ब्रिटेन के लेबर मार्केट में एआई का बढ़ता दखल और चिंताजनक आंकड़े
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई अब केवल तकनीकी चर्चाओं तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि यह युवाओं के करियर और रोजगार के अवसरों पर सीधा असर डालने लगा है। ब्रिटेन से सामने आए हालिया आंकड़े इस बात की गवाही दे रहे हैं कि कैसे तकनीक की दुनिया में हो रहे बदलाव नए स्नातकों के लिए मुश्किलें पैदा कर रहे हैं। हाल ही में प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार, देश में कंप्यूटर साइंस की डिग्री लेकर निकलने वाले युवाओं के लिए सॉफ्टवेयर विकास और प्रोग्रामिंग के रास्ते में बड़ी रुकावटें खड़ी हो गई हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीकी क्षेत्र में नौकरियों की प्रकृति तेजी से बदल रही है। जिन कौशल और योग्यताओं की बाजार में कुछ साल पहले तक भारी मांग हुआ करती थी, उन्हें अब एआई आधारित टूल्स बहुत कम समय और लागत में पूरा कर रहे हैं। यही वजह है कि यूनिवर्सिटी से निकलने वाले नए छात्र खुद को बदलते हुए माहौल में थोड़ा पीछे पा रहे हैं, क्योंकि उनकी जगह कई जगह सॉफ्टवेयर और ऑटोमेटेड सिस्टम लेते जा रहे हैं।
यह स्थिति केवल कंप्यूटर विज्ञान तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर अन्य पेशेवर क्षेत्रों पर भी पड़ रहा है। विश्लेषकों का कहना है कि आने वाले समय में रोजगार बाजार की यह तस्वीर पूरी तरह बदल सकती है, जिससे पारंपरिक शिक्षा प्रणाली और छात्रों दोनों के सामने नई चुनौतियां खड़ी होंगी।
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सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट और प्रोग्रामिंग नौकरियों में आई बड़ी गिरावट
हाल ही में 'द गार्जियन' में प्रकाशित यूनिवर्सिटी गाइड के आंकड़ों ने ब्रिटेन के तकनीकी गलियारों में हलचल मचा दी है। इन आंकड़ों के मुताबिक, पिछले एक साल में प्रोग्रामिंग और सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट के क्षेत्र में रोजगार पाने वाले कंप्यूटर साइंस स्नातकों के प्रतिशत में रिकॉर्ड गिरावट दर्ज की गई है। जानकारों का कहना है कि यह पहली बार है जब इतनी तेजी से तकनीकी स्नातकों की प्लेसमेंट दर नीचे आई है।
डेटा संकलन से जुड़ी कंसल्टिंग फर्म 'इंटेलिजेंट मेट्रिक्स' के निदेशक मैट हीली-रेनर ने इस स्थिति पर विस्तार से रोशनी डाली है। उनके अनुसार, पेशेवर सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट या प्रोग्रामिंग की नौकरियां हासिल करने वाले कंप्यूटर साइंस स्नातकों का आंकड़ा पहले करीब 40 फीसदी हुआ करता था, जो अब लुढ़ककर मात्र 28 फीसदी पर पहुंच गया है।
केवल तकनीकी पद ही नहीं, बल्कि कॉलेज की डिग्री की अनिवार्यता वाली किसी भी नौकरी को पाने वाले कंप्यूटर साइंस स्नातकों का कुल प्रतिशत भी घटा है। दो साल पहले यह आंकड़ा 60 फीसदी से अधिक था, जो अब घटकर लगभग 50 फीसदी के आसपास सिमट गया है। यह गिरावट साफ इशारा करती है कि एंट्री-लेवल नौकरियों पर एआई का सबसे ज्यादा असर पड़ा है।
क्यों हो रहा है ऐसा? जानिए क्या कहते हैं विशेषज्ञ और आंकड़े
