📌 मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- FSSAI के निर्देशानुसार अब हलवाई की दुकानों पर रखी हर खुली मिठाई की ट्रे पर उसके बनने की तारीख और उपभोग की अंतिम तिथि (Best Before Date) लिखना अनिवार्य है।
- खोया, मावा और छेना आधारित मिठाइयां 24 से 48 घंटे के भीतर खराब होने लगती हैं, लेकिन अक्सर इन्हें कई दिनों तक रीसायकल कर चाशनी में डुबोकर बेचा जाता है।
- नियमों का उल्लंघन करने पर खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम 2006 के तहत भारी जुर्माना और दुकान का लाइसेंस रद्द करने का प्रावधान है।
- उपभोक्ताओं को जागरूक करने के साथ-साथ लैब टेस्टिंग और ग्राउंड इंस्पेक्शन की भारी कमी इस नए आदेश के पूरी तरह लागू होने की राह में सबसे बड़ा रोड़ा है।
भारत में त्योहारों, शादियों या किसी भी खुशी के मौके पर मिठाई बांटना केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि सामाजिक संवाद और आतिथ्य का अभिन्न हिस्सा है। सुबह के नाश्ते में जलेबी से लेकर रात के खाने के बाद गुलाब जामुन या रसमलाई तक, भारतीय घरों में खुली मिठाइयों की खपत करोड़ों टन में होती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिस शोकेस में सजी चमचमाती काजू कतली, कलाकंद या पेड़े को देखकर आपका मन ललचाता है, वह वास्तव में कब बनी थी? क्या वह ताजी है या फिर बासी खोए को नई चाशनी और कृत्रिम सुगंध से दोबारा जिंदा करने की कोशिश की गई है? इन्हीं गंभीर सवालों के बीच भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) और राज्य खाद्य सुरक्षा विभागों ने एक बड़ा नीतिगत कदम उठाते हुए खुली मिठाइयों के डिस्प्ले ट्रे पर 'यूज बाय डेट' (उपभोग की अंतिम तारीख) प्रदर्शित करना अनिवार्य कर दिया है।
1. असल मामला क्या है: पृष्ठभूमि और अब तक का घटनाक्रम
भारत में डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों (Packaged Foods) पर निर्माण तिथि (Mfg Date) और एक्सपायरी डेट लिखना दशकों से कानूनी आवश्यकता रहा है। लेकिन जब बात स्थानीय हलवाई की दुकानों पर बिकने वाली खुली मिठाइयों की आती थी, तो यह क्षेत्र पूरी तरह से असंगठित और जवाबदेही से मुक्त था। उपभोक्ता केवल दुकानदार के मौखिक आश्वासन पर भरोसा करने को मजबूर थे कि मिठाई आज सुबह ही बनी है। FSSAI ने पहली बार 2020 में खुली मिठाइयों के लिए 'बेस्ट बिफोर डेट' लिखने का दिशा-निर्देश जारी किया था, लेकिन महामारी और व्यापारियों के कड़े विरोध के कारण यह आदेश ज्यादातर कागजों में ही सिमट कर रह गया था।
हाल के महीनों में विभिन्न राज्यों के खाद्य सुरक्षा विभागों द्वारा की गई औचक छापेमारी में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। दीवाली, रक्षाबंधन, होली जैसे प्रमुख त्योहारों के दौरान हजारों क्विंटल बासी मावा, फफूंद लगी मिठाइयां और रासायनिक रंगों से तैयार खोया जब्त किया गया। कई मामलों में यह पाया गया कि 4-5 दिन पुरानी बची हुई मिठाइयों को मिक्सी में पीसकर नए नाम से बर्फी या लड्डू बनाकर फिर से बेचा जा रहा था। इन गंभीर खाद्य जनित बीमारियों के बढ़ते मामलों और जनस्वास्थ्य के बिगड़ते आंकड़ों को देखते हुए नियामकों ने अब इस आदेश को सख्ती से लागू करने का अल्टीमेटम जारी किया है।
