सीधे लंबे फॉर्मेट की क्रिकेट में उतरने की आती है, तो गेंदबाजी का पूरा तरीका बदलना पड़ता है। टी-20 में जहां गेंदबाज को रन रोकने और तेजी से विकेट निकालने की सोच के साथ गेंदबाजी करनी होती है, वहीं लाल गेंद के क्रिकेट में धैर्य और लंबे स्पेल डालने की कला सबसे ज्यादा जरूरी होती है।
टी-20 से टेस्ट क्रिकेट में ढलने की मुश्किलें
द फ्रीलान्स की ग्राउंड रिपोर्ट और खेल विशेषज्ञों की मानें तो आईपीएल के दौरान गेंदबाजों का शरीर और दिमाग एक खास लय में ढल जाता है। वहां चार ओवर का कोटा होता है और हर गेंद पर बल्लेबाज आक्रामक रुख अपनाता है। इसके तुरंत बाद जब खिलाड़ी को लाल गेंद से चार या पांच दिन के मैच खेलने होते हैं, तो उसके शरीर की मांसपेशियां और मानसिकता अलग मांग करती हैं। कुलदीप यादव ने खुद इस बात को रेखांकित किया है कि यह मानसिक रूप से बहुत थका देने वाला होता है क्योंकि बल्लेबाज को चकमा देने के लिए आपको लगातार कई ओवरों तक एक ही टप्पे पर सटीक गेंदबाजी करनी पड़ती है।
खिलाड़ियों के लिए यह बदलाव सिर्फ शारीरिक थकावट तक सीमित नहीं होता, बल्कि इसमें रणनीतिक बदलाव भी शामिल होते हैं। आईपीएल में कप्तान की प्राथमिकता अलग होती है और टेस्ट क्रिकेट में कप्तान की सोच बिल्कुल अलग होती है। टेस्ट मैचों में गेंदबाज को लंबे समय तक फील्डिंग सजाकर बल्लेबाज की गलती का इंतजार करना पड़ता है। कुलदीप जैसे कलात्मक गेंदबाज के लिए यह और भी जरूरी हो जाता है कि वे अपनी लय को बरकरार रखें और पिच से मिलने वाली मदद का पूरा फायदा उठाएं, भले ही वे कुछ दिन पहले तक छोटे फॉर्मेट के मुकाबलों में व्यस्त रहे हों।
लंबे फॉर्मेट में सफलता के लिए निरंतरता जरूरी
खेल विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक दौर के क्रिकेटर्स के सामने सबसे बड़ी चुनौती अलग-अलग फॉर्मेट के बीच तालमेल बिठाने की ही है। आज का क्रिकेट कैलेंडर इतना व्यस्त है कि खिलाड़ियों को बिना ज्यादा समय गंवाए एक सीरीज से दूसरी सीरीज में कूदना पड़ता है। ऐसे में कुलदीप यादव जैसे प्रमुख गेंदबाजों का अनुभव टीम के बहुत काम आता है। वे अपनी पुरानी कमियों पर काम करते हुए लगातार सुधार कर रहे हैं ताकि जब भी उन्हें लाल गेंद से गेंदबाजी करने का मौका मिले, वे अपनी पूरी क्षमता के साथ मैदान पर उतर सकें और टीम की जीत में अहम भूमिका निभा सकें।
मैदान के बाहर भी खिलाड़ियों को अपनी फिटनेस और मानसिक स्वास्थ्य का पूरा ध्यान रखना पड़ता है ताकि वे लगातार बदलते प्रारूपों के दबाव से उबर सकें। कुलदीप यादव का यह बयान युवा खिलाड़ियों के लिए भी एक सीख है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर टिके रहने के लिए केवल प्राकृतिक प्रतिभा ही काफी नहीं है, बल्कि हर परिस्थिति के अनुसार खुद को ढालना भी उतना ही जरूरी है। आने वाले घरेलू और अंतरराष्ट्रीय सत्र में कुलदीप की यह सीख उनके खेल में और अधिक निखार लेकर आएगी, जिस पर सभी की निगाहें टिकी रहेंगी।



