सपनों की खातिर तीन दशकों का लंबा इंतजार
जिंदगी की भागदौड़ में कई बार इंसान छोटी-छोटी परेशानियों से घबराकर अपने लक्ष्य को बीच रास्ते में ही छोड़ देता है। लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं जो मुश्किलों को सीढ़ी बनाकर अपनी मंजिल तक पहुंच ही जाते हैं। उत्तर प्रदेश से सामने आई एक ऐसी ही कहानी इन दिनों चर्चा का केंद्र बनी हुई है, जहां एक व्यक्ति ने अपनी अटूट मेहनत और कभी न हार मानने वाले जज्बे के बल पर यह साबित कर दिया कि उम्र महज एक आंकड़ा भर है। जब इरादे मजबूत हों, तो वक्त चाहे कितना भी लंबा क्यों न लग जाए, सफलता एक न एक दिन कदम जरूर चूमती है।
यह कहानी है एक ऐसे व्यक्ति की जिन्होंने अपने जीवन के लगभग तीन दशक सिर्फ एक ही लक्ष्य को समर्पित कर दिए। साल 1999 में उन्होंने एक सरकारी शिक्षक बनने का जो सपना अपनी खुली आंखों से देखा था, उसे पूरा करने के लिए उन्हें करीब 27 सालों तक संघर्ष की भट्टी में तपना पड़ा। इस लंबे सफर के दौरान रास्ते में कई कांटे आए, निराशा के गहरे बादल छाए, और अपनों की उम्मीदें भी कई बार डगमगाईं, लेकिन इस शख्स के कदम पीछे नहीं हटे।
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असमर्थता और असफलताएं नहीं डिगा पाईं हौसला
सरकारी नौकरी की राह कभी भी आसान नहीं होती, और जब मुकाबला लाखों योग्य उम्मीदवारों के बीच हो तो चुनौती और भी बड़ी हो जाती है। हमारे नायक के लिए भी यह सफर फूलों की सेज नहीं था। इन 27 लंबे वर्षों के दौरान उन्होंने अनगिनत बाधाओं का सामना किया। इस बीच उन्होंने छह बार टीजीटी यानी ट्रेंड ग्रेजुएट टीचर की लिखित परीक्षा में सफलता हासिल की और चार बार पीजीटी परीक्षा को भी पास किया। इसके अलावा वे लगभग आठ बार साक्षात्कार यानी इंटरव्यू के चरण तक भी पहुंचे, लेकिन हर बार अंतिम चयन सूची में उनका नाम आने से चूक जाता था।
बार-बार मिलने वाली यह नाकामी किसी भी आम इंसान काौसला तोड़ने के लिए काफी होती है। कई लोग ऐसी स्थिति में आकर अपनी किस्मत को दोष देना शुरू कर देते हैं और मैदान छोड़कर पीछे हट जाते हैं। लेकिन इस शिक्षक ने हर असफलता को अपनी कमजोरी मानने के बजाय उसे अपनी तैयारी को और अधिक धार देने का एक जरिया बनाया। हर बार जब वे अंतिम सूची से बाहर होते, तो वे और अधिक ऊर्जा के साथ अपनी किताबों की दुनिया में लौट जाते और अपनी कमियों को दूर करने में जुट जाते थे।
प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाया और खुद भी करते रहे पढ़ाई
घर की जिम्मेदारियों को निभाते हुए सरकारी नौकरी की तैयारी करना अपने आप में एक बहुत बड़ा टास्क होता है। परिवार का पेट पालने के लिए इस व्यक्ति ने लगभग 26 साल तक अलग-अलग प्राइवेट स्कूलों में अध्यापन कार्य किया। दिनभर वे कक्षाओं में बच्चों को हिंदी और संस्कृत के पाठ पढ़ाते थे, और स्कूल का समय समाप्त होने के बाद अपनी खुद की प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुट जाते थे। विवेकानंद विद्यापीठ और दून पब्लिक स्कूल जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में उन्होंने अपनी सेवाएं दीं।
उनके सहकर्मियों और संस्थान से जुड़े लोगों का कहना है कि उनकी लगन देखने लायक थी। स्कूल के लंबे घंटों के बाद भी उनके चेहरे पर थकान नहीं बल्कि कुछ नया सीखने और अपनी मंजिल तक पहुंचने की एक अजीब सी चमक दिखाई देती थी। उनका यह सफर इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है कि अगर इंसान के पास वक्त की कमी हो या आर्थिक तंगी हो, तब भी यदि उसका ध्यान अपने लक्ष्य पर केंद्रित है, तो वह किसी भी विपरीत परिस्थिति को मात दे सकता है.