नए आदेश के तहत, मिठाई विक्रेताओं को प्रत्येक ट्रे, कंटेनर या शोकेस स्लैब पर स्पष्ट और पठनीय अक्षरों में मिठाई का नाम, वह किस दिन बनी है और उसे कब तक खाया जा सकता है (Best Before / Use by Date), अंकित करना होगा। यह नियम न केवल बड़े ब्रांडेड मिष्ठान भंडारों पर बल्कि मोहल्ले की नुक्कड़ वाली छोटी दुकानों और कैटरर्स पर भी समान रूप से लागू किया गया है।
2. आम नागरिक और परिवारों पर इसका सीधा असर: समझें पूरा गणित
इस फैसले का सीधा सरोकार देश के आम मध्यमवर्गीय परिवारों की सेहत और उनके बजट से है। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) और गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट्स के अनुसार, भारत में त्योहारों के बाद फूड पॉइजनिंग, एक्यूट गैस्ट्रोएंटेराइटिस, उल्टी-दस्त और लिवर संक्रमण के मामलों में 25 से 40 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखी जाती है। इसका सबसे बड़ा कारण बासी मावा, छेना और मिलावटी दूध से बनी मिठाइयां होती हैं, जिनमें साल्मोनेला, ई-कोलाई और स्टैफिलोकोकस जैसे बैक्टीरिया तेजी से पनपते हैं।
डेयरी और खोया उत्पादों की शेल्फ लाइफ बहुत सीमित होती है। सामान्य कमरे के तापमान (25 से 30 डिग्री सेल्सियस) पर खोया और मावा आधारित मिठाइयां 24 घंटे के भीतर खराब होना शुरू हो जाती हैं। यदि उन्हें रेफ्रिजरेट न किया जाए, तो 36 घंटे के भीतर वे विषैली हो सकती हैं। छेने से बनी मिठाइयां जैसे रसगुल्ला, रसमलाई और संदेश की लाइफ और भी कम होती है। नया आदेश लागू होने से आम उपभोक्ता अब यह जान सकेगा कि जो मिठाई वह अपने बच्चों या बुजुर्ग माता-पिता के लिए खरीद रहा है, वह सुरक्षित उपभोग की सीमा के भीतर है या नहीं।
आर्थिक दृष्टिकोण से देखें तो एक औसत भारतीय परिवार किसी भी त्योहार पर 1,000 रुपये से लेकर 5,000 रुपये तक मिठाइयों पर खर्च करता है। जब उपभोक्ता 600 से 1200 रुपये प्रति किलो की दर से प्रीमियम मिठाई खरीदता है और घर जाकर पता चलता है कि उसमें से खट्टी गंध आ रही है, तो यह न केवल वित्तीय नुकसान है बल्कि विश्वास का हनन भी है। 'यूज बाय डेट' अनिवार्य होने से उपभोक्ताओं को खराब उत्पाद वापस करने या उपभोक्ता फोरम में शिकायत दर्ज कराने का ठोस दस्तावेजी आधार मिलेगा।
"खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2006 की धारा 16 के तहत हर नागरिक को यह जानने का बुनियादी अधिकार है कि वह जो खा रहा है, वह कब बना और कब तक सुरक्षित है। मिठाइयों पर तारीख लिखना व्यापार पर प्रतिबंध नहीं, बल्कि नागरिक के जीने के अधिकार का संरक्षण है।" — खाद्य सुरक्षा विशेषज्ञ एवं पूर्व नियामक सलाहकार
3. आंकड़ों और नीतियों का विश्लेषण: दावों और हकीकत में कितना फर्क?
