अंकिता भंडारी हत्याकांड और नया राजनीतिक मोड़
उत्तराखंड की माटी को झकझोर देने वाले अंकिता भंडारी हत्याकांड की गूंज एक बार फिर से राष्ट्रीय राजधानी और देवभूमि के राजनीतिक गलियारों में सुनाई दे रही है। इस सनसनीखेज मामले में भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव दुष्यंत गौतम का नाम उछलने के बाद से सियासत पूरी तरह गर्मा गई है। विपक्ष इस मुद्दे को लेकर आक्रामक मुद्रा में है, जबकि सत्ता पक्ष ने इन तमाम दाースों को बेबुनियाद और निराधार बताया है।
वर्ष 2022 में हुई इस वीभत्स घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। अंकिता के न्याय की मांग को लेकर लगातार आवाजें उठती रही हैं। अब अचानक इस मामले में एक वरिष्ठ राष्ट्रीय नेता का नाम जुड़ने से जांच की दिशा और राजनीतिक समीकरणों पर नए सवाल खड़े होने लगे हैं। आम जनता से लेकर विभिन्न सामाजिक संगठन तक इस नए घटनाक्रम पर पैनी नजर बनाए हुए हैं।
विपक्षी दलों के तीखे हमले और जवाबदेही की मांग
कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दलों ने इस मामले को लेकर सरकार को घेरना शुरू कर दिया है। विपक्षी नेताओं का कहना है कि हत्याकांड की जांच में हर उस व्यक्ति से पूछताछ होनी जिसका नाम पीड़ित पक्ष या किसी भी जरिए से सामने आ रहा है। उनका तर्क है कि निष्पक्ष जांच तभी संभव है जब सत्ता के शीर्ष पदों पर बैठे लोगों के खिलाफ भी बिना किसी दबाव के पड़ताल की जाए।
विपक्ष ने सड़कों से लेकर सोशल मीडिया तक इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाना शुरू कर दिया है। उनका आरोप है कि मामले को दबाने की कोशिशें पहले भी होती रही हैं और अब नया नाम सामने आने से इस बात की आशंका और पुख्ता हो जाती है कि कई परतें अभी भी खुलना बाकी हैं। विपक्षी दलों का प्रतिनिधिमंडल लगातार प्रशासनिक अधिकारियों से मिलकर इस मामले में त्वरित कार्रवाई की मांग कर रहा है।
भाजपा का पलटवार और आरोपों को खारिज करने का दावा
दुष्यंत गौतम का नाम सामने आने के बाद भारतीय जनता पार्टी ने इन तमाम आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि विपक्ष के पास कोई असली मुद्दा नहीं बचा है, इसलिए वे हताशा में इस तरह के मनगढ़ंत आरोप लगा रहे हैं। भाजपा का यह भी कहना है कि न्यायपालिका और पुलिस प्रशासन ने इस मामले में पहले ही अपनी कार्रवाई पूरी निष्पक्षता से की है और अपराधियों को जेल की सलाखों के पीछे भेजा जा चुका है।
"राजनीतिक लाभ के लिए किसी भी सम्मानित नेता का नाम इस तरह के संवेदनशील मामलों में घसीटना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और निंदनीय है। हमारी पार्टी हमेशा कानून के शासन के साथ खड़ी रही है।" — प्रदेश प्रवक्ता, भाजपा
सत्ता पक्ष के प्रवक्ताओं ने साफ शब्दों में कहा कि इस तरह के बेबुनियाद बयानों से न केवल जांच प्रक्रिया प्रभावित होती है बल्कि पीड़ित परिवार के दुखों के साथ भी खिलवाड़ होता है। उन्होंने विपक्ष को चुनौती दी है कि यदि उनके पास कोई ठोस सबूत है तो उसे अदालत या जांच एजेंसियों के सामने पेश करें, न कि केवल मीडिया में बयानबाजी करें।
न्याय की आस लगाए बैठा अंकिता का परिवार और समाज
इस पूरे घटनाक्रम के बीच सबसे बड़ा सवाल अंकिता भंडारी के परिवार के दर्द और न्याय की गुहार से जुड़ा है। माता-पिता और स्थानीय लोग लगातार यह मांग कर रहे हैं कि उनकी बेटी के हत्यारों को ऐसी सजा मिले जो समाज में मिसाल बने। उनका यह भी मानना है कि इस तरह के राजनीतिक विवादों से असली न्याय मिलने की प्रक्रिया में देरी नहीं होनी चाहिए।
देवभूमि के आम नागरिकों का कहना है कि राजनीति से ऊपर उठकर इस मामले में पूरी सच्चाई सामने आनी चाहिए। चाहे कोई कितना भी रसूखदार क्यों न हो, कानून की नजर में सब बराबर होने चाहिए। स्थानीय लोगों और महिला संगठनों का दबाव लगातार बना हुआ है कि जांच एजेंसियां किसी भी बाहरी दबाव के बिना अपना काम पूरी ईमानदारी से जारी रखें।
आगे की कानूनी और राजनीतिक राह
अब देखना यह होगा कि इस नए खुलासे और विवाद के बाद जांच एजेंसियां क्या कदम उठाती हैं। क्या इस मामले में किसी तरह की नई पूछताछ या समन जारी किया जाएगा या फिर यह मामला सिर्फ राजनीतिक बयानों तक ही सीमित रहकर रह जाएगा। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सबूत मिलता है, तो उसे कानूनी दायरे में लाना जांच एजेंसियों की जिम्मेदारी है।
आगामी दिनों में इस मुद्दे पर सियासी सरगर्मी और बढ़ने के पूरे आसार हैं। विधानसभा से लेकर सड़क तक विपक्ष इस मामले को छोड़ने के मूड में नहीं दिख रहा है, वहीं सत्ताधारी दल भी हर हमले का कड़ा जवाब देने की तैयारी कर चुका है। अंततः सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि अंकिता भंडारी को पूर्ण और निष्पक्ष न्याय कब और कैसे मिल पाता है।