जब आखिरकार खुला सफलता का दरवाजा
हर रात के बाद एक सवेरा जरूर आता है, और इस शख्स के जीवन में भी वह ऐतिहासिक दिन आ ही गया जिसका वे पिछले 27 सालों से इंतजार कर रहे थे। इस बार की भर्ती प्रक्रिया में एक बड़ा बदलाव यह था कि चयन प्रक्रिया से साक्षात्कार को हटा दिया गया था। लिखित परीक्षा के आधार पर ही योग्य उम्मीदवारों का चयन किया जाना था। इस बदलाव ने आखिरकार उस बाधा को दूर कर दिया जो इतने सालों से उनके रास्ते में दीवार बनकर खड़ी थी।
पड़ोसी शामली जिले के एक एडेड सेकेंडरी स्कूल में उन्हें संस्कृत विषय के शिक्षक के रूप में चुन लिया गया। जब यह परिणाम सामने आया तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। इस चयन के साथ ही उनका दशकों पुराना इंतजार आखिरकार खत्म हो गया। राजधानी लखनऊ में आयोजित एक भव्य कार्यक्रम के दौरान उन्हें आधिकारिक रूप से नियुक्ति पत्र सौंपा गया, जो उनके वर्षों के संघर्ष और तपस्या का सबसे बड़ा पुरस्कार साबित हुआ।
शिक्षण कार्य था परिवार की पुरानी विरासत
शिक्षा और अध्यापन इस परिवार के खून में शामिल रहा है। उनके पिता स्वर्गीय लक्ष्मण सिंह भी एक शिक्षक थे, जिन्होंने अपने जीवनकाल में अनगिनत बच्चों का भविष्य संवारा था। पिता से मिली संस्कारों और शिक्षा की प्रेरणा को ही इस व्यक्ति ने अपनी ताकत बनाया। उन्होंने अपने जीवन के आदर्शों से कभी समझौता नहीं किया।
खास बात यह है कि केवल खुद ही नहीं, बल्कि उन्होंने अपनी पूरी पीढ़ी को शिक्षा के महत्व से परिचित कराया। उनके दोनों बेटे आज उत्तर प्रदेश पुलिस विभाग में अपनी सेवाएं देकर देश और समाज की रक्षा कर रहे हैं। वहीं उनकी तीन बेटियों में से एक का चयन भी शिक्षक के पद के लिए हो चुका है और वह वर्तमान में प्रतीक्षा सूची में शामिल है। पूरा परिवार इस बात से गौरवान्वित है कि उनके घर के मुखिया ने उम्र के इस पड़ाव पर आकर अपनी जिद को पूरा कर दिखाया।
उम्र सिर्फ एक संख्या है, जिद हो तो सब मुमकिन है
आज के समय में जब युवा छोटी-छोटी असफलताओं से निराश होकर अपने कदम पीछे खींच लेते हैं या मानसिक तनाव का शिकार हो जाते हैं, तब इस 59 वर्षीय शिक्षक की कहानी एक प्रेरणास्त्रोत की तरह सामने आती है। उनका मानना है कि यदि आपके भीतर सीखने की ललक है और अपने लक्ष्य के प्रति सच्ची ईमानदारी है, तो उम्र कभी भी आपके सपनों के आड़े नहीं आ सकती।
"असफलताएं आपको रोकने के लिए नहीं आतीं, बल्कि वे आपको यह सिखाने आती हैं कि आपकी तैयारी में अभी कौन सी कमी बाकी है। जब तक आप खुद पर भरोसा रखते हैं और कोशिश करना नहीं छोड़ते, तब तक कोई भी मंजिल आपसे दूर नहीं रह सकती।" — विजय कुमार शर्मा, सरकारी शिक्षक
जिंदगी के इस पड़ाव पर जब लोग रिटायरमेंट की उम्र के करीब होते हैं, तब विजय कुमार शर्मा एक नए सफर की शुरुआत करने जा रहे हैं। उनका यह प्रेरणादायक सफर आने वाली कई पीढ़ियों को यह सिखाता रहेगा कि सपने देखना कभी बंद नहीं करना चाहिए और उनके पीछे भागने की कोई उम्र सीमा तय नहीं होती।




