आदि धर्म समाज का बड़ा जागरूकता अभियान
देश के सामाजिक और शैक्षणिक परिदृश्य में बदलाव की बयार बह रही है। इसी कड़ी में उत्तर प्रदेश के एक प्रमुख शहर में वाल्मीकि-अंबेडकर आंदोलन समाज के बैनर तले आदि धर्म समाज का एक महत्वपूर्ण जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य सदियों से चले आ रहे सामाजिक बंधनों को तोड़कर नई पीढ़ी को शिक्षा के उजाले की ओर ले जाना था। कार्यक्रम में शिरकत करने पहुंचे देश के विभिन्न हिस्सों के प्रबुद्ध जनों ने एक स्वर में इस बात पर जोर दिया कि अब समय आ गया है जब समाज के युवाओं को रूढ़िवादी पेशों से बाहर निकलकर आधुनिक शिक्षा और स्वरोजगार के नए रास्ते अपनाने होंगे।
रविवार दोपहर को आयोजित इस सम्मेलन की शुरुआत बेहद प्रेरणादायक माहौल में हुई। कार्यक्रम स्थल पर आदि सृष्टिकर्ता भगवान वाल्मीकि दयावान और संविधान निर्माता बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर की प्रतिमाओं के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित कर नमन किया गया। इस दौरान समाज के कोने-कोने से पहुंचे लोगों में गजब का उत्साह देखने को मिला। वक्ताओं ने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि जब तक समाज का हर बच्चा उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं करेगा, तब तक देश की मुख्यधारा में बराबरी का अधिकार पाना संभव नहीं होगा।
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शिक्षा के लिए त्याग और समर्पण का संदेश
कार्यक्रम में पंजाब के लुधियाना से विशेष तौर पर पहुंचे आदि धर्म समाज के राष्ट्रीय प्रचारक आनंद राक्षस ने समाज के अभिभावकों को झकझोर देने वाली बातें कहीं। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि बच्चों के भविष्य निर्माण के लिए यदि आर्थिक तंगी आड़े आती है, तो माता-पिता को कड़े फैसले लेने होंगे। उन्होंने आह्वान किया कि अभिभावक भले ही एक वक्त की रोटी कम खा लें, लेकिन अपने नौनिहालों की पढ़ाई के खर्च में किसी भी प्रकार की कंजूसी न बरतें। शिक्षा ही वह एकमात्र चाबी है जो हर बंद दरवाजे को खोल सकती है।
राष्ट्रीय प्रचारक ने याद दिलाया कि बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने हमेशा 'पढ़ो, इसी संघर्ष करो और संगठित रहो' का मूल मंत्र दिया था। इसी वैचारिक पृष्ठभूमि को आधार बनाते हुए आदि धर्म समाज पिछले करीब ढाई दशकों से देश भर में शिक्षा का अलख जगा रहा है। इसके सकारात्मक परिणाम अब धरातल पर दिखने भी लगे हैं। समाज के कई परिवारों के युवा आज पारंपरिक कार्यों को छोड़कर इंजीनियरिंग, चिकित्सा, कानून और प्रशासनिक सेवाओं जैसी उच्च कोटि की शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं और अपने परिवार के साथ-साथ पूरे समाज का नाम रोशन कर रहे हैं।
पारंपरिक सफाई कार्य छोड़कर अपनाए नए व्यवसाय
इस सम्मेलन का सबसे खास आकर्षण उन लोगों और मेधावी बच्चों का सम्मान समारोह रहा, जिन्होंने पीढ़ियों से चले आ रहे पारंपरिक सफाई कार्य को छोड़कर स्वतंत्र रूप से अपने नए व्यवसाय स्थापित किए हैं। कार्यक्रम के दौरान कारपेंटरी, फोटोग्राफी, तकनीकी कार्य और व्यापार जैसे विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय सफलता हासिल करने वाले प्रतिभावान लोगों को मंच पर सम्मानित किया गया और उन्हें प्रमाण पत्र दिए गए।
सम्मानित होने वाले व्यक्तियों ने इस मंच से यह संकल्प भी लिया कि वे अब कभी भी पीछे मुड़कर पारंपरिक सफाई के काम में नहीं लौटेंगे। उन्होंने अपने बच्चों को भी उच्च शिक्षा दिलाने और उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करने का पक्का इरादा जताया। उपस्थित वक्ताओं ने कहा कि ऐसे लोग पूरे समाज के लिए रोल मॉडल बन चुके हैं जो अपनी मेहनत और आत्मसम्मान के बल पर समाज की दिशा और दशा दोनों बदलने का माद्दा रखते हैं।
स्वरोजगार और आधुनिक युग की जरूरतें
कार्यक्रम के दौरान इस बात पर भी विशेष चर्चा हुई कि केवल पारंपरिक सरकारी नौकरियों के भरोसे बैठने के बजाय युवाओं को स्वरोजगार की तरफ भी कदम बढ़ाना चाहिए। आज का दौर तकनीकी और डिजिटल युग का है, जहां कौशल विकास यानी स्किल डेवलपमेंट के जरिए अनगिनत अवसर पैदा हो रहे हैं। समाज के युवाओं को इन अवसरों का पूरा लाभ उठाना चाहिए ताकि वे आर्थिक रूप से पूरी तरह मजबूत बन सकें।
"समाज के बच्चों को हर हाल में स्कूल भेजना चाहिए। अभिभावक अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने के लिए जरूरत पड़े तो एक रोटी कम खाएं, लेकिन उनकी पढ़ाई से कभी समझौता न करें क्योंकि शिक्षा ही भविष्य की सबसे बड़ी पूंजी है।" — आनंद राक्षस, राष्ट्रीय प्रचारक, आदि धर्म समाज
विशेषज्ञों और वक्ताओं का मानना है कि जब तक समाज का प्रत्येक बच्चा देश के बेहतरीन स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों तक नहीं पहुंचेगा, तब तक समग्र विकास का सपना अधूरा ही रहेगा। इस तरह के जागरूकता अभियान समाज की नींव को मजबूत करने का काम करते हैं।
बदलाव की बयार और आगे की राह
सहारनपुर में हुए इस प्रेरणादायक आयोजन ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि जागरूकता और दृढ़ इच्छाशक्ति से किसी भी रूढ़िवादी परंपरा को बदला जा सकता है। आदि धर्म समाज का यह कारवां अब रुकने वाला नहीं है। आने वाले दिनों में इस तरह के अभियानों को ग्रामीण अंचलों तक पहुंचाने की योजना है, ताकि दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले वाल्मीकि समाज के लोग भी शिक्षा के महत्व को समझ सकें और अपने बच्चों के सुनहरे भविष्य की इबारत लिख सकें।








