बैंक कर्मचारियों की हड़ताल और 5-दिन कार्य सप्ताह का विवाद
देशभर के बैंक कर्मचारियों और अधिकारियों के संगठनों ने अपनी पुरानी मांगों को लेकर एक बार फिर मोर्चा खोल दिया है। बैंक यूनियनों की तरफ से पांच दिन के कार्य सप्ताह यानी 'फाइव-डे वर्किंग' की मांग लंबे समय से की जा रही है। इसी कड़ी में बैंक कर्मचारियों ने आगामी 28 सितंबर से तीन दिनों की देशव्यापी हड़ताल पर जाने का ऐलान किया है। इस हड़ताल के पीछे मुख्य वजह वेतन समझौतों के क्रियान्वयन और विशेष रूप से शनिवार और रविवार को मिलाकर हफ्ते में दो दिन की छुट्टी का मामला अटका होना है। बैंक यूनियनों का तर्क है कि इस मुद्दे पर पहले ही सहमति बन चुकी थी, लेकिन अब सरकार और संबंधित महकमों की तरफ से इस पर पल्ला झाड़ा जा रहा है, जिससे बैंकिंग जगत में भारी नाराजगी देखने को मिल रही है।
सामान्य नागरिकों और बैंकिंग सेक्टर से जुड़े लोगों के बीच यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि आखिर इतने महीनों बाद भी यह मामला क्यों उलझा हुआ है। क्या वाकई सरकार ने इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया है या फिर फाइलें किसी अन्य तकनीकी पेच में फंसकर रह गई हैं? इन तमाम सवालों के बीच वित्त मंत्रालय के सूत्रों के बयानों ने इस पूरे विवाद को एक नया मोड़ दे दिया है। कर्मचारियों का एक धड़ा जहां इसे अपने अधिकारों की लड़ाई बता रहा है, वहीं दूसरी ओर प्रशासनिक गलियारों से आ रही खबरें कुछ और ही कहानी बयां करती हैं।
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वित्त मंत्रालय के सूत्रों का बड़ा दावा, कहा- कभी नहीं हुआ था कोई वादा
इस पूरे मामले पर जब वित्त मंत्रालय के उच्च पदस्थ सूत्रों से जानकारी ली गई, तो एक बिल्कुल अलग और चौंकाने वाला पहलू सामने आया। सूत्रों के अनुसार, केंद्र सरकार या वित्त मंत्रालय की तरफ से कभी भी बैंकों के लिए पांच दिन के वर्क वीक को लेकर कोई आधिकारिक वादा नहीं किया गया था। उनका साफ कहना है कि जब वेतन समझौते को लेकर दोनों पक्षों के बीच बैठकें चल रही थीं, तब यह मुद्दा मुख्य चर्चा का हिस्सा ही नहीं था। मंत्रालय का यह स्पष्ट मानना है कि इस विषय पर न तो कोई अंतिम समझौता हुआ और न ही इस पर दोनों पक्षों के बीच किसी प्रकार की आपसी सहमति बन पाई थी।
मंत्रालय के सूत्रों का यह भी तर्क है कि हर शनिवार और रविवार को बैंक बंद रखने की मांग पूरी तरह से कर्मचारी यूनियनों की तरफ से एकतरफा ढंग से उठाई गई थी। चूंकि इस पर शासन स्तर पर कोई वैधानिक या नीतिगत फैसला नहीं लिया गया था, इसलिए इसे लागू करने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता। इस तीखे बयान के सामने आने के बाद बैंक यूनियनों और सरकार के बीच तकरार और ज्यादा बढ़ गई है। जानकारों का मानना है कि यदि इस मुद्दे पर जल्द ही कोई बीच का रास्ता नहीं निकाला गया, तो आने वाले दिनों में आम जनता को बैंकिंग सेवाओं में भारी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।
यूनियनों का पक्ष: मार्च 2024 के द्विपक्षीय समझौते का दिया जा रहा हवाला
दूसरी तरफ, ऑल इंडिया बैंक ऑफिसर्स कन्फेडरेशन (AIBOC) और अन्य बैंक कर्मचारी संगठनों का दावा इसके बिल्कुल विपरीत है। यूनियनों के नुमाइंदों का कहना है कि इसी साल मार्च महीने में इंडियन बैंक्स एसोसिएशन (IBA) के साथ हुए द्विपक्षीय वेतन संशोधन समझौते के दौरान इस बात पर पूरी सहमति बन गई थी कि बैकिंग कामकाज के घंटों में थोड़ा बदलाव करके शनिवार का अवकाश लागू किया जाएगा। यूनियनों का यह भी कहना है कि उन्होंने इसके एवज में सोमवार से शुक्रवार तक प्रतिदिन 40 मिनट अतिरिक्त काम करने का प्रस्ताव भी दिया था, जिसे बैंक प्रबंधन ने स्वीकार कर लिया था।
