चेन्नई में डीएमके मुख्यालय पर हुई उच्चस्तरीय बैठक
तमिलनाडु की राजनीति में इन दिनों उथल-पुथल मची हुई है। शनिवार को चेन्नई स्थित पार्टी मुख्यालय 'अन्ना अरिवालयम' के मुरासोली मारन मीटिंग हॉल में द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) के सांसदों की एक बेहद अहम बैठक आयोजित की गई। पार्टी अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री एमके स्टालिन की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में कई बड़े राजनीतिक और चुनावी मुद्दों पर गहन मंथन किया गया। बैठक का मुख्य फोकस देश की चुनावी व्यवस्था, निर्वाचन आयोग के कामकाज और हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों पर रहा।
इस उच्चस्तरीय बैठक में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने शिरकत की और देश की मौजूदा राजनीतिक दिशा पर खुलकर चर्चा की। बैठक के बाद पार्टी की ओर से चार प्रमुख प्रस्तावों को हरी झंडी दिखाई गई, जो आने वाले दिनों में राष्ट्रीय राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे सकते हैं। डीएमके नेतृत्व ने साफ कर दिया है कि वह चुनावी पारदर्शिता से जुड़े मामलों पर किसी भी तरह का समझौता करने के मूड में नहीं है। पार्टी ने अपनी आक्रामक रणनीति के तहत सीधे तौर पर मुख्य चुनाव आयुक्त को निशाना बनाया है और उनके खिलाफ कड़े कदम उठाने की मांग की है।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की उठी मांग
डीएमके की इस बैठक का सबसे बड़ा और तीखा प्रस्ताव मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से जुड़ा हुआ है। पार्टी ने एक प्रस्ताव पारित कर मांग की है कि मुख्य चुनाव आयुक्त को तत्काल उनके पद से हटाया जाए। डीएमके का आरोप है कि चुनाव आयोग के कामकाज में एकतरफा फैसले लिए जा रहे हैं, जिससे लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर सवालिया निशान लग रहे हैं। पार्टी का यह भी दावा है कि अन्य चुनाव आयुक्तों के विरोध के बावजूद कई अहम फैसले लिए गए, जो पूरी तरह अनुचित हैं।
पार्टी सूत्रों के मुताबिक, डीएमके नेताओं का मानना है कि देश की निर्वाचन प्रणाली को बचाने के लिए यह जरूरी है कि इस पद पर बैठे व्यक्ति की भूमिका निष्पक्ष हो। एमके स्टालिन ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि चुनाव आयोग को किसी भी राजनीतिक दल के दबाव से मुक्त होकर काम करना चाहिए। ज्ञानेश कुमार के खिलाफ इस आक्रामक रुख को अपनाकर डीएमके ने राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष के बीच अपनी एक अलग और मजबूत राजनीतिक लकीर खींचने की कोशिश की है, जिसके दूरगामी राजनीतिक परिणाम देखने को मिल सकते हैं।
विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया और ईवीएम पर कड़ा ऐترض
चुनावी सुधारों की कड़ी में डीएमके ने विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया को देशहित के खिलाफ बताया है। पार्टी का कहना है कि मॉनसून और त्योहारों के इस दौर में इस तरह की प्रक्रिया चलाना पूरी तरह से अव्यावहारिक है। इससे बड़े पैमाने पर आम और गरीब मतदाताओं के नाम सूची से कटने का खतरा पैदा हो जाता है। डीएमके ने यह भी मांग की है कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी ईवीएम की जगह एक बार फिर से पारदर्शी बैलेट पेपर प्रणाली को बहाल किया जाना चाहिए, ताकि जनता का चुनाव प्रक्रिया पर पूरा भरोसा कायम रह सके।
