नई दिल्ली से ग्राउंड रिपोर्ट — अंतरिक्ष आधारित इंटरनेट सेवा देने वाली कंपनी स्टारलिंक के मालिक एलन मस्क ने भारत में अपने कारोबार को शुरू करने में आ रही रुकावटों को लेकर बड़ा बयान दिया है। मस्क ने सोशल मीडिया पर एक तीखी टिप्पणी करते हुए भारत के कुछ बड़े उद्योगपतियों पर उनकी कंपनी को लाइसेंस मिलने में जानबूझकर देरी कराने का गंभीर आरोप लगाया है। उन्होंने सीधे तौर पर सवाल उठाया है कि क्या देश में बड़े उद्योगपति ही नियमों को तय करते हैं और क्या वे ही असली बॉस हैं। मस्क के इस बयान के बाद देश के टेलीकॉम बाजार में हलचल तेज हो गई है।
एलन मस्क के इस बयान पर देश की सियासत भी गरमा गई है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर मस्क की पोस्ट का हवाला देते हुए तंज कसा है और आने वाले दिनों में इस मामले पर और खुलासे होने का इशारा किया है। विपक्षी दलों का कहना है कि देश के डिजिटल बाजार में कुछ गिने-चुने लोगों का ही दबदबा बना हुआ है। इससे विदेशी कंपनियों को निष्पक्ष मुकाबला करने का मौका नहीं मिल रहा है। राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि क्या भारत सरकार वास्तव में बड़ी कंपनियों के दबाव में काम कर रही है।
मस्क के दावों पर सरकार की सख्त सफाई
विवाद बढ़ने के बाद केंद्र सरकार के संबंधित विभागों ने एलन मस्क के इन सभी आरोपों को पूरी तरह बेबुनियाद और भ्रामक करार दिया है। सरकार की तरफ से साफ कहा गया है कि किसी भी कंपनी को रोकने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता है। देश में टेलिकॉम और स्पेक्ट्रम आवंटन के नियम पूरी तरह पारदर्शी हैं और हर कंपनी को कानून के दायरे में रहकर ही काम करना होता है। सरकार ने स्पष्ट किया कि स्टारलिंक को अभी तक लाइसेंस इसलिए नहीं मिला है क्योंकि कंपनी ने सुरक्षा और डेटा से जुड़े कुछ जरूरी दस्तावेजों को अभी तक पूरा नहीं किया है। जैसे ही सभी कानूनी औपचारिकताएं पूरी हो जाएंगी, लाइसेंस पर आगे का फैसला ले लिया जाएगा।
द फ्रीलान्स की टीम ने जब इस पूरे मामले की जमीनी हकीकत और विधिक प्रक्रियाओं की पड़ताल की, तो सामने आया कि भारत में सैटेलाइट इंटरनेट सेवाएं शुरू करने के लिए कई तरह के कड़े सुरक्षा मानकों से गुजरना पड़ता है। देश के कानून के मुताबिक, विदेशी कंपनियों को अपना डेटा भारत के अंदर ही स्टोर करना होगा और सुरक्षा एजेंसियों को समय-समय पर उसकी जांच का अधिकार देना होगा। स्टारलिंक और सरकार के बीच इन्हीं तकनीकी और सुरक्षा शर्तों को लेकर बातचीत चल रही है। इसे सीधे तौर पर किसी उद्योगपति द्वारा रोका जाना कहना पूरी तरह गलत और तथ्यों के परे है।
बाजार में दूसरी कंपनियों पर इसका क्या असर पड़ेगा?
भारत के इंटरनेट बाजार में इस समय जियो और एयरटेल जैसी बड़ी घरेलू कंपनियों का मजबूत कब्जा है। अगर एलन मस्क की स्टारलिंक कंपनी को भारत में काम करने की पूरी अनुमति मिल जाती है, तो देश के दूर-दराज के इलाकों में इंटरनेट की रफ्तार और पहुंच पूरी तरह बदल जाएगी। स्टारलिंक मुख्य रूप से उन ग्रामीण और पहाड़ी इलाकों को जोड़ने की योजना बना रही है जहां अभी तक मोबाइल टावर या फाइबर केबल नहीं पहुंच पाए हैं। ऐसे में मौजूदा टेलीकॉम कंपनियों के सामने एक नया और बड़ा मुकाबला खड़ा हो सकता है, जिसके लिए वे अपनी रणनीतियां तैयार कर रहे हैं।
आम जनता और छोटे व्यापारियों के मन में भी इस बात को लेकर उत्सुकता है कि क्या सैटेलाइट इंटरनेट का प्लान बहुत महंगा होगा। शुरुआती रिपोर्ट्स के मुताबिक, स्टारलिंक की सेवाएं उन इलाकों के लिए ज्यादा फायदेमंद होंगी जहां सामान्य ब्रॉडबैंड काम नहीं करता है। हालांकि, इसकी कीमत आम मोबाइल रिचार्ज जितनी सस्ती होगी या नहीं, इस पर अभी संशय बना हुआ है। ग्राहक यह जानना चाहते हैं कि क्या उन्हें भविष्य में बेहतर और बिना रुकावट वाला इंटरनेट मिल पाएगा।
रीचार्ज कराने और लाइसेंस मिलने से जुड़ी जरूरी बातें
फिलहाल भारत में स्टारलिंक की सेवाएं शुरू होने में अभी कुछ महीनों का वक्त और लग सकता है। जब तक कंपनी सरकार के सभी सुरक्षा मानकों को लिखित रूप से पूरा नहीं करती, तब तक कमर्शियल लॉन्च संभव नहीं है। एलन मस्क के बयानों और राजनीतिक बयानों के बीच आम आदमी को यह समझना जरूरी है कि देश में स्पेक्ट्रम और लाइसेंस के नियम सबके लिए एक समान हैं। द फ्रीलान्स की ग्राउंड रिपोर्ट बताती है कि आने वाले दिनों में सैटेलाइट इंटरनेट को लेकर प्रतिस्पर्धा और ज्यादा दिलचस्प होने वाली है, लेकिन कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही कोई अंतिम तस्वीर साफ होगी।







