बिहार की राजनीति में नया भूचाल: अनंत सिंह का बड़ा कदम
बिहार की राजनीति में इन दिनों उथल-पुथल का दौर लगातार जारी है। राज्य के विधान परिषद चुनावों की सुगबुगाहट के बीच मोकामा से जनता दल (यूनाइटेड) के विधायक अनंत सिंह ने एक ऐसा कदम उठाया है जिसने सियासी गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। अनंत सिंह ने पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से जनसुराज समर्थित प्रत्याशी अनुज सिंह के पक्ष में खुलकर मैदान संभाल लिया है। उनके इस बागी तेवर और खुले समर्थन के बाद राजनीतिक विश्लेषक तरह-तरह के कयास लगाने लगे हैं। हर कोई यह जानने को उत्सुक है कि क्या बाहुबली विधायक जल्द ही किसी नए राजनीतिक दल का दामन थामेंगे या यह केवल स्थानीय समीकरणों के तहत उठाया गया एक रणनीतिक कदम है।
इस पूरे घटनाक्रम ने सत्ताधारी दल की पेशानी पर बल डाल दिया है। एक तरफ जहां जदयू अपने आंतरिक कलह से जूझ रही है, वहीं दूसरी तरफ विपक्षी दल और विशेषकर जनसुराज इस मौके को भुनाने की कोशिश में जुट ै। अनंत सिंह का यह रुख केवल एक चुनावी समर्थन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके गहरे राजनीतिक निहितार्थ भी निकाले जा रहे हैं। राज्य की राजनीति में अनंत सिंह का अपना एक खास प्रभाव और दबदबा रहा है, ऐसे में उनका किसी अन्य मंच के प्रत्याशी के पक्ष में खड़ा होना कई बड़े बदलावों की ओर इशारा कर रहा है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आने वाले दिनों में यह घटनाक्रम बिहार की चुनावी दिशा को एक नया मोड़ दे सकता है। विधान परिषद चुनावों की तपिश के बीच इस तरह की बयानबाजी और पालाबंदी ने यह साबित कर दिया है कि राज्य में सियासी समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। अब देखना यह दिलचस्प होगा कि जदयू इस बगावत से कैसे निपटती है और क्या अनुज सिंह को मिल रहा यह समर्थन चुनाव परिणामों पर कितना गहरा असर डाल पाता है।
संबंधित खबरें
प्रशांत किशोर की दो टूक: समर्थन का मतलब पार्टी ज्वाइन करना नहीं
जब मोकामा विधायक अनंत सिंह द्वारा जनसुराज प्रत्याशी को समर्थन देने की खबरें चारों तरफ फैल गईं, तो मीडिया ने जनसुराज के सूत्रधार और रणनीतिकार प्रशांत किशोर से इस बाबत तीखे सवाल पूछे। पीके ने इन तमाम चर्चाओं पर विराम लगाते हुए बेहद नपे-तुले अंदाज में अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि हजारों और लाखों लोग उनके अभियान और विचारों का समर्थन कर रहे हैं, लेकिन इसका यह कतई मतलब नहीं है कि समर्थन करने वाला हर शख्स पार्टी की सदस्यता ले रहा है या पार्टी में शामिल हो रहा है।
प्रशांत किशोर ने आगे कहा कि किसी ने अगर कोई बयान दिया है या अपनी इच्छा जाहिर की है, तो उस पर पार्टी उचित समय आने पर ही विचार करती है। उन्होंने मीडिया के सवालों का जवाब देते हुए एक चुटीले अंदाज में कहा कि अभी इस बारे में कयास लगाने की कोई आवश्यकता नहीं है। जब इस तरह की कोई ठोस बात सामने आएगी, तब पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व उस पर कोई आधिकारिक निर्णय लेगा। पीके के इस बयान से यह साफ हो गया है कि फिलहाल जनसुराज पार्टी किसी भी तरह की जल्दबाजी में नहीं है और वह अपनी वैचारिक जमीन को मजबूत करने पर ज्यादा जोर दे रही है।
"हजारों लोग हमारा समर्थन कर रहे हैं। जनसुराज को जितने लोग वोट दे रहे हैं वो पार्टी में आ जाएंगे यह कोई जरूरी नहीं है। उन्होंने ऐसा कुछ कहा है क्या कि वो पार्टी में आ रहे हैं। अगर ऐसा कुछ आएगा और जब आप सुनेंगे कि वो आने वाले हैं तब पार्टी निर्णय लेगी।" — प्रशांत किशोर, जनसुराज सूत्रधार
बाहुबली बनाम विचारधारा: प्रशांत किशोर का स्पष्ट रुख
चुनावी राजनीति में बाहुबली और अपराधियों की भूमिका को लेकर पूछे गए एक अन्य सवाल पर प्रशांत किशोर ने दो टूक जवाब दिया। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी किसी खास व्यक्ति विशेष या बाहुबली के बल पर चुनाव नहीं लड़ना चाहती, बल्कि उनका मुख्य फोकस आम जनता के मुद्दों पर है। पीके ने जोर देकर कहा कि बिहार की जनता अब जागरूक हो चुकी है और उसे विकास, रोजगार और शिक्षा जैसी बुनियादी चीजों की दरकार है।
उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि जिस किसी को भी सातवां वेतनमान चाहिए, वित्तरहित शिक्षकों को उनका हक और सम्मान चाहिए, या राज्य के बेरोजगार युवाओं को रोजगार की तलाश है, वे सीधे तौर पर जनसुराज की वैचारिक धारा से जुड़ सकते हैं। प्रशांत किशोर ने स्पष्ट किया कि पिछले कई सालों से वे बिहार के कोने-कोने में जाकर लोगों को जागरूक कर रहे हैं और इस प्रयास में किसी भी बाहुबली या धर्मबली का कोई विशेष महत्व नहीं है। पार्टी केवल जनहित के मुद्दों और आम आदमी की ताकत के दम पर आगे बढ़ रही है।
जनसुराज के इस दृष्टिकोण ने पारंपरिक राजनीति करने वाले दलों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है। पीके का यह बयान इस बात का संकेत देता है कि वे अपनी पार्टी को एक वैकल्पिक राजनीतिक ताकत के रूप में स्थापित करना चाहते हैं, जो जाति, बाहुबल और धनबल की राजनीति से ऊपर उठकर केवल विकास के एजेंडे पर काम करे।
जदयू के भीतर आंतरिक कलह: अनंत सिंह और नीरज कुमार का विवाद
यह पूरा सियासी ड्रामा रातों-रात पैदा नहीं हुआ है, बल्कि इसके पीछे जदयू के भीतर चल रही लंबी खींचतान और अंतर्कलह है। मोकामा से विधायक अनंत सिंह और विधान पार्षद नीरज कुमार के बीच की तनातनी अब किसी से छिपी नहीं है। विधानसभा चुनावों के दौरान शुरू हुई यह रंजिश अब विधान परिषद चुनावों में एक खुली जंग का रूप ले चुकी है। दोनों नेताओं के बीच जुबानी जंग इस हद तक पहुंच चुकी है कि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के तमाम प्रयासों के बावजूद यह गुत्थी सुलझने का नाम नहीं ले रही है।
पार्टी हाईकमान ने इस विवाद को शांत करने की तमाम कोशिशें की थीं। यहां तक कि केंद्रीय मंत्री और जदयू के वरिष्ठ नेता ललन सिंह को भी इस मामले को सुलझाने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, लेकिन वे भी इस आग को बुझाने में पूरी तरह कामयाब नहीं हो पाए। अनंत सिंह ने तो खुलेआम यह आरोप लगाया है कि उनके खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले सुनियोजित तरीके से दर्ज कराए गए थे, जिसके पीछे पार्टी के भीतर के ही कुछ लोगों का हाथ था। उन्होंने यह तक कह दिया कि वे अपने विरोधी की जमानत जब्त कराकर दम लेंगे।
दूसरी तरफ, नीरज कुमार भी लगातार हमलावर रुख अपनाए हुए हैं। उन्होंने अनंत सिंह पर कटाक्ष करते हुए उन्हें तीखे जवाब दिए और यहां तक कह दिया कि यदि उनके पास कोई सबूत है तो वे अदालत का दरवाजा खटखटाएं। दोनों नेताओं के बीच के इस विवाद ने पार्टी की छवि को भी नुकसान पहुंचाया है, क्योंकि जदयू के इतिहास में इस तरह की खुली बयानबाजी और आंतरिक कलह शायद ही कभी देखने को मिली थी।
चुनावी रण में रसगुल्लों की मिठास और शक्ति प्रदर्शन
अनंत सिंह के बगावती तेवर और उनके शक्ति प्रदर्शन का नजारा हाल ही में हरनौत और आसपास के इलाकों में देखने को मिला जब वे जनसुराज प्रत्याशी के समर्थन में रोड शो और यात्रा पर निकले। इस दौरान उनके समर्थकों ने उनका भव्य स्वागत किया और उनके काफिले के साथ भारी भीड़ उमड़ी। एक अक्टूबर को जब अनंत सिंह खुली जीप पर सवार होकर नामांकन जुलूस में शामिल हुए और प्रचार के दौरान बड़े पैमाने पर मिठाइयां व रसगुल्ले बंटवाए, तो राजनीतिक गलियारों में खलबली मच गई।
हैरानी की बात यह रही कि जन सुराज प्रत्याशी के समर्थन में निकली इस यात्रा के दौरान कई जगहों पर पारंपरिक नारों के साथ-साथ अन्य नेताओं के समर्थन में भी नारे गूंजते सुनाई दिए, जिससे राजनीतिक विश्लेषक हैरान रह गए। अनंत सिंह ने इस यात्रा के दौरान धार्मिक स्थलों पर भी माथा टेका और जनता के बीच अपनी पैठ मजबूत करने का कोई मौका नहीं छोड़ा।
यह पूरा घटनाक्रम इस बात का प्रमाण है कि बिहार की राजनीति में समीकरण बहुत तेजी से बदल रहे हैं। दलगत सीमाओं से परे व्यक्तिगत संबंध और राजनीतिक आवश्यकताएं नए गठजोड़ को जन्म दे रही हैं। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि अनंत सिंह का यह रुख जदयू के लिए कितना नुकसानदेह साबित होता है और जनसुराज इस स्थिति का कितना फायदा उठा पाती है।