इन तमाम गंभीर मुद्दों को लेकर डीएमके ने अब सीधे देश के राष्ट्रपति का दरवाजा खटखटाने का फैसला किया है। पार्टी के प्रतिनिधिमंडल द्वारा भारत के राष्ट्रपति को एक विस्तृत याचिका सौंपी जाएगी, जिसमें चुनावी अनियमितताओं को दूर करने और सुधारात्मक कदम उठाने की पुरजोर मांग की जाएगी। स्टालिन ने याद दिलाया कि उनकी पार्टी ने सबसे पहले बिहार में इस तरह की विसंगतियों का मुद्दा उठाया था और वे इस लड़ाई को हर संभव मंच पर लड़ेंगे।
कांग्रेस और टीवीके के दोहरे मापदंडों पर फूटा गुस्सा
बैठक के दौरान केवल केंद्र सरकार या चुनाव आयोग ही नहीं, बल्कि विपक्षी खेमे के भीतर चल रही राजनीतिक खींचतान पर भी खुलकर बात हुई। डीएमके ने कांग्रेस और अभिनेता विजय के नेतृत्व वाली पार्टी तमिलगा वेत्री कड़गम (टीवीके) के दोहरे रवैये और राजनीतिक आचरण की कड़ी आलोचना की। प्रस्ताव में सवाल उठाया गया कि जो दल मंच साझा करते हैं और बड़े-बड़े दावे करते हैं, वे आखिर एसआईआर और मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ खुलकर बोलने से क्यों बच रहे हैं।
पार्टी ने स्पष्ट लहजे में कहा कि जनता को भ्रमित करने का खेल अब और अधिक बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि डीएमके द्वारा कांग्रेस और टीवीके पर इस तरह का सीधा हमला इस बात का संकेत है कि तमिलनाडु के चुनावी मैदान में क्षेत्रीय दल अपनी शर्तों पर राजनीति करना चाहते हैं और किसी भी प्रकार के दबाव में झुकने को तैयार नहीं हैं। आने वाले समय में यह वैचारिक दूरी विपक्षी दलों के बीच नए समीकरणों को जन्म दे सकती है।
छात्र आंदोलनों को खुला समर्थन और विरोध प्रदर्शन
चुनावी सुधारों और संस्थागत शुचिता के अलावा, डीएमके ने सड़क पर उतरकर संघर्ष कर रहे छात्र संगठनों के आंदोलनों को भी अपना पूरा समर्थन देने का ऐलान किया है। पार्टी नेताओं का कहना है कि जब युवा और छात्र देश के लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए आवाज उठा रहे हैं, तो एक राजनीतिक दल के रूप में उनका नैतिक दायित्व बनता है कि वे इस संघर्ष में उनके साथ मजबूती से खड़े रहें। कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) और अन्य छात्र संगठनों के हालिया प्रदर्शनों के दौरान की गई गिरफ्तारियों पर भी पार्टी ने गहरी नाराजगी जताई है।
"जब लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए लड़ने वाले नेताओं और छात्रों को निशाना बनाया जाता है, तो हमारी पार्टी चुप नहीं बैठ सकती। हम हर उस आवाज का समर्थन करेंगे जो संविधान और जनता के अधिकारों की रक्षा के लिए सड़क पर उतरी है। मुख्य चुनाव आयुक्त को लेकर हमारी मांग पूरी तरह से न्यायसंगत है।" — एमके स्टालिन, अध्यक्ष, डीएमके
निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि चेन्नई की इस बैठक ने राष्ट्रीय राजनीति के गलियारों में हलचल तेज कर दी है। एक तरफ जहां डीएमके ने अपने तेवर कड़े कर लिए हैं, वहीं दूसरी तरफ क्षेत्रीय राजनीति में नए गठबंधनों और तीसरे मोर्चे की अटकलें भी तेज हो गई हैं। आने वाले हफ्तों में यह देखना दिलचस्प होगा कि चुनाव आयोग और केंद्र सरकार इस राजनीतिक दबाव का क्या जवाब देती है।











