बच्चे के जन्म लेते ही माता-पिता उसके लिए एक से बढ़कर एक खूबसूरत और अर्थपूर्ण नाम तलाशते हैं। कोई भगवान के नाम पर बच्चे का नाम रखता है, तो कोई आधुनिक और ट्रेंडी नाम चुनना पसंद करता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि किसी समाज में माता-पिता अपने ही जिगर के टुकड़े का नाम 'कुत्ता' या 'सूअर' रख सकते हैं? सुनने में भले ही यह अजीब लगे, लेकिन इतिहास के पन्नों को पलटें तो प्राचीन चीन में यह एक बेहद आम और गहरी परंपरा थी। माता-पिता अपने बच्चों को बुरी किस्मत, बीमारियों और बुरी आत्माओं से बचाने की उम्मीद में ऐसे नाम रखते थे।
आखिर क्यों रखे जाते थे ऐसे अजीब नाम?
साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की एक रिपोर्ट के अनुसार, पुराने चीन में चिकित्सा विज्ञान और स्वास्थ्य सुविधाएं आज जितनी विकसित नहीं थीं। उस दौर में बच्चों के बीमार पड़ने और कम उम्र में ही उनकी असमय मौत हो जाने का खतरा बहुत अधिक रहता था। इस लाचारी और डर के माहौल में लोग तमाम तरह की पारंपरिक मान्यताओं और अंधविश्वासों पर भरोसा करने लगे।
माता-पिता का ऐसा मानना था कि यदि उनके बच्चे का नाम बहुत सुंदर, आकर्षक या विशिष्ट होगा, तो बुरी आत्माओं और देवताओं की नजर उस पर जल्दी पड़ जाएगी। इसके विपरीत, यदि बच्चे का नाम बेहद साधारण, तुच्छ या बदरंग जैसा होगा (जैसे कुत्ता या सूअर), तो बुरी आत्माएं उसकी तरफ ध्यान नहीं देंगी और बच्चा बुरी नजर से सुरक्षित बचा रहेगा। हालांकि, यह पूरी तरह से लोक-विश्वास और पारंपरिक मान्यता थी, जिसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है।
कुत्ता-सूअर ही नहीं, पत्थर और हथौड़े पर भी रखे जाते थे नाम
प्राचीन काल में बच्चों के नाम सिर्फ जानवरों तक ही सीमित नहीं थे, बल्कि कई परिवार उन्हें 'पत्थर', 'लोहे के खंभे' और 'हथौड़े' जैसी मजबूत चीजों के नाम पर भी बुलाते थे। इसके पीछे माता-पिता की यह मनोवैज्ञानिक उम्मीद होती थी कि उनका बच्चा इन कठोर चीजों की तरह मजबूत बने और जीवन की हर कठिनाई व बीमारी का डटकर सामना कर सके।
ऐतिहासिक दस्तावेजों में ऐसे कई नामों का जिक्र मिलता है। उदाहरण के लिए, कुछ बच्चों को 'गौ शेंग' कहा जाता था, जिसका शाब्दिक अर्थ 'कुत्ते का बचा हुआ खाना' होता था। वहीं, 'झू वा' का अर्थ 'सूअर का बच्चा' होता है। हैरान करने वाली बात यह है कि यह परंपरा सिर्फ आम और गरीब परिवारों तक ही सीमित नहीं थी, बल्कि प्राचीन चीन के कई प्रतिष्ठित और शाही घरानों के लोगों के भी ऐसे उपनाम हुआ करते थे। पश्चिमी हान राजवंश के सम्राट वू का उपनाम 'झी' था, जिसका अर्थ सूअर होता है, जबकि प्रसिद्ध लेखक सिमा शियांग्रू का उपनाम 'क्वान जि' था जिसका संबंध कुत्ते से था।
आधुनिक समय में कितना बदला है समाज?
जैसे-जैसे समय बीता, चिकित्सा विज्ञान ने तरक्की की, लोगों की सोच बदली और आधुनिक शिक्षा का प्रसार हुआ, चीन में इस तरह की परंपराएं लगभग समाप्त हो गई हैं। आज के समय में माता-पिता अपने बच्चों के आधुनिक और प्यारे नाम रखना पसंद करते हैं। हालांकि, देश के कुछ दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों में आज भी बुजुर्गों की जुबान पर ऐसे पुराने नाम सुनने को मिल जाते हैं।
ऐतिहासिक रिपोर्ट्स में चीन के शान्शी प्रांत की एक महिला का जिक्र मिलता है, जिसके बचपन का नाम 'गौ दान' था। जब उसकी मां यूनिवर्सिटी में उससे मिलने गई और सबके सामने उसे इसी नाम से पुकारा, तो उसके सहपाठी हंसने लगे। महिला ने बताया कि बचपन में वह गंभीर रूप से बीमार पड़ गई थी, इसलिए उसके माता-पिता ने उसे इस नाम से पुकारना शुरू किया ताकि वह सुरक्षित रह सके। आज भले ही ये नाम मजाकिया या अजीब लगें, लेकिन उस दौर में यह माता-पिता के अपने बच्चे के प्रति अटूट प्रेम और उसे जीवित रखने की जद्दोजहद का प्रतीक हुआ करते थे।
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