मौसम बदलते ही क्यों बढ़ रहा है आंखों का यह गंभीर खतरा
मौसम में होने वाले बदलाव हमेशा से हमारे स्वास्थ्य के लिए एक बड़ी चुनौती लेकर आते हैं। सर्दियों की विदाई और गर्मियों की शुरुआत के बीच का समय हो या फिर मानसून के जाने का वक्त, हवा में मौजूद नमी और धूल-कण सीधे हमारे शरीर को प्रभावित करते हैं। पिछले कुछ समय से स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने एक नए और चिंताजनक ट्रेंड की ओर इशारा किया है। आंखों का जो संक्रमण पहले कुछ दिनों की साधारण सी समस्या माना जाता था, वह अब गंभीर रूप लेता जा रहा है। आम बोलचाल की भाषा में जिसे गुलाबी आंखें या आई फ्लू कहा जाता है, वह अब रेजिस्टेंस आई फ्लू में तब्दील हो रहा है।
इस खतरनाक बदलाव के पीछे सबसे बड़ा कारण आम जनता की एक लापरवाही है। जैसे ही आंखों में थोड़ा सा भी लालपन या खुजली महसूस होती है, लोग डॉक्टर के पास जाने के बजाय सीधे नजदीकी मेडिकल स्टोर का रुख करते हैं। वहां से बिना किसी चिकित्सकीय परामर्श के एंटीबायोटिक या स्टेरॉयड वाली आई ड्रॉप खरीदकर डाल ली जाती है। शुरुआती राहत तो मिल जाती है, लेकिन यह राहत कुछ समय के लिए ही होती है। अंदर ही अंदर वायरस इन दवाओं के खिलाफ अपनी प्रतिरोधक क्षमता मजबूत कर लेता है। परिणामस्वरूप, जब दोबारा संक्रमण होता है, तो वही पुरानी दवाइयां पूरी तरह बेअसर साबित होती हैं।
देश भर के बड़े सरकारी और निजी अस्पतालों के नेत्र रोग विभागों में इस समय मरीजों की भारी भीड़ देखी जा रही है। डॉक्टरों के अनुसार, ओपीडी में आने वाले हर दस में से दो से तीन मरीज ऐसे हैं जो रेजिस्टेंस आई फ्लू की चपेट में आ चुके हैं। इनकी हालत सामान्य मरीजों के मुकाबले काफी ज्यादा गंभीर होती है, क्योंकि उन्होंने समय रहते सही इलाज नहीं कराया होता है।
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ओपीडी में उमड़ रही मरीजों की भीड़ और डॉक्टरों की चिंता
स्वास्थ्य संस्थानों से मिल रहे आंकड़े वाकई चौंकाने वाले हैं। बड़े सरकारी अस्पतालों के नेत्र रोग विभाग की ओपीडी में रोजाना सैकड़ों की संख्या में मरीज पहुंच रहे हैं। इनमें से एक बड़ा हिस्सा उन लोगों का है जो अपनी आंखों की अनदेखी कर चुके होते हैं। जब संक्रमण नियंत्रण से बाहर हो जाता है और आंखों से पानी बहने के साथ सूजन और तेज दर्द शुरू होता है, तब जाकर मरीज अस्पताल का दरवाजा खटखटाते हैं।
नेत्र विशेषज्ञों का कहना है कि रेजिस्टेंस आई फ्लू के मामलों को ठीक करना डॉक्टरों के लिए भी एक बड़ी चुनौती बन गया है। सामान्य आई ड्रॉप से यह संक्रमण टस से मस नहीं होता। मरीजों को ठीक करने के लिए मल्टीपल मेडिकेशन यानी एक साथ कई तरह की भारी दवाइयों का सहारा लेना पड़ता है। स्थिति इतनी बिगड़ चुकी होती है कि मरीज को पूरी तरह स्वस्थ होने में पंद्रह से बीस दिन का लंबा समय लग जाता है। इस दौरान उनकी दिनचर्या और कामकाज पर भी बुरा असर पड़ता है।
विशेषज्ञ इस बात पर जोर दे रहे हैं कि आंखों की बीमारी को कभी भी हल्के में नहीं लेना चाहिए। आंखें हमारे शरीर का सबसे संवेदनशील अंग हैं और इनके साथ किसी भी तरह का घरेलू नुस्खा या मेडिकल स्टोर से सीधे दवा लेकर प्रयोग करना भारी पड़ सकता है। यदि समय रहते इस पर रोक नहीं लगाई गई, तो आने वाले दिनों में यह समस्या और भी विकराल रूप धारण कर सकती है.