भारतीय मिठाई उद्योग (Mithai & Namkeen Industry) का वार्षिक कारोबार लगभग 1.25 लाख करोड़ रुपये आंका गया है, जिसमें से 70% से अधिक हिस्सा आज भी असंगठित क्षेत्र के अंतर्गत आता है। देश में लगभग 10 लाख से अधिक छोटी-बड़ी मिठाई की दुकानें हैं। इतने विशाल नेटवर्क पर निगरानी रखना किसी भी राज्य के खाद्य सुरक्षा विभाग के लिए एक भारी प्रशासनिक चुनौती है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत में प्रति 10 लाख की आबादी पर औसतन 1 से 2 खाद्य सुरक्षा अधिकारी (Food Safety Officer) उपलब्ध हैं, जबकि विकसित देशों में यह अनुपात कहीं अधिक है। देश में अत्याधुनिक नेशनल एक्रेडिटेशन बोर्ड फॉर टेस्टिंग एंड कैलिब्रेशन लेबोरेटरीज (NABL) प्रमाणित खाद्य प्रयोगशालाओं की संख्या भी मांग के मुकाबले बेहद कम है। जब तक किसी सैंपल की रिपोर्ट आती है, तब तक संबंधित मिठाई का पूरा बैच बाजार में बिक चुका होता है और खाया जा चुका होता है।
इस नीतिगत विसंगति के कारण सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या केवल ट्रे पर तारीख लिख देने से मिठाई की ताजगी सुनिश्चित हो जाएगी? व्यापारी संगठनों का तर्क है कि भारत की गर्म और नम जलवायु में हर मिठाई की शेल्फ लाइफ मौसम, आर्द्रता और भंडारण तापमान के अनुसार बदलती रहती है। गर्मियों में जो मिठाई 24 घंटे में खराब हो सकती है, वही सर्दियों में 48 से 72 घंटे तक चल सकती है। ऐसे में बिना वैज्ञानिक कोल्ड चेन और तापमान नियंत्रण के सिर्फ एक निश्चित तारीख लिख देना जमीनी हकीकत से मेल नहीं खाता।
4. विशेषज्ञों और नीति निर्धारकों की क्या है राय?
स्वास्थ्य और खाद्य प्रौद्योगिकी विशेषज्ञों ने इस कदम का व्यापक स्वागत किया है, लेकिन साथ ही इसके वैज्ञानिक कार्यान्वयन पर जोर दिया है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूट्रिशन (NIN) के शोधकर्ताओं का कहना है कि भारत में मिठाई बनाने की विधियां बेहद विविध हैं। उदाहरण के लिए, अत्यधिक चीनी की चाशनी में डूबे सूखे गुलाब जामुन या बेसन के लड्डू में पानी की मात्रा (Water Activity) कम होती है, इसलिए वे 7 से 15 दिनों तक सुरक्षित रह सकते हैं। इसके विपरीत, दूध और छेने की मिठाइयों में नमी अधिक होती है, जो सूक्ष्मजीवों के विकास के लिए आदर्श वातावरण प्रदान करती है।
फेडरेशन ऑफ स्वीट्स एंड नमकीन मैन्युफैक्चरर्स (FSNM) जैसे उद्योग निकायों का कहना है कि वे सुरक्षा मानकों के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन छोटे हलवाइयों के पास शेल्फ-लाइफ निर्धारित करने के लिए कोई वैज्ञानिक उपकरण या लैब सुविधाएं नहीं हैं। उनका कहना है कि FSSAI को विभिन्न श्रेणियों की मिठाइयों के लिए एक मानकीकृत शेल्फ-लाइफ चार्ट जारी करना चाहिए, ताकि छोटे दुकानदारों को खाद्य सुरक्षा निरीक्षकों द्वारा उत्पीड़न (Inspector Raj) का सामना न करना पड़े।
सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति के जानकारों का मानना है कि नियम बनाना केवल आधा काम है। जब तक उपभोक्ता स्वयं इन तारीखों को देखने और एक्सपायर हो चुकी सामग्री की रिपोर्ट करने की आदत नहीं डालेंगे, तब तक दुकानदार पुरानी तारीखों के स्टिकर बदलकर नई तारीखें चिपकाने का खेल खेलते रहेंगे।
5. कानूनी और व्यवस्थागत पहलू: क्या हैं कमियां और चुनौतियां?
खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 (FSSA 2006) की धारा 52 और 58 के तहत गलत लेबलिंग, भ्रामक जानकारी देने या अवमानक खाद्य उत्पाद बेचने पर 3 लाख से 5 लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। गंभीर मामलों में, जहां बासी खाद्य पदार्थ खाने से किसी व्यक्ति की जान को खतरा पैदा हो, धारा 59 के तहत गैर-जमानती धाराओं में कारावास का भी प्रावधान है।
हालांकि, कानूनी ढांचे में अभी भी कई व्यावहारिक लूपहोल्स (कमियां) मौजूद हैं:
- ट्रे ट्रांसफर की समस्या: दुकानदार मुख्य ट्रे पर आज की तारीख का लेबल लगा सकते हैं, जबकि उसके नीचे 3 दिन पुरानी मिठाई रखी हो सकती है। इसे पकड़ने के लिए माइक्रोबायोलॉजिकल टेस्टिंग की जरूरत होती है, जो मौके पर संभव नहीं है।
- पैकिंग के बाद की ट्रैकिंग: जब मिठाई ट्रे से निकालकर डिब्बे में पैक की जाती है, तो कई बार डिब्बे पर कोई तारीख नहीं डाली जाती। यदि उपभोक्ता घर ले जाकर 2 दिन बाद बीमार पड़ता है, तो यह साबित करना बेहद मुश्किल होता है कि मिठाई कब खरीदी गई थी।
- कैटरिंग और थोक आपूर्ति: शादियों और बड़े आयोजनों में सप्लाई होने वाली थोक मिठाइयों पर कोई लेबलिंग नहीं होती। वहां आज भी नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जाती हैं।
- डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर का अभाव: छोटे शहरों और ग्रामीण कस्बों में फूड सेफ्टी पोर्टल और त्वरित शिकायत निवारण तंत्र अभी भी आम नागरिक की पहुंच से बाहर है।
6. द फ्रीलांस का टेक और पाठकों के लिए जरूरी सलाह
'द फ्रीलांस' का स्पष्ट मानना है कि खुली मिठाइयों पर 'यूज बाय डेट' अनिवार्य करना भारत के उपभोक्ता अधिकार आंदोलन में एक ऐतिहासिक और आवश्यक कदम है। लेकिन इसे मात्र एक औपचारिक नियम बनने से रोकना सरकार और समाज दोनों की साझी जिम्मेदारी है। जब तक प्रशासन औचक निरीक्षण, पारदर्शी सैंपलिंग और भ्रष्ट अधिकारियों पर लगाम नहीं लगाएगा, तब तक यह आदेश भी मात्र कागजी शेर बना रहेगा।
एक जागरूक नागरिक और उपभोक्ता के रूप में आपको मिठाई खरीदते समय इन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए:
- लेबल जरूर देखें: दुकान में प्रवेश करते ही मिठाई की ट्रे पर लगे 'Date of Manufacture' और 'Best Before Date' को ध्यान से पढ़ें। यदि किसी ट्रे पर लेबल गायब है, तो दुकानदार से सवाल पूछें।
- पक्के बिल की मांग करें: कभी भी बिना बिल के मिठाई न खरीदें। बिल पर मिठाई का नाम, मात्रा और खरीद की तारीख स्पष्ट रूप से दर्ज होनी चाहिए। यही आपकी कानूनी ढाल है।
- गंध और बनावट की जांच: मावा और पनीर की मिठाइयों को सूंघकर देखें। यदि उसमें हल्की सी भी खटास या असामान्य चिपचिपापन लगे, तो उसे तुरंत अस्वीकार कर दें।
- शिकायत दर्ज कराएं: यदि आपको बासी या खराब मिठाई बेची गई है, तो FSSAI के कंज्यूमर ऐप (Food Safety Connect) या राज्य उपभोक्ता हेल्पलाइन (National Consumer Helpline 1915) पर तुरंत शिकायत दर्ज कराएं। आपकी एक सतर्क आवाज पूरे तंत्र को जवाबदेह बना सकती है।










