भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया है, जिस पर पिछले कुछ समय से लगातार सवाल खड़े किए जा रहे हैं। इसी माहौल के बीच अब देश के न्यायपालिका और प्रशासनिक महकमे से जुड़े प्रतिष्ठित चेहरों ने मोर्चा संभाल लिया है। विभिन्न उच्च न्यायालयों के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीशों, न्यायाधीशों और वरिष्ठ नौकरशाहों समेत कुल 42 प्रबुद्ध नागरिकों ने एक साझा खुला पत्र जारी किया है। इस पत्र में स्पष्ट शब्दों में कहा गया है कि राजनीतिक स्वार्थ के लिए संवैधानिक संस्थाओं को कटघरे में खड़ा करना देश के संघीय ढांचे को कमजोर करने जैसा है।
यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय पर सामने आया है जब देश के कई हिस्सों में विपक्षी दलों और कुछ संगठनों द्वारा चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, मतदाता सूचियों और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों यानी ईवीएम की विश्वसनीयता को लेकर तीखे सवाल दागे जा रहे हैं। इन तमाम दावों के बीच पूर्व जजों का यह पत्र एक बड़ा वैचारिक मोड़ लेकर आया है, जिसमें कहा गया है कि हवा में तीर चलाने और बिना तथ्यों के आरोप लगाने से जनता के बीच भ्रम फैलता है।
संविधान की गरिमा और संस्थाओं की स्वतंत्रता पर प्रहार
खुले खत में हस्ताक्षर करने वाले पूर्व जजों और वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि चुनाव आयोग जैसी स्वतंत्र संवैधानिक संस्थाओं ने दशकों से वैश्विक स्तर पर अपनी निष्पक्षता का लोहा मनवाया है। हर चुनाव के बाद नतीजों से असंतुष्ट पक्षों द्वारा संस्था पर कीचड़ उछालना एक खतरनाक परंपरा बनता जा रहा है। पत्र में इस बात पर जोर दिया गया है कि आलोचना का स्वागत होना चाहिए, लेकिन वह आलोचना तार्किक और तथ्यों पर आधारित होनी चाहिए, न कि केवल राजनीतिक एजेंडे से प्रेरित।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के बेबुनियाद आरोप न केवल चुनाव आयोग के लाखों कर्मचारियों और अधिकारियों का मनोबल गिराते हैं, बल्कि देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में आम नागरिक के अटूट विश्वास को भी डगमगाते हैं। खत के जरिए यह चेतावनी भी दी गई है कि यदि इस प्रवृत्ति पर लगाम नहीं लगाई गई, तो यह देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं को खोखला कर सकती है।
वोट चोरी के दावों पर मांगे गए अकाट्य प्रमाण
विपक्षी दलों और आलोचकों द्वारा लगातार 'वोट चोरी' और मतदाता सूची में गड़बड़ी के गंभीर दावे किए जा रहे हैं। इस पर कड़ा ऐतराज जताते हुए पूर्व न्यायविदों ने दो टूक कहा है कि यदि वास्तव में किसी स्तर पर कोई अनियमितता हुई है, तो उसके पुख्ता सबूत जनता और अदालत के सामने रखे जाने चाहिए। केवल मौखिक बयानों या सनसनीखेज भाषणों के आधार पर देश की पूरी चुनावी व्यवस्था को संदेहास्पद नहीं बनाया जा सकता।
"संवैधानिक संस्थाओं पर बिना किसी साक्ष्य के सवालिया निशान लगाना न केवल गैर-जिम्मेदाराना है, बल्कि यह हमारे लोकतंत्र की नींव को हिलाने का सुनियोजित प्रयास भी हो सकता है। यदि आपके पास धांधली के सबूत हैं, तो उन्हें कानूनी मंचों पर रखिए।" — सेवानिवृत्त न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्ट (प्रतिनिधि वक्तव्य)
पत्र में यह भी याद दिलाया गया है कि चुनाव आयोग समय-समय पर सभी राजनीतिक दलों के साथ बैठकें करता है और उनकी शंकाओं का समाधान करने के लिए ईवीएम से लेकर वीवीपैट तक के प्रदर्शन आयोजित करता रहा है। ऐसे में संवाद के रास्ते बंद करके केवल सार्वजनिक मंचों से आरोप लगाना लोकतांत्रिक मर्यादाओं के विपरीत है।
कानूनी और वैधानिक मंचों का उपयोग करने की सलाह
पत्र में इस बात पर विशेष बल दिया गया है कि भारतीय न्यायपालिका और चुनाव आयोग के पास चुनावी विवादों के समाधान के लिए पुख्ता कानूनी और वैधानिक तंत्र मौजूद हैं। यदि किसी उम्मीदवार या दल को चुनाव परिणामों या प्रक्रिया में कोई गड़बड़ी दिखती है, तो वे चुनाव याचिकाएं दायर कर सकते हैं और अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं। सड़कों पर भ्रम फैलाने के बजाय कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करना ही सच्ची लोकतांत्रिक परिपक्वता है।
देश के इन प्रबुद्ध नागरिकों की इस अपील ने एक बार फिर देश में इस बात पर बहस छेड़ दी है कि क्या राजनीतिक विरोध के नाम पर संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा को दांव पर लगाना उचित है। आने वाले दिनों में इस पत्र के राजनीतिक और सामाजिक निहितार्थ दूरगामी साबित हो सकते हैं, क्योंकि इसने चुनाव सुधारों और संस्थागत शुचिता को लेकर एक नई लकीर खींच दी है।





