भारत के पड़ोसी देश म्यांमार की भू-राजनीतिक स्थिति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। वैश्विक महाशक्ति अमेरिका की दिलचस्पी अचानक इस दक्षिण-जिसे देश में काफी बढ़ गई है। दिलचस्प बात यह है कि जिस सैन्य शासन पर लोकतांत्रिक सरकार को उखाड़ फेंकने के गंभीर आरोप हैं, उसी मिलिट्री लीडरशिप के साथ अमेरिकी अधिकारी गुपचुप तरीके से टेबल टॉक कर रहे हैं। इस कूटनीति के पीछे सिर्फ राजनीतिक समीकरण नहीं, बल्कि जमीन के भीतर दबे ऐसे अनमोल खजाने छिपे हैं, जिन पर ड्रैगन यानी चीन की मजबूत पकड़ है।
अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका और म्यांमार के सैन्य अधिकारियों के बीच हाल ही में जापान की राजधानी टोक्यो में एक उच्च स्तरीय बैठक हुई है। महज एक महीने के भीतर दोनों पक्षों के बीच यह दूसरी ऐसी गुप्त बैठक थी, जिससे एशियाई कूटनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। इस पूरी कूटनीतिक कवायद का सबसे बड़ा कारण आधुनिक तकनीक में इस्तेमाल होने वाले वे दुर्लभ खनिज हैं, जिन्हें 'रेयर अर्थ मिनरल्स' कहा जाता है। आइए जानते हैं कि आखिर अमेरिका इस खेल के जरिए क्या हासिल करना चाहता है।
रेयर अर्थ खनिजों पर कब्जे की जंग और चीन का बढ़ता दबदबा
आज की तारीख में रेयर अर्थ खनिज दुनिया की बड़ी ताकतों के बीच वर्चस्व की लड़ाई का सबसे बड़ा हथियार बन चुके हैं। इलेक्ट्रिक वाहनों में लगने वाली दमदार बैटरियों से लेकर विंड एनर्जी के टर्बाइन और डिफेंस सेक्टर के आधुनिक उपकरणों तक, हर जगह इन खास खनिजों की भारी मांग है। इनमें डिस्प्रोसियम और टर्बियम जैसे भारी रेयर अर्थ तत्व शामिल हैं, जिनकी मदद से ऐसे चुंबक तैयार होते हैं जो अत्यधिक तापमान और कठिन परिस्थितियों में भी बेहतरीन काम कर सकते हैं।
बड़ी समस्या यह है कि इन सभी महत्वपूर्ण खनिजों की ग्लोबल सप्लाई चेन पर पूरी तरह से चीन का एकाधिकार है। चीन केवल कच्चे खनिजों का खनन ही नहीं करता, बल्कि उन्हें साफ करने, रिफाइन करने और उद्योगों के इस्तेमाल लायक बनाने की पूरी क्षमता भी अपने पास रखता है। यदि भविष्य में चीन अपनी मनमानी करते हुए इन खनिजों की सप्लाई रोक देता है, तो दुनिया भर के ऑटोमोबाइल और तकनीकी उद्योग संकट में आ सकते हैं। अमेरिका इसी खतरे को भांपते हुए म्यांमार के रास्ते अपनी स्थिति मजबूत करना चाहता है।
जापान में हुई सीक्रेट मीटिंग और अमेरिकी अधिकारियों का दौरा
टोक्यो में हुई इस गुप्त बैठक में अमेरिकी विदेश विभाग के खुफिया और रिसर्च डिपार्टमेंट के सहायक सचिव माइकल वेंस ने कमान संभाली थी। उनके साथ एक दर्जन से अधिक वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी भी मौजूद थे। इस मुलाकात से ठीक पहले सितंबर के मध्य में माइकल वेंस ने म्यांमार की राजधानी नेपीडॉ का दौरा भी किया था। वहां उन्होंने सैन्य समर्थित सरकार के शीर्ष नेता मिन आंग ह्लाइंग से मुलाकात की थी।
सूत्रों के मुताबिक, इस कूटनीतिक संवाद के दौरान केवल खनिजों की बात नहीं हुई, बल्कि अन्य क्षेत्रीय मुद्दे भी उठाए गए। इनमें एक अमेरिकी कारोबारी की रिहाई और अमेरिकी नागरिकों को निशाना बनाकर चलाए जा रहे ऑनलाइन ठगी व साइबर क्राइम के नेटवर्क पर नकेल कसने जैसे गंभीर विषय भी शामिल थे। अमेरिका म्यांमार की वर्तमान व्यवस्था में अपनी घुसपैठ बढ़ाकर वहां के संसाधनों तक सीधी पहुंच बनाना चाहता है।
स्थानीय विद्रोहियों और जातीय संघर्ष की बड़ी चुनौती
हालांकि अमेरिका की यह रणनीति दूर की कौड़ी लग सकती है, लेकिन जमीन पर इसे लागू करना लोहे के चने चबाने जैसा है। म्यांमार के जिन पहाड़ी इलाकों में ये बहुमूल्य रेयर अर्थ खदानें स्थित हैं, उनमें से कई क्षेत्रों पर वहां की सेना का सीधा नियंत्रण ही नहीं है। उदाहरण के लिए, काचिन राज्य की खदानें दुनिया की भारी रेयर अर्थ सप्लाई का लगभग आधा हिस्सा देती हैं, लेकिन वहां काचिन इंडिपेंडेंस आर्मी (KIA) नाम के सशस्त्र विद्रोही संगठन का दबदबा है।
यह विद्रोही संगठन लंबे समय से म्यांमार की सेना के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष चला रहा है। पिछले कुछ महीनों में इन इलाकों में हिंसक झड़पें और बढ़ी हैं, जिससे खनन और खनिज आपूर्ति को लेकर भारी अनिश्चितता बनी हुई है। सेना और विद्रोहियों के बीच चल रहे इस खूनी संघर्ष के कारण अमेरिकी कंपनियों के लिए वहां सुरक्षित निवेश करना आसान नहीं होगा।
"वैश्विक तकनीकी बाजार में अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए महाशक्तियों को वैकल्पिक सप्लाई चेन की सख्त जरूरत है, और म्यांमार का भू-भाग इस खेल में नया अखाड़ा बनता जा रहा है।" — रक्षा एवं कूटनीतिक मामलों के विशेषज्ञ
कुल मिलाकर, अमेरिका की यह नई चाल एशिया प्रशांत क्षेत्र में चीन के वर्चस्व को चुनौती देने की एक बड़ी कोशिश है। एक तरफ जहां म्यांमार की सेना अपनी सत्ता बचाने के लिए बाहरी सहयोग तलाश रही है, वहीं अमेरिका इसका पूरा फायदा उठाकर अपने औद्योगिक हितों को सुरक्षित करने में जुटा है। आने वाले दिनों में यह कूटनीतिक रस्साकशी एशियाई कूटनीति का रुख तय करने में अहम भूमिका निभाएगी।










