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मजरूह सुल्तानपुरी से पहली मुलाकात को याद कर इमोशनल हुए ललित पंडित, बोले- उन्होंने कहा था, 'तुम क्यों आ गए, मैं तो अब काम नहीं करता'

हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम दौर के संगीतकार ललित पंडित ने 'द फ्रीलांस' के साथ खास बातचीत में लीजेंड्री गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी से जुड़ी अनकही यादें साझा कीं। मजरूह की जयंती पर उनका एक अनसुना गाना रिलीज होने जा रहा है।
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सिनेमा एवं मनोरंजन डेस्क, द फ्रीलांस
सिनेमा व संस्कृति डेस्क•29 सितंबर 2026 • अपडेटेड•39
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मजरूह सुल्तानपुरी से पहली मुलाकात को याद कर इमोशनल हुए ललित पंडित, बोले- उन्होंने कहा था, 'तुम क्यों आ गए, मैं तो अब काम नहीं करता'
📷 मजरूह सुल्तानपुरी से पहली मुलाकात को याद कर इमोशनल हुए ललित पंडित, बोले- उन्होंने कहा था, 'तुम क्यों आ गए, मैं तो अब काम नहीं करता' — मुख्य घटनाक्रमफोटो साभार: रॉयटर्स / एजेंसीज़ / सोशल मीडिया

खबर की बड़ी बातें (Key Highlights)

  • हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम दौर के संगीतकार ललित पंडित ने 'द फ्रीलांस' के साथ खास बातचीत में लीजेंड्री गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी से जुड़ी अनकही यादें साझा कीं। मजरूह की जयंती पर उनका एक अनसुना गाना रिलीज होने जा रहा है।
  • इस खबर से जुड़े सभी पहलुओं की जांच और निगरानी संबंधित विभागों द्वारा की जा रही है।
  • विशेषज्ञों के अनुसार इस घटनाक्रम का आम जनता पर सीधा असर पड़ सकता है।

मुंबई की बारिश के बीच बांद्रा के उस पुराने इलाके की यादें आज भी संगीतकार ललित पंडित के जहन में उतनी ही ताजा हैं, जहां उन्होंने पहली बार हिंदी सिनेमा के महान गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी की चौखट पर कदम रखा था। नब्बे के दशक के उस जादुई संगीत दौर की बात ही निराली थी, जब जतिन-ललित की जोड़ी ने 'जो जीता वही सिकंदर', 'खामोशी', 'कभी हां कभी ना' और 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' जैसी फिल्मों से धुनों का ऐसा ताना-बाना बुना जो आज भी संगीत प्रेमियों की रगों में दौड़ता है। इसी सुरीले सफर के बीच एक ऐसा रिश्ता भी बना, जिसने इन संगीतकारों की पूरी कायनात बदल दी। वह रिश्ता था मजरूह सुल्तानपुरी के साथ।

जब मजरूह साहब ने कहा था, 'तुम क्यों आ गए, मैं तो अब काम नहीं करता'

मजरूह सुल्तानपुरी की जन्म-जयंती के अवसर पर संगीतकार ललित पंडित ने 'द फ्रीलांस' को दिए गए विशेष साक्षात्कार में उस दौर के कई अनछुए पन्नों को पलटा। ललित पंडित ने बताया कि कैसे उनकी बहन और जानी-मानी अभिनेत्री-गायिका सुलक्षणा पंडित के कहने पर वे और जतिन रिजवी कॉलेज के पास स्थित मजरूह साहब के घर पहुंचे थे। उस समय इंडस्ट्री का एक बड़ा तबका मजरूह साहब से दूरी बना चुका था और वे काम न मिलने से थोड़े आहत भी थे।

जब दोनों भाई पहली बार उनके सामने पहुंचे, तो मजरूह साहब का शुरुआती रिएक्शन कुछ यूं था, 'तुम लोग यहां क्यों आ गए, मैं तो अब काम नहीं करता।' लेकिन उस एक झटके के बाद जो सिलसिला शुरू हुआ, उसने हिंदी सिनेमा को इतिहास के पन्नों में दर्ज कई सदाबहार गीत दे दिए।

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प्रमुख बिंदु व पड़ताल

  • खोया हुआ नगीना आ रहा है सामने: मजरूह सुल्तानपुरी के जन्मदिन यानी 1 अक्टूबर को ललित पंडित उनका लिखा पुराना गीत ‘बात नजर की है’ आधिकारिक तौर पर रिलीज करने जा रहे हैं। यह गीत मूल रूप से ललित और जतिन के एक प्राइवेट एल्बम के लिए रिकॉर्ड हुआ था, जिसकी धुन ललित ने बनाई थी और बोल मजरूह साहब ने रचे थे।
  • गुरु और मार्गदर्शक का साया: 'यारा दिलदारा' फिल्म के सुपरहिट गीत 'बिन तेरे सनम' से मिली पहली बड़ी सफलता के बाद, जतिन-ललित का मजरूह साहब के साथ एक गहरा वैचारिक और आत्मीय जुड़ाव हो गया था। उनके गानों से ज्यादा उनका सानिध्य और बातें इन युवा संगीतकारों के लिए किसी पाठशाला से कम नहीं थीं।
  • बचपन के पसंदीदा गीतकार: शुरुआती दिनों में ललित को यह भी इल्म नहीं था कि उनके जीवन के तमाम पसंदीदा और गुनगुनाए जाने वाले गाने असल में मजरूह सुल्तानपुरी की ही कलम से निकले हैं। आनंद बख्शी जैसे दिग्गजों के बीच मजरूह का अंदाज सबसे जुदा था।

जतिन-ललित की जोड़ी और मजरूह सुल्तानपुरी का यह सफर केवल व्यावसायिक सहयोग नहीं था, बल्कि यह दो पीढ़ियों के बीच संगीत की एक ऐसी पवित्र जुगलबंदी थी जिसने भारतीय सिनेमा के कैनवास को हमेशा के लिए जीवंत कर दिया। अब बरसों बाद उस अनसुने गीत 'बात नजर की है' का रिलीज होना, उस सुनहरे दौर को एक बार फिर से जीवंत करने जैसा है।

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