पारंपरिक फसलों से आगे निकलने का बेहतरीन मौका
देश का अन्नदाता किसान आज भी पारंपरिक रूप से धान और गेहूं की खेती पर सबसे ज्यादा निर्भर रहता है। हालांकि, बदलते मौसम के मिजाज और बाजार में बढ़ती लागत के कारण कई बार किसानों को उतनी आमदनी नहीं मिल पाती, जितनी उनकी मेहनत होती है। यही वजह है कि अब कृषि विशेषज्ञ किसानों को बागवानी अपनाने की सलाह दे रहे हैं। अगर आप भी खेती में कुछ नया और मुनाफे वाला करने की सोच रहे हैं, जिससे अच्छी आमदनी के साथ-साथ सरकारी मदद भी मिल सके, तो केले की खेती आपके लिए एक बेहतरीन विकल्प साबित हो सकती है।
केले की फसल को हमेशा से एक कमर्शियल और हाई-रिटर्न देने वाली फसल माना गया है। बाजार में इसकी मांग पूरे साल बनी रहती है, जिससे किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ती। इसके अलावा, अब सरकार भी इस दिशा में किसानों का पूरा साथ दे रही है। केंद्र सरकार ने बागवानी को बढ़ावा देने के लिए अपनी झोली खोल दी है और किसानों की मदद के लिए कई तरह की योजनाएं चलाई जा रही हैं, जिनका सीधा फायदा आम किसानों को मिल रहा है।
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क्या है MIDH योजना और कैसे मिलती है आर्थिक मदद?
केले की खेती को देश भर में बड़े पैमाने पर बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार 'मिशन फॉर इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट ऑफ हॉर्टिकल्चर' (MIDH) यानी बागवानी के एकीकृत विकास के लिए मिशन नामक योजना चला रही है। यह योजना देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में प्रभावी रूप से लागू है। इस योजना के तहत किसानों को केले की खेती के लिए आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है, ताकि खेती की शुरुआती लागत का बोझ किसान के कंधों पर पूरी तरह न पड़े।
MIDH के तहत मिलने वाली यह सहायता खेती के तरीके और उसमें इस्तेमाल होने वाली तकनीकों पर पूरी तरह निर्भर करती है। केंद्र सरकार के तय दिशानिर्देशों के अनुसार, सामान्य क्षेत्रों में केले के सकर से खेती करने पर कुल लागत 2 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर आंकी गई है। सरकार इस निर्धारित लागत पर सीधे तौर पर 40 फीसदी तक की सहायता देती है। इसका मतलब यह हुआ कि किसानों को प्रति हेक्टेयर करीब 80 हजार रुपये तक की भारी-भरकम आर्थिक मदद मिल सकती है।
ड्रिप सिंचाई और वैज्ञानिक तकनीकों पर खास फोकस
आज के दौर में पानी की बचत करना और आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल करना कृषि की सबसे बड़ी जरूरत बन चुका है। MIDH योजना की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें केले की खेती के साथ-साथ ड्रिप सिंचाई यानी टपक सिंचाई को भी एकीकृत पैकेज का मुख्य हिस्सा बनाया गया है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि किसान की मदद केवल पौधे जमीन में लगाने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वैज्ञानिक तरीके से एक आधुनिक और मजबूत बाग तैयार करने में भी सरकार उसकी आर्थिक और तकनीकी रूप से सहायता करती है।
बिना ड्रिप सिंचाई के भी यदि पारंपरिक या अन्य तरीकों से खेती की जा रही है, तो वहां भी लागत का आकलन करके नियमानुसार सहायता प्रदान की जाती है। कृषि जानकारों का मानना है कि वैज्ञानिक पद्धति से की गई बागवानी में फसलों के बर्बाद होने का जोखिम बहुत कम हो जाता है और पैदावार शानदार होती है। इससे बाजार में फसल की अच्छी कीमत मिलती है और किसानों का मुनाफा कई गुना बढ़ जाता है।
टिश्यू कल्चर पौधों के इस्तेमाल से बढ़ती है पैदावार
खेती की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि आप बीज या पौधे किस गुणवत्ता के इस्तेमाल कर रहे हैं। केले की वैज्ञानिक खेती में अच्छी गुणवत्ता वाले पौधों का होना बेहद जरूरी है। आधुनिक कृषि में टिश्यू कल्चर पौधों का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर किया जा रहा है, क्योंकि ये पौधे रोगमुक्त होते हैं और इनकी बढ़वार एक समान होती है। MIDH योजना के दायरे में ऐसे आधुनिक टिश्यू कल्चर पौधों से की जाने वाली केले की खेती को भी शामिल किया गया है।
सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में देश के बागवानी क्षेत्र में उच्च गुणवत्ता वाली रोपण सामग्री और माइक्रो-इरिगेशन जैसी सुविधाओं को प्राथमिकता दी है। टिश्यू कल्चर पौधों के प्रयोग से फसल की पैदावार में जबर्दस्त बढ़ोतरी देखने को मिलती है, जिससे किसान बाजार की मांग को आसानी से पूरा कर पाते हैं और अपनी आमदनी को सुरक्षित कर सकते हैं।
कैसे उठाएं इस सरकारी योजना का लाभ?
चूंकि MIDH एक केंद्रीय योजना है, इसलिए इसे देश के विभिन्न राज्यों के माध्यम से जमीन पर उतारा जाता है। यही कारण है कि इस योजना का लाभ उठाने के लिए किसानों को अपने राज्य के स्थानीय उद्यान विभाग या संबंधित स्टेट हॉर्टिकल्चर डिपार्टमेंट से संपर्क करना होता है। योजना के तहत मिलने वाली सहायता राशि राज्य विशेष के नियमों, कुल लागत, पात्रता के मानदंडों और उस राज्य के लिए उपलब्ध बजट पर निर्भर करती है।
"किसानों को पारंपरिक खेती के चक्र से बाहर निकलकर बागवानी और नकदी फसलों की तरफ कदम बढ़ाना चाहिए। सरकार की इन योजनाओं का मकसद किसानों की शुरुआती लागत को कम करना और उन्हें आत्मनिर्भर बनाना है। सही तकनीक और सरकारी सहयोग से खेती को घाटे का सौदा नहीं, बल्कि सबसे बड़ा मुनाफा कमाने का जरिया बनाया जा सकता है।"— कृषि विशेषज्ञ एवं उद्यान अधिकारी
इस योजना का दायरा सिर्फ खेत में पौधे लगाने तक ही सीमित नहीं है। MIDH के तहत गुणवत्तापूर्ण पौधे उपलब्ध कराने से लेकर नए बागों की स्थापना, माइक्रो इरिगेशन, पोस्ट-हार्वेस्ट मैनेजमेंट यानी फसल कटाई के बाद के प्रबंधन और मार्केटिंग तक की गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाता है। संक्षेप में कहें तो केले की खेती करने वाले मेहनतकश किसानों के लिए यह योजना शुरुआती लागत को कम करने और उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बनाने का एक बेहतरीन माध्यम है।







