अंकिता भंडारी हत्याकांड और न्याय की गुहार
उत्तराखंड की वादियों में आज भी अंकिता भंडारी की चीखें और न्याय की गूंज सुनाई देती है। ऋषिकेश के पास वंतरा रिजॉर्ट में रिसेप्शनिस्ट के तौर पर काम करने वाली अंकिता की हत्या ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। आज भी इस मामले में कई सवाल अनुत्तरित हैं, जिनका जवाब पूरा प्रदेश और देश मांग रहा है। पीड़ित परिवार का संघर्ष इस बात का प्रमाण है कि आम आदमी के लिए न्याय पाना कितना कठिन हो गया है।
घटना के इतने साल बीत जाने के बाद भी मुख्य साजिशकर्ताओं और उस तथाकथित वीआईपी का नाम सामने न आना व्यवस्था पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है। अंकिता के माता-पिता हर मंच पर अपनी बेटी के लिए न्याय की गुहार लगा रहे हैं। उनका आरोप है कि इस मामले में बड़े रसूखदार लोगों को बचाने का प्रयास किया जा रहा है, जिससे दोषियों के हौसला बुलंद हैं और जनता का कानून व्यवस्था से भरोसा उठ रहा है।
दुष्यंत गौतम की राज्यपाल पद पर नियुक्ति का विरोध
मामले में नया राजनीतिक भूचाल तब आया जब दुष्यंत गौतम को राज्यपाल बनाए जाने की घोषणा हुई। विपक्षी दलों और अंकिता के परिजनों ने इस नियुक्ति पर तीखी आपत्ति जताई है। कांग्रेस पार्टी ने इसे जनता की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करार दिया है। पार्टी नेताओं का कहना है कि जिन लोगों पर गंभीर आरोप हैं या जिनकी कार्यशैली पर सवाल उठते रहे हैं, उन्हें ऐसे संवैधानिक पदों पर बैठाना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है।
इस नियुक्ति के विरोध में उत्तराखंड कांग्रेस ने प्रदेशभर में गांधी पार्क और प्रमुख चौराहों पर मौन उपवास रखा। नेताओं और कार्यकर्ताओं ने मुंह पर पट्टी बांधकर सरकार की कार्यप्रणाली के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन किया। उनका कहना है कि जब तक अंकिता को पूरी तरह न्याय नहीं मिल जाता और उस वीआईपी का पर्दाफाश नहीं हो जाता, तब तक उनका संघर्ष जारी रहेगा।
कांग्रेस का मौन उपवास और सड़क से सदन तक हुंकार
मौन उपवास के जरिए कांग्रेस ने सरकार को यह संदेश देने की कोशिश की है कि वे इस संवेदनशील मुद्दे को भूलने वाले नहीं हैं। पार्टी का आरोप है कि राज्य सरकार आरोपियों को संरक्षण दे रही है और मामले की लीपापोती करने में जुटी है। प्रदर्शन के दौरान कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने कहा कि उत्तराखंड की देवभूमि में महिलाओं की सुरक्षा खतरे में है और सरकार केवल बयानबाजी कर रही है।
"हमारी बेटी को खोए हुए लंबा वक्त बीत चुका है, लेकिन आज तक हमें यह नहीं बताया गया कि वह वीआईपी कौन था जिसके लिए अंकिता पर दबाव बनाया जा रहा था। अपराधियों को बचाने के लिए बड़े स्तर पर खेल खेला जा रहा है, जिसका हम विरोध करते रहेंगे।" — अंकिता के पिता, पीड़ित परिवार
विरोध प्रदर्शनों के दौरान सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे। पुलिस प्रशासन ने किसी भी अप्रिय घटना को रोकने के लिए बैरिकेडिंग की थी, लेकिन कार्यकर्ताओं का गुस्सा शांत होने का नाम नहीं ले रहा है। आम जनता भी सोशल मीडिया और सड़कों पर इस मुहिम से जुड़ती नजर आ रही है, जिससे सरकार पर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है।
पीड़ित माता-पिता का दर्द और न्याय की अंतहीन लड़ाई
अंकिता के माता-पिता का जीवन इस हादसे के बाद पूरी तरह उजड़ चुका है। हर दिन वे अदालत के चक्कर काटने और मीडिया के सवालों के जवाब देने को मजबूर हैं। उनका कहना है कि उन्हें न्याय केवल कागजों पर मिल रहा है, जबकि असल अपराधी खुलेआम घूम रहे हैं। मां का रो-रोकर बुरा हाल है और पिता लगातार सिस्टम से लड़ रहे हैं।
समाज के विभिन्न वर्गों, महिला संगठनों और छात्र संघों ने भी इस लड़ाई में परिवार का साथ देने का ऐलान किया है। लोगों का मानना है कि यदि इस मामले में त्वरित और निष्पक्ष कार्रवाई नहीं हुई, तो जनता का कानून व्यवस्था पर से पूरी तरह विश्वास उठ जाएगा। अंकिता भंडारी का यह मामला अब केवल एक अपराध नहीं, बल्कि उत्तराखंड की अस्मिता और न्याय की लड़ाई बन चुका है।
आगामी राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव
उत्तराखंड की राजनीति में अंकिता भंडारी हत्याकांड एक ऐसा मुद्दा बन चुका है जो हर चुनाव और हर राजनीतिक उठापटक के केंद्र में आ जाता है। राज्यपाल की नियुक्ति पर उपजा यह नया विवाद आने वाले दिनों में सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है। विपक्षी दल इसे बड़ा मुद्दा बनाकर जनता के बीच जाने की तैयारी कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को इस मामले में पारदर्शी रवैया अपनाना चाहिए और जनता के बीच स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। जब तक इस हाई-प्रोफाइल मामले के सभी पहलुओं की निष्पक्ष जांच पूरी नहीं होती और असली चेहरों को बेनकाब नहीं किया जाता, तब तक राज्य का सियासी तापमान यूं ही चढ़ा रहेगा।












