नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश की राजधानी दिल्ली में इन दिनों राजनीतिक हलचल काफी तेज है। एक तरफ संसद से लेकर सड़क तक विपक्षी दल सरकार को घेरने की कोशिश कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ विपक्ष के अपने ही भीतर तालमेल की कमी खुलकर सामने आ रही है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी के नेतृत्व में हाल ही में एक बड़ा मार्च निकाला गया। इस प्रदर्शन का मुख्य उद्देश्य सरकार की नीतियों के खिलाफ आवाज उठाना था। लेकिन इस बड़े आयोजन से उत्तर प्रदेश की प्रमुख विपक्षी पार्टी समाजवादी पार्टी यानी सपा पूरी तरह नदारद नजर आई।
स्थिति तब और स्पष्ट हो गई जब प्रदर्शन के दूसरे दिन भी सपा का कोई अधिकृत सांसद या बड़ा नेता इस मार्च में शामिल होने नहीं पहुंचा। राजनीतिक जानकारों के अनुसार, दोनों दलों के बीच यह दूरी महज इत्तेफाक नहीं है। कुछ दिन पहले ही अखिलेश यादव ने एक बयान में कहा था कि भाजपा ने पूरी तरह अपना विश्वास और जनाधार खो दिया है। इसके बावजूद उनका अपनी पार्टी के सांसदों को राहुल गांधी के इस खास प्रदर्शन में न भेजना कई तरह के बड़े सवाल खड़े कर रहा है।
सपा और कांग्रेस के बीच बढ़ती दूरी के सियासी मायने
विपक्षी गठबंधन 'इंडिया' के भीतर सब कुछ ठीक न होने की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनावों के दौरान दोनों पार्टियों ने मिलकर चुनाव लड़ा था और अच्छे नतीजे भी हासिल किए थे। ऐसे में जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं के बीच यह संदेश जाना बेहद जरूरी होता है कि दोनों दल हर मुद्दे पर एकजुट हैं। लेकिन दिल्ली के इस अहम विरोध प्रदर्शन में सपा के सांसदों की अनुपस्थिति ने एक बार फिर आपसी खींचतान और रणनीतिक मतभेदों को हवा दे दी है।
कांग्रेस खेमे में इस बात की चर्चा है कि बड़े राष्ट्रीय मुद्दों पर क्षेत्रीय दलों को भी अपनी संकीर्ण प्राथमिकताओं से ऊपर उठकर साथ आना चाहिए। दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी का मानना है कि उनकी पार्टी अपने स्थानीय समीकरणों और मुद्दों के आधार पर रणनीति तय करती है। हर राष्ट्रीय प्रदर्शन में आंख मूंदकर शामिल होना पार्टी के स्थानीय हितों के अनुकूल नहीं बैठता है। यही वजह है कि अखिलेश यादव ने इस बार अपनी पार्टी को इस मार्च से दूर रखना ही सुरक्षित समझा।
आगामी चुनावों और सीटों के बंटवारे पर असर
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह की दूरियां आने वाले समय में होने वाले छोटे चुनावों और उपचुनावों पर गहरा असर डाल सकती हैं। उत्तर प्रदेश में कई सीटों पर उपचुनाव होने हैं, जहां सपा और कांग्रेस दोनों को मिलकर तालमेल बिठाना है। अगर शीर्ष स्तर पर ही इस तरह की दूरियां दिखती रहेंगी, तो बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं का हौसला कमजोर हो सकता है। जनता के बीच भी यह संदेश जाता है कि विपक्षी दल सिर्फ चुनावी फायदे के लिए साथ आए थे।
हालांकि, दोनों दलों के प्रवक्ताओं की तरफ से अभी तक कोई तीखा बयान सामने नहीं आया है। दोनों तरफ से यही कहा जा रहा है कि गठबंधन पूरी तरह मजबूत है और सभी दल अपने-अपने स्तर पर जनता की आवाज उठा रहे हैं। लेकिन जमीनी सच यह है कि संसद के बाहर और बड़े राष्ट्रीय मंचों पर विपक्षी एकजुटता में दरारें अब साफ दिखने लगी हैं।
भाजपा का तंज और क्षेत्रीय दलों की अपनी मजबूरियां
इस पूरे घटनाक्रम पर सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी ने तीखा हमला बोला है। भाजपा नेताओं का कहना है कि यह तथाकथित विपक्षी गठबंधन सिर्फ स्वार्थ का मेल है। इनमें न तो कोई वैचारिक समानता है और न ही देश हित की कोई साझा सोच। जब भी सड़क पर उतरने की बारी आती है, तो ये दल अपने निजी राजनीतिक फायदों के हिसाब से अलग हो जाते हैं।
द फ्रीलान्स की ग्राउंड पड़ताल बताती है कि क्षेत्रीय दलों की अपनी सियासी मजबूरियां होती हैं। वे अपने राज्य के स्थानीय मतदाताओं को नाराज नहीं करना चाहते। कांग्रेस अपनी राष्ट्रीय छवि चमकाने में लगी है, जबकि क्षेत्रीय दल अपने राज्य के क्षितिज को बचाने में जुटे हैं। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या अखिलेश यादव और राहुल गांधी इस खाई को पाट पाते हैं या यह दूरियां और ज्यादा गहरी होती चली जाती हैं।


