नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश भर में आम आदमी की रसोई के बजट को लेकर बड़ी राहत सामने आई है। केंद्र सरकार ने उज्ज्वला योजना के तहत मिलने वाली 200 रुपये प्रति सिलेंडर की सब्सिडी को जारी रखने का फैसला किया है। पिछले कुछ हफ्तों से दक्षिण भारत समेत देश के कई राज्यों में एलपीजी सब्सिडी को लेकर भारी चर्चा चल रही थी। इंटरनेट और सोशल मीडिया पर लोग लगातार यह खोज रहे थे कि क्या खाते में सब्सिडी आना बंद हो जाएगी। सरकार के इस ताजा फैसले के बाद अब पूरी स्थिति साफ हो गई है। गरीब परिवारों को साल भर में 12 सिलेंडरों तक हर रिफिल पर 200 रुपये की सीधी छूट मिलती रहेगी।
सरकारी खजाने पर इस फैसले का भारी असर पड़ने वाला है। अनुमान है कि इस कदम से सरकारी खजाने पर हर साल लगभग 10,000 करोड़ रुपये का बोझ पड़ेगा। हाल के महीनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और एलपीजी गैस की कीमतों में काफी उतार-चढ़ाव देखा गया है। ऐसे समय में आम परिवारों की जेब पर अतिरिक्त बोझ न पड़े, इसी बात को ध्यान में रखकर यह राहत बरकरार रखी गई है। ग्राउंड स्तर पर गैस एजेंसियों और तेल कंपनियों को नए दिशा-निर्देश भेज दिए गए हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि योग्य ग्राहकों को बिना किसी रुकावट के उनके बैंक खाते में पैसा मिलता रहेगा।
किन परिवारों को मिलेगा 200 रुपये की छूट का सीधा फायदा
इस फैसले का सीधा लाभ प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना से जुड़े सभी गरीब परिवारों को मिलेगा। देश में इस योजना के लाभार्थियों की संख्या अब 10 करोड़ के पार पहुंच चुकी है। सामान्य वर्ग के उन ग्राहकों को यह सब्सिडी नहीं मिलेगी जो सामान्य दरों पर कनेक्शन लिए हुए हैं। योजना के नियमों के अनुसार हर लाभार्थी परिवार को एक वित्तीय वर्ष में कुल 12 सिलेंडरों पर यह छूट दी जाती है। जब कोई परिवार गैस एजेंसी से सिलेंडर खरीदता है, तो उसे पहले पूरी कीमत चुकानी पड़ती है। इसके बाद सब्सिडी की 200 रुपये की रकम सीधे उनके आधार से जुड़े बैंक खाते में भेज दी जाती है।
केरल, तमिलनाडु और उत्तर भारत के ग्रामीण इलाकों से मिली ग्राउंड रिपोर्ट बताती है कि इस सब्सिडी से महिलाओं को बड़ी राहत मिली है। कई ग्रामीण इलाकों में अगर सिलेंडर 900 या 1000 रुपये का मिलता है, तो गरीब परिवार दोबारा लकड़ी के चूल्हे पर लौटने लगते हैं। 200 रुपये की इस छूट से सिलेंडर की वास्तविक लागत कम हो जाती है। इससे गांव की महिलाएं दोबारा धुआं झेलने से बच जाती हैं। स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिहाज से यह कदम बेहद मददगार साबित हो रहा है।
रसोई के बजट और सरकारी खजाने पर क्या होगा असर
अर्थशास्त्रियों और ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि 10,000 करोड़ रुपये का यह खर्च कल्याणकारी नीतियों का अहम हिस्सा है। जब गरीब परिवारों का पैसा रसोई ईंधन में ज्यादा खर्च नहीं होता, तो वे उस पैसे को बच्चों की पढ़ाई और पोषण पर खर्च करते हैं। पिछले दो सालों में खाने-पीने की चीजों के दाम काफी बढ़े हैं। ऐसे में एलपीजी की कीमतों में स्थिरता बनाए रखना सरकार के लिए राजनीतिक और सामाजिक दोनों रूप से जरूरी था। चालू वित्त वर्ष में इस खर्च को पेट्रोलियम सब्सिडी के बजट मद में शामिल किया गया है।
