नई दिल्ली/मुंबई ब्यूरो — विदेशी मुद्रा बाजार में भारतीय रुपये पर भारी दबाव देखा जा रहा है। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया लुढ़ककर 96 रुपये के स्तर को पार कर गया। शुरुआती कारोबार में रुपया 37 पैसे कमजोर होकर 96.31 प्रति डॉलर के नए स्तर तक पहुंच गया। बाजार में सुबह से ही डॉलर की भारी मांग देखने को मिली। विदेशी निवेशकों की बिकवाली और वैश्विक संकेतों की वजह से रुपये में यह गिरावट दर्ज की गई। करेंसी बाजार के बड़े डीलरों का कहना है कि अचानक सौदे कटने से रुपये पर दबाव बहुत बढ़ गया।
मुद्रा बाजार के जानकारों के अनुसार डॉलर इंडेक्स में मजबूती का असर एशियाई मुद्राओं पर साफ दिख रहा है। विदेशी निवेशक अपने पैसे को सुरक्षित मानकर डॉलर में लगा रहे हैं। इसी वजह से भारतीय मुद्रा पर चौतरफा दबाव बन गया। आयातकों को अपने पुराने बिल चुकाने के लिए डॉलर की सख्त जरूरत थी। जब बाजार में डॉलर की मांग ज्यादा और सप्लाई कम हुई, तो रुपये की कीमत नीचे आ गई। हालांकि कच्चे तेल के अंतरराष्ट्रीय दामों में थोड़ी नरमी है, जिससे रुपये को बहुत बड़ा झटका लगने से बचाव हुआ।
डॉलर महंगा होने से आम परिवार के बजट पर क्या असर पड़ेगा?
डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी का सीधा असर आम आदमी की जेब पर पड़ता है। भारत अपनी जरूरत का 80 फीसदी से ज्यादा कच्चा तेल बाहर से मंगाता है। तेल कंपनियों को कच्चे तेल का भुगतान डॉलर में ही करना होता है। जब डॉलर महंगा होता है, तो कंपनियों का आयात खर्च बढ़ जाता है। अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही, तो पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ सकती हैं। ईंधन महंगा होते ही माल ढुलाई का खर्च बढ़ जाता है। इससे फल, सब्जियां, दालें और अन्य रोजमर्रा की चीजें महंगी होने का खतरा पैदा हो जाता है।
इसके अलावा इलेक्ट्रॉनिक्स बाजार पर भी इसका गहरा असर पड़ता है। भारत में बिकने वाले स्मार्टफोन, लैपटॉप, टीवी और फ्रिज के ज्यादातर पार्ट्स विदेश से आते हैं। इन पार्ट्स का भुगतान डॉलर में किया जाता है। रुपये में कमजोरी के कारण टेक कंपनियों की लागत बढ़ जाएगी। कंपनियां यह बढ़ा हुआ बोझ सीधे ग्राहकों पर डाल सकती हैं। इससे आने वाले दिनों में नए गैजेट्स के दाम पांच से आठ फीसदी तक बढ़ सकते हैं। त्योहारी सीजन के बाद नया फोन या कंप्यूटर खरीदने की योजना बना रहे लोगों को ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ सकते हैं।
विदेशी पढ़ाई और घूमने जाना कितना खर्चीला होगा?
जिन परिवारों के बच्चे विदेश में पढ़ाई कर रहे हैं, उनके लिए यह गिरावट सीधी परेशानी लेकर आई है। कॉलेज की फीस और रहने का खर्च डॉलर में चुकाना होता है। रुपया 96 के पार जाने से ट्यूशन फीस में लाखों रुपये का अतिरिक्त अंतर आ जाएगा। बैंक से लिए गए एजुकेशन लोन की किस्तें भी बढ़ सकती हैं। अभिभावकों को हर महीने खर्च भेजने के लिए अब ज्यादा रुपये चुकाने होंगे। इससे मध्यमवर्गीय परिवारों का मासिक बजट पूरी तरह गड़बड़ा सकता है।
विदेश यात्रा का सपना देख रहे पर्यटकों पर भी इसका सीधा असर दिखेगा। विदेशी उड़ानों के टिकट, विदेश में होटल बुकिंग और वहां खाने-पीने का खर्च डॉलर से तय होता है। ट्रैवल एजेंसियों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय टूर पैकेज पहले की तुलना में 10 से 15 फीसदी तक महंगे हो सकते हैं। जो लोग छुट्टियों में विदेश जाने की तैयारी कर रहे थे, वे अब अपने बजट पर दोबारा विचार कर रहे हैं। कई लोग अब विदेश के बजाय देश के भीतर ही घूमने का मन बना रहे हैं।
रिजर्व बैंक का बड़ा दांव: डॉलर जुटाने के लिए क्या हुआ?
रुपये को बेकाबू गिरावट से बचाने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक पूरी तरह मुस्तैद है। केंद्रीय बैंक ने विदेशी मुद्रा भंडार को सहारा देने के लिए डॉलर-रुपया स्वैप सुविधा का इस्तेमाल किया। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, बैंकों ने बीते 11 हफ्तों में इस सुविधा के जरिए लगभग 73 अरब डॉलर जुटाए हैं। इस कदम से बैंकिंग सिस्टम में नकदी की स्थिति बेहतर हुई है। रिजर्व बैंक लगातार बाजार में दखल देकर रुपये को बहुत ज्यादा गिरने से रोक रहा है।
वित्तीय विश्लेषकों का मानना है कि भारत का विदेशी मुद्रा भंडार अभी भी मजबूत स्थिति में है। रिजर्व बैंक जरूरत पड़ने पर खुले बाजार में डॉलर बेचता है ताकि रुपये की चाल संभल सके। यदि कच्चा तेल 70 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बना रहता है, तो रुपये में दोबारा सुधार हो सकता है। आर्थिक विशेषज्ञों की सलाह है कि आयातकों को अपने जोखिम से बचने के लिए करेंसी हेजिंग का सहारा लेना चाहिए। आने वाले दिनों में अमेरिकी केंद्रीय बैंक के फैसलों पर नजर रहेगी, जिससे डॉलर की अगली चाल तय होगी।










