पंजाब की धरती से उठा किसानों की एकता का मजबूत स्वर
देश के कृषि क्षेत्र पर मंडराते संकट और कॉरपोरेट दबाव के खिलाफ संघर्ष को तेज करने के लिए किसान संगठनों ने अब एक मंच पर आने का बड़ा फैसला किया है। पंजाब के जालंधर स्थित ऐतिहासिक 'देशभक्त यादगार' परिसर में अखिल भारतीय किसान महासभा (AIKM) का पांचवां राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया। इस महासम्मेलन में देश भर से आए किसानों, मजदूरों और विभिन्न जन संगठनों के प्रतिनिधियों ने शिरकत की। आयोजन स्थल पर उमड़ी भारी भीड़ इस बात का गवाह थी कि किसानी के अस्तित्व को बचाने के लिए देश का अन्नदाता अब गोलबंद हो रहा है।
सम्मेलन के दौरान मुख्य रूप से इस बात पर जोर दिया गया कि बिखरी हुई ताकत के सहारे सत्ता और बड़े औद्योगिक घरानों की नीतियों का मुकाबला नहीं किया जा सकता। वक्ताओं ने दो टूक शब्दों में कहा कि जब तक देश के तमाम किसान संगठन आपसी मतभेद भुलाकर एक साझा मंच तैयार नहीं करेंगे, तब तक खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को कॉरपोरेट लूट से बचा पाना असंभव है। इस आयोजन ने आगामी दिनों में एक बड़े देशव्यापी आंदोलन की रूपरेखा तैयार कर दी है।
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प्रमुख संगठनों का ऐतिहासिक विलय और नई राजनीतिक दिशा
इस सम्मेलन का सबसे बड़ा आकर्षण पंजाब और हरियाणा के प्रभावशाली किसान संगठनों का अखिल भारतीय किसान महासभा में आधिकारिक रूप से शामिल होना रहा। भाकपा (माले) लिबरेशन के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने इस विलय को ऐतिहासिक करार देते हुए कहा कि यह कदम देश में फासीवादी ताकतों और कॉरपोरेट समर्थक नीतियों के खिलाफ चल रहे संघर्ष को एक निर्णायक मोड़ देगा। उन्होंने शाहीन बाग से लेकर तीन कृषि कानूनों के खिलाफ हुए ऐतिहासिक दिल्ली आंदोलन और हालिया युवा आंदोलनों का जिक्र करते हुए कहा कि जन संघर्षों की यह कड़ी देश के लोकतंत्र को मजबूत कर रही है।
सम्मेलन के दौरान विभिन्न वामपंथी और लोकतांत्रिक संगठनों के शीर्ष नेताओं ने भी शिरकत की। आरएमपीआइ के महासचिव मंगतराम पासला ने पंजाब की मौजूदा राजनीतिक स्थिति पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि बदलाव के नाम पर सत्ता में आई सरकारें भी आम जनता की उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी हैं। उन्होंने आह्वान किया कि किसानों, मजदूरों और बेरोजगार युवाओं के सच्चे हितों की रक्षा के लिए अब जमीनी स्तर पर एक मजबूत राजनीतिक और सामाजिक विकल्प तैयार करने की सख्त जरूरत है।
"देश के किसानों, मजदूरों और युवाओं की मौजूदा पीढ़ी के सबसे बड़े प्राथमिकताओं में से एक देश को फासीवादी नीतियों से मुक्त कराना है। जब तक जनविरोधी ताकतों के खिलाफ सामूहिक प्रतिरोध खड़ा नहीं किया जाएगा, तब तक हमारी जमीन और आजादी सुरक्षित नहीं रह सकती।" — दीपांकर भट्टाचार्य, महासचिव, भाकपा (माले) लिबरेशन
अंतरराष्ट्रीय नीतियों और कॉरपोरेट हमलों के खिलाफ चेतावनी
महासचिव और लोकसभा सांसद राजा राम सिंह ने वैश्विक परिप्रेक्ष्य पर बात करते हुए अंतरराष्ट्रीय मंचों और साम्राज्यवादी ताकतों की नीतियों पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि दुनिया भर के प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा जमाने की साजिशें रची जा रही हैं, और देश की नीतियां भी विदेशी दबाव के आगे झुकती नजर आ रही हैं। किसानों ने साफ कर दिया है कि वे किसी भी ऐसे समझौते को स्वीकार नहीं करेंगे जो घरेलू कृषि बाजार को विदेशी कंपनियों के हवाले कर दे।
सभा में मौजूद अन्य वक्ताओं ने भी इस बात पर सहमति जताई कि मौजूदा दौर में कृषि संकट केवल एक आर्थिक समस्या नहीं है, बल्कि यह देश की खाद्य सुरक्षा और संप्रभुता पर सीधा हमला है। सम्मेलन के मंच को गदर आंदोलन के शहीदों और देश के मुक्ति संग्राम के सेनानियों को समर्पित किया गया था, जो इस बात का प्रतीक था कि आज का किसान आंदोलन अपनी ऐतिहासिक विरासत से प्रेरणा लेकर आगे बढ़ रहा है।
भविष्य की रणनीति और देशव्यापी आंदोलन का शंखनाद
यह पांचवां राष्ट्रीय सम्मेलन केवल एक सभा तक सीमित नहीं था, बल्कि इसने आने वाले महीनों के लिए एक स्पष्ट कार्ययोजना भी तैयार की है। सम्मेलन में यह निर्णय लिया गया कि देश के हर कोने तक किसानों को जागरूक किया जाएगा और शिक्षा, रोजगार तथा बुनियादी अधिकारों के मुद्दों को जोड़कर एक व्यापक जन आंदोलन खड़ा किया जाएगा। युवाओं की बढ़ती भागीदारी और मजदूर संगठनों के साथ समन्वय ने इस आंदोलन को एक नई सामाजिक गहराई दी है।
समारोह के अंत में तमाम प्रतिनिधियों ने संकल्प लिया कि वे अपनी जमीनों, फसलों और देश के लोकतांत्रिक ढांचे की रक्षा के लिए किसी भी समझौते के बिना संघर्ष जारी रखेंगे। जालंधर से उठी यह आवाज अब देश के अन्य राज्यों के किसान संगठनों तक भी पहुंच रही है, जिससे यह उम्मीद बंधती है कि आने वाले समय में किसानों का यह संयुक्त मोर्चा केंद्र सरकार और कॉरपोरेट घरानों की नीतियों के खिलाफ एक बड़ी चुनौती बनकर उभरेगा।








