उत्तर प्रदेश की राजनीति में राज्यसभा चुनाव से पहले बड़ा सियासी ड्रामा
उत्तर प्रदेश की राजनीति में राज्यसभा चुनाव की सुगबुगाहट के साथ ही जोड़-तोड़ की सियासत भी चरम पर पहुंच गई है। राज्य में होने वाले इन चुनावों ने सत्ता के गलियारों में हलचल पैदा कर दी है, और इस बार का मुकाबला बेहद दिलचस्प होता दिखाई दे रहा है। एनडीए गठबंधन में शामिल सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी यानी सुभासपा के भीतरखाने सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है, और पार्टी के अंदर संभावित बगावत के सुर तेज हो चुके हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह अंदरूनी कलह खुलकर सामने आती है, तो सत्तारूढ़ गठबंधन को बड़ा झटका लग सकता है।
हाल ही में लखनऊ के राजनीतिक हलकों में एक गुप्त मुलाकात ने अचानक से सारे समीकरणों को पलट कर रख दिया। सुभासपा के बागी तेवर और विधायकों के बदलते रुख ने राज्य के राजनीतिक मानचित्र पर नए कयासों को जन्म दे दिया है। खासकर समाजवादी पार्टी के खेमे में इस पूरी हलचल को लेकर रणनीतिक तैयारियां तेज हो गई हैं, क्योंकि पार्टी अपने तीसरे उम्मीदवार की नैया पार लगाने के लिए जरूरी विधायकों के समर्थन का गणित बैठाने में जुटी हुई है।
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अब्बास अंसारी की अखिलेश यादव से मुलाकात से गरमाया सियासी पारा
इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में मुख्तार अंसारी के बेटे और मऊ सदर सीट से सुभासपा विधायक अब्बास अंसारी की गतिविधियां हैं। कुछ दिन पहले लखनऊ स्थित जनेश्वर मिश्र ट्रस्ट के कार्यालय में अब्बास अंसारी और समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के बीच लंबी बैठक हुई। सूत्रों के मुताबिक, यह मुलाकात लगभग एक से डेढ़ घंटे तक चली, जिसके बाद से ही यूपी की सियासत में भूचाल आ गया है। हालांकि दोनों नेताओं की तरफ से इस मुलाकात के आधिकारिक एजेंडे पर खुलकर कुछ नहीं कहा गया, लेकिन राजनीतिक जानकारों का साफ मानना है कि इसकी पटकथा राज्यसभा चुनाव के आंकड़ों को ध्यान में रखकर लिखी गई है।
अब्बास अंसारी की इस अहम मुलाकात के बाद से ही सुभासपा के भीतर आंतरिक कलह खुलकर सतह पर आने लगी है। पार्टी के विधायकों का एक बड़ा धड़ा लगातार सपा के संपर्क में बताया जा रहा है। जानकारों का कहना है कि सुभासपा के कुल छह विधायकों में से अधिकांश का पुराना राजनीतिक झुकाव समाजवादी पार्टी की तरफ रहा है, क्योंकि उन्होंने पिछला चुनाव भले ही सुभासपा के चुनाव चिह्न पर लड़ा हो, लेकिन वैचारिक और सांगठनिक तौर पर वे सपा के पाले में सहज महसूस करते रहे हैं।
ओमप्रकाश राजभर का बड़ा बयान: विधायक मेरे नियंत्रण से बाहर
इस गर्माती राजनीति के बीच सुभासपा प्रमुख और उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री ओमप्रकाश राजभर के बयानों ने आग में घी डालने का काम किया है। राजभर ने मीडिया के सामने और यहां तक कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात के दौरान भी यह बात स्वीकार की है कि उनकी पार्टी के दो से तीन विधायक उनके नियंत्रण में नहीं हैं। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि ये विधायक राज्यसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के पक्ष में क्रॉस वोटिंग कर सकते हैं। राजभर ने तंज कसते हुए यह भी कहा कि भले ही इन्होंने उनके चुनाव चिह्न पर जीत हासिल की हो, लेकिन वे शुरू से ही सपा की कार्यशैली के मुरीद रहे हैं और मैदान में सपा का झंडा उठाते आए हैं।
"हमारी पार्टी के कुछ विधायक तकनीकी रूप से हमारे टिकट पर जीते जरूर हैं, लेकिन वे मूल रूप से समाजवादी पार्टी के पाले में हैं और उनका झुकाव उधर ही है। हम इन चीजों से डरने वाले नहीं हैं, जनता और वक्त खुद इसका फैसला करेगा।" — ओमप्रकाश राजभर, राष्ट्रीय अध्यक्ष, सुभासपा
पार्टी अध्यक्ष के इस तरह के बयानों से यह स्पष्ट हो गया है कि सुभासपा के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि ओमप्रकाश राजभर का यह बयान एक तरह से अपनी पार्टी के बागी विधायकों पर नियंत्रण न रख पाने की मजबूरी को छुपाने या फिर पहले से ही स्थिति को भांपकर अपनी राजनीतिक जमीन बचाने का एक सुनियोजित पैंतरा भी हो सकता है।
राज्यसभा चुनाव का अंकगणित और समाजवादी पार्टी की रणनीति
उत्तर प्रदेश में होने वाले राज्यसभा चुनाव के लिए संख्या बल का खेल बेहद पेचीदा होता जा रहा है। विधानसभा के मौजूदा आंकड़ों के हिसाब से भारतीय जनता पार्टी अपने कोटे की सीटें आसानी से जीत सकती है, वहीं समाजवादी पार्टी भी अपने दो उम्मीदवारों को आराम से सदन में भेज सकती है। लेकिन पेंच तब फंसा जब सपा ने अपने तीसरे उम्मीदवार को मैदान में उतारने की सुगबुगाहट शुरू कर दी। विधानसभा में एक सीट सुरक्षित करने के लिए करीब 37 प्रथम वरीयता के वोटों की आवश्यकता होती है।
यही वह जादुई आंकड़ा है जिसके लिए समाजवादी पार्टी एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है। पार्टी नेतृत्व यह अच्छी तरह जानता है कि बिना दूसरे दलों या एनडीए के असंतुष्ट विधायकों की सेंधमारी के तीसरे उम्मीदवार की जीत असंभव है। यही कारण है कि सुभासपा के बागी विधायकों और रालोद के कुछ नेताओं के साथ संपर्क साधने की कोशिशें तेज कर दी गई हैं। यदि विपक्षी खेमा इसमें कामयाब होता है, तो एनडीए के भीतर बड़ी राजनीतिक उठापटक देखने को मिल सकती है।
आने वाले दिनों में और तेज होगी उत्तर प्रदेश की राजनीतिक हलचल
राज्यसभा चुनाव के नामांकन और मतदान की तिथियों के नजदीक आते-आते उत्तर प्रदेश का सियासी पारा और अधिक चढ़ने की पूरी संभावना है। सत्ताधारी गठबंधन जहां अपने कुनबे को एकजुट रखने के लिए हरसंभव प्रयास कर रहा है, वहीं विपक्षी दल सेंधमारी के जरिए बड़ा सियासी संदेश देने की फिराक में हैं। सुभासपा के भीतर मची इस भगदड़ और विधायकों के पाला बदलने की चर्चाओं ने आने वाले दिनों के लिए रोमांचक राजनीतिक दृश्यों की नींव रख दी है। अब देखना यह होगा कि ओमप्रकाश राजभर अपने विधायकों को थामने में कामयाब होते हैं या फिर क्रॉस वोटिंग का यह खतरा एनडीए के लिए बड़ा सिरदर्द साबित होता है।