ग्राउंड स्तर पर हमारी पड़ताल में यह भी सामने आया कि कई परिवार अब भी रिफिल कराने में देरी करते हैं। एक स्थानीय गैस वितरक ने बताया कि सब्सिडी मिलने के बाद भी दिहाड़ी मजदूरों के लिए एकमुश्त 800 या 900 रुपये जुटाना आसान नहीं होता। इसलिए सरकार ने पहले ही 14.2 किलोग्राम के अलावा 5 किलोग्राम वाले छोटे सिलेंडरों का विकल्प भी दिया हुआ है। इस छोटे सिलेंडर पर भी आनुपातिक रूप से सब्सिडी का लाभ दिया जा रहा है। इससे गरीब परिवारों को जरूरत के हिसाब से गैस लेने में आसानी होती है।
सब्सिडी की रकम सीधे खाते में पाने के लिए जरूरी नियम
यदि आप उज्ज्वला योजना के लाभार्थी हैं, तो कुछ जरूरी बातों का ध्यान रखना बेहद जरूरी है। कई बार लोगों के बैंक खाते में सब्सिडी का पैसा नहीं पहुंच पाता। इसका सबसे बड़ा कारण बैंक खाते का आधार से लिंक न होना या ई-केवाईसी का अधूरा होना है। तेल कंपनियों ने सभी वितरकों को निर्देश दिए हैं कि वे अपने इलाके के ग्राहकों की बायोमेट्रिक ई-केवाईसी पूरी कराएं। इसके लिए ग्राहक को अपनी नजदीकी गैस एजेंसी पर जाकर उंगलियों के निशान या चेहरे के सत्यापन के जरिए पहचान दर्ज करानी होती है।
इसके अलावा ग्राहक का बैंक खाता डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर यानी डीबीटी के लिए सक्रिय होना चाहिए। यदि बैंक खाता लंबे समय से बंद है या एनपीसीआई मैपिंग नहीं हुई है, तो सब्सिडी अटक सकती है। गैस कंपनियों ने अब मोबाइल ऐप और टोल-फ्री नंबर भी जारी किए हैं। इनके जरिए उपभोक्ता घर बैठे अपनी सब्सिडी की स्थिति देख सकते हैं। अगर किसी महीने सब्सिडी खाते में न आए, तो तुरंत गैस एजेंसी से संपर्क करके खाता जांचना चाहिए।
गैस वितरकों की जमीनी तैयारी और ग्राहकों का अनुभव
द फ्रीलान्स की टीम ने अलग-अलग शहरों में एलपीजी वितरकों और आम उपभोक्ताओं से सीधी बात की। एजेंसी संचालकों ने बताया कि सब्सिडी की सूचना आने के बाद से बुकिंग में तेजी देखी जा रही है। लोग पहले संशय में थे कि उन्हें पुरानी दरों पर ही गैस मिलेगी या राहत जारी रहेगी। वितरकों का कहना है कि डिजिटल बिलिंग प्रणाली के चलते अब किसी भी तरह की हेराफेरी संभव नहीं है। सिलेंडर की डिलीवरी होते ही उपभोक्ता के पंजीकृत मोबाइल पर डिलीवरी और सब्सिडी का मैसेज पहुंच जाता है।
ग्राउंड रिपोर्ट के दौरान गृहिणियों ने साफ कहा कि महंगाई के दौर में 200 रुपये की बचत भी महीने के राशन में काम आती है। आम जनता चाहती है कि सामान्य उपभोक्ताओं के लिए भी गैस के दाम कुछ और कम किए जाएं। हालांकि सरकार का ध्यान फिलहाल पूरी तरह से सबसे कमजोर और जरूरतमंद तबके को सुरक्षा कवच देने पर केंद्रित है। आने वाले महीनों में वैश्विक बाजार के रुख को देखते हुए ईंधन की कीमतों पर और फैसले लिए जा सकते हैं।