इस पूरी उथल-पुथल के पीछे मुख्य वजह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की क्षमताओं का तेजी से विस्तार माना जा रहा है। आज के समय में एआई कोड लिखने, सॉफ्टवेयर के बुनियादी ढांचे को तैयार करने और डेटा प्रोसेसिंग जैसे जटिल कार्यों को इंसानों के मुकाबले बेहद कम समय में अंजाम दे रहा है। कंपनियों के लिए यह प्रक्रिया सस्ती और तेज साबित हो रही है, जिसके चलते वे फ्रेशर्स की बजाय एआई टूल्स का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करने लगी हैं।
हायर एजुकेशन स्टैटिस्टिक्स यूके (HESA) द्वारा कराए गए 'ग्रेजुएट आउटकम्स सर्वे' में 2024 के दौरान अपनी पढ़ाई पूरी करने वाले 350,000 से अधिक पूर्व छात्रों के अनुभवों को शामिल किया गया था। इस व्यापक सर्वेक्षण से यह बात सामने आई कि विश्वविद्यालय छोड़ने के बाद शुरुआती 15 महीनों में छात्रों को किस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा है।
"एआई इस क्षेत्र में मूलभूत प्रसंस्करण कार्यों को तेज प्रतिक्रिया समय और कम लागत के साथ प्रदान कर रहा है, इसलिए यह मानना मुश्किल नहीं है कि यह इस प्रवृत्ति के पीछे के कारणों में से एक है। स्नातकों को अब अपनी स्किल को अपग्रेड करने की सख्त जरूरत है।" — मैट हीली-रेनर, निदेशक, इंटेलिजेंट मेट्रिक्स
अर्थशास्त्र और वित्त क्षेत्र के स्नातकों पर भी पड़ रहा है असर
दिलचस्प बात यह है कि केवल तकनीकी शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्र ही नहीं, बल्कि वित्तीय और प्रबंधन सलाहकार जैसे उच्च वेतन वाले क्षेत्रों से जुड़े युवा भी इस बदलाव की चपेट में आ रहे हैं। अर्थशास्त्र और मैनेजमेंट के स्नातकों के लिए भी अच्छे वेतन वाली नौकरियों की मांग में नरमी देखी गई है। इसका मुख्य कारण वित्तीय विश्लेषण और रिपोर्ट तैयार करने जैसे कार्यों में एआई का उपयोग बढ़ना है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जो छात्र इन क्षेत्रों में अपने करियर की शुरुआत करने जा रहे हैं, वे एआई के अनुप्रयोगों से सबसे पहले और सीधे तौर पर प्रभावित होने वाले समूह हैं। जिन विश्लेषणात्मक कार्यों को करने में इंसानों को कई दिन लगते थे, उन्हें अब एल्गोरिदम मिनटों में हल कर देते हैं।
यही वजह है कि कॉर्पोरेट जगत अब ऐसे युवाओं की तलाश कर रहा है जो केवल पारंपरिक पढ़ाई तक सीमित न हों, बल्कि जिन्हें एआई टूल्स का उपयोग करना आता हो और जो तकनीक के साथ कदमताल कर सकें।
भविष्य के रोजगार बाजार के लिए युवाओं को खुद को बदलना होगा
बदलते हुए वैश्विक परिदृश्य को देखते हुए यह साफ हो चुका है कि केवल डिग्री हासिल कर लेना अब नौकरी की गारंटी नहीं बचा है। शिक्षाविदों और उद्योगपतियों का मानना है कि यूनिवर्सिटी के पाठ्यक्रम में बदलाव करने का समय आ गया है। छात्रों को केवल कोडिंग या थ्योरी पढ़ाने के बजाय उन्हें एआई के साथ काम करने की कला सिखानी होगी।
भविष्य का लेबर मार्केट उन लोगों के पक्ष में होगा जो तकनीक का विरोध करने की बजाय उसे अपनाएंगे और अपनी उत्पादकता बढ़ाएंगे। ब्रिटेन के इन ताजा आंकड़ों ने पूरी दुनिया के शैक्षणिक संस्थानों और छात्रों के लिए एक बड़ी चेतावनी जारी कर दी है कि यदि समय रहते खुद को नहीं बदला गया, तो रोजगार के पारंपरिक रास्ते धीरे-धीरे बंद हो सकते हैं।