"बिना डॉक्टर की सलाह के मेडिकल से दवा लेकर डालने से वायरस और ज्यादा ताकतवर हो रहा है। यही वजह है कि आज हर 10 में से दो से तीन मरीज रेजिस्टेंस आई फ्लू का शिकार होकर आ रहे हैं, जिन्हें ठीक करने में लंबा वक्त लग रहा है।" — डॉ. प्रीति रावत, नेत्र रोग विभाग
धूल, एलर्जी और स्टेरॉयड के खतरनाक साइड इफेक्ट्स
मौसम में बदलाव के साथ हवा में उड़ने वाली धूल और मिट्टी भी आंखों की सेहत बिगाड़ने में अहम भूमिका निभाती है। हवा के जरिए आंखों में जाने वाले सूक्ष्म कण एलर्जी पैदा करते हैं, जिससे आंखों में खुजली, जलन और सूजन जैसी परेशानियां शुरू हो जाती हैं। लोग इन लक्षणों से बचने के लिए भी खुद ही डॉक्टर बन जाते हैं और काउंटर पर मिलने वाली कोई भी आई ड्रॉप इस्तेमाल करने लगते हैं।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि कई आई ड्रॉप्स में भारी मात्रा में स्टेरॉयड होता है। लंबे समय तक या बिना डॉक्टर की देखरेख के स्टेरॉयड का इस्तेमाल करना आंखों के प्राकृतिक लेंस को भारी नुकसान पहुंचाता है। इसके अत्यधिक सेवन से मोतियाबिंद और कांचबिंद जैसी गंभीर बीमारियां होने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। ओपीडी में ऐसे कई मामले सामने आ रहे हैं जहां मामूली संक्रमण का गलत इलाज कराने वाले मरीज बाद में ग्लूकोमा यानी कांचबिंद की गिरफ्त में आ जाते हैं।
पर्यावरण में बढ़ता प्रदूषण और यूवी किरणों का प्रभाव भी आंखों के स्वास्थ्य पर बुरा असर डाल रहा है। जब आंखें पहले से ही कमजोर या एलर्जिक होती हैं, तो प्रदूषित हवा उन पर और तेजी से हमला करती है। ऐसे में शरीर की प्राकृतिक प्रतिरक्षा प्रणाली भी हर बार संक्रमण से लड़ने में सक्षम नहीं हो पाती है, और मरीज को अस्पताल के चक्कर काटने ही पड़ते हैं।
डायबिटीज के मरीजों के लिए आंखों का संक्रमण है बड़ा खतरा
हाल ही में अस्पतालों के नेत्र विभागों से जो आंकड़े सामने आए हैं, वे बेहद गंभीर स्थिति की ओर इशारा करते हैं। ओपीडी में आने वाले कुल मरीजों में से लगभग साठ प्रतिशत लोग डायबिटीज यानी मधुमेह से पीड़ित होते हैं। यह आंकड़ा इस बात का प्रमाण है कि शरीर की दूसरी बीमारियां सीधे तौर पर आंखों की सेहत से जुड़ी हुई हैं।
रक्त में शुगर का स्तर अनियंत्रित रहने पर आंखों के पर्दे यानी रेटिना पर इसका सीधा और बुरा असर पड़ता है। डायबिटीज के कारण पर्दे की नसें कमजोर हो जाती हैं, जिससे उनमें सूजन आ सकती है, पर्दा अपनी जगह से सरक सकता है या फिर हेमरेज जैसी स्थिति भी पैदा हो सकती है। जब एक डायबिटिक मरीज आई फ्लू या किसी अन्य संक्रमण की चपेट में आता है, तो उसकी रिकवरी बेहद धीमी और जोखिम भरी हो जाती है।
चिकित्सकों का सुझाव है कि जिन लोगों को शुगर की समस्या है, उन्हें अपनी आंखों की नियमित जांच कराते रहना चाहिए। जरा सी भी लाचारी या लापरवाही आंखों की रोशनी छीनने का कारण बन सकती है। सर्दियों और गर्मियों के संक्रमण काल में इन विशेष जोखिम वाले मरीजों को अतिरिक्त सावधानी बरतने की सख्त जरूरत है।
सुरक्षित रहने के लिए क्या कदम उठाएं और क्या न करें
आंखों के संक्रमण से खुद को और अपने परिवार को बचाने के लिए कुछ बुनियादी सावधानियों का पालन करना बेहद जरूरी है। सबसे पहला और महत्वपूर्ण नियम यह है कि कभी भी अपनी मर्जी से किसी भी मेडिकल स्टोर से जाकर आंखों की दवा न खरीदें। यदि आंखों में खुजली, लालपन या पानी आने जैसी कोई भी दिक्कत महसूस हो, तो तुरंत किसी योग्य नेत्र विशेषज्ञ से मिलें और उन्हीं की सलाह के अनुसार दवा का इस्तेमाल करें।
अपने हाथों की साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखें। बार-बार गंदे हाथों से अपनी आंखों को छूने से बचें। अगर घर में किसी एक सदस्य को आई फ्लू या कोई अन्य संक्रमण हो गया है, तो उसके तौलिए, रुमाल और चश्मे को अलग रखें ताकि संक्रमण परिवार के अन्य सदस्यों तक न फैल सके। बाहर निकलते समय धूप और धूल से बचने के लिए चश्मे का प्रयोग करना भी एक अच्छा उपाय है।
अंत में यही कहा जा सकता है कि सेहत से जुड़े मामलों में शॉर्टकट हमेशा नुकसानदायक साबित होते हैं। थोड़ी सी जागरूकता और समय पर सही इलाज अपनाकर हम रेजिस्टेंस आई फ्लू जैसी गंभीर समस्याओं से आसानी से बच सकते हैं। अपनी आंखों की हिफाजत करना हमारे अपने हाथों में है, इसलिए लापरवाही से बचें और स्वस्थ रहें।