यूनियन नेताओं का आरोप है कि जब बैंक मैनेजमेंट और कर्मचारियों के बीच सभी बिंदुओं पर रजामंदी हो चुकी थी, तो फाइल को आगे बढ़ाने के बाद वित्त मंत्रालय स्तर पर इस पर रोक क्यों लगा दी गई। उनका यह भी कहना है कि हर पांच साल पर होने वाले इस वेतन समझौते में कर्मचारियों की भलाई के कई प्रावधान जोड़े गए थे, जिनमें 17 प्रतिशत वेतन वृद्धि और महंगाई भत्ते का विलय शामिल था। ऐसे में यदि 5-डे बैंकिंग के प्रावधान को रोका जाता है, तो यह कर्मचारियों के साथ किया गया एक तरह का विश्वासघात माना जाएगा।
क्या कहती है बैंक वेतन समझौते की प्रक्रिया और इतिहास
बैंकिंग सेक्टर में कर्मचारियों के वेतन, भत्तों और काम करने के तौर-तरीकों को तय करने के लिए एक बेहद लंबी और संगठित प्रक्रिया अपनाई जाती है। नियम के मुताबिक, हर पांच साल पर इंडियन बैंक्स एसोसिएशन (IBA) और विभिन्न बैंक यूनियनों के बीच बातचीत के जरिए एक नया द्विपक्षीय समझौता होता है। इसी कड़ी में साल 2024 की शुरुआत में भी एक बड़ा समझौता हुआ था, जिसमें कर्मचारियों की सैलरी में बढ़ोतरी से लेकर कई अन्य सहूलियतें देने की बात तय हुई थी। कथित तौर पर इसी दौरान शनिवार की छुट्टी का प्रस्ताव भी मेज पर आया था, जिस पर दोनों मुख्य पक्षों ने अपनी सहमति की मुहर लगा दी थी।
लेकिन बैंक प्रबंधन और यूनियनों के बीच बनी सहमति के बाद जब इस फाइल को प्रशासनिक मंजूरी के लिए आगे भेजा जाता है, तो वहां कई प्रकार के वित्तीय और कामकाजी पहलुओं का आकलन किया जाता है। चूंकि शनिवार को बैंक बंद रहने से सरकारी कामकाज और आम जनता के लेनदेन पर सीधा असर पड़ता है, इसलिए सरकार इस पर बहुत फूंक-फूंक कर कदम रख रही है। जानकारों का मानना है कि सरकारी महकमों और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के बीच समन्वय की कमी के कारण ही ऐसे नीतिगत मामले अक्सर लंबे समय तक फाइलों में ही दबे रह जाते हैं।
हड़ताल से आम जनता की जेब और सेवाओं पर पड़ेगा सीधा असर
बैंक कर्मचारियों की इस आगामी तीन-दिवसीय हड़ताल से देश के आम नागरिकों की मुश्किलें बढ़ना तय माना जा रहा है। यदि बैंक लगातार तीन दिन बंद रहते हैं, तो कैश निकासी, चेक क्लीयरेंस, लोन प्रोसेसिंग और नए खाते खोलने जैसे तमाम जरूरी काम पूरी तरह से ठप हो जाएंगे। हालांकि, आज के डिजिटल युग में यूपीआई (UPI), मोबाइल बैंकिंग और एटीएम सेवाएं चालू रहने की उम्मीद है, लेकिन बड़े व्यावसायिक लेनदेन और बैंक शाखाओं से जुड़े काम प्रभावित होना लाजिमी है।
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि सरकार और बैंक यूनियनों को आम जनता की परेशानियों को ध्यान में रखते हुए जल्द से जल्द बातचीत की मेज पर बैठना चाहिए। वित्त मंत्री पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि डिजिटल ट्रांजैक्शन पर लगने वाले मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) या अन्य शुल्कों को लेकर सरकार पूरी तरह पारदर्शी रुख अपना रही है, ताकि आम जनता पर किसी तरह का अतिरिक्त बोझ न पड़े। ऐसे में देखना यह होगा कि क्या सरकार और बैंक कर्मचारी इस गतिरोध को खत्म करने के लिए कोई बीच का रास्ता निकाल पाते हैं या फिर आने वाले दिनों में देश को एक लंबी हड़ताल का सामना करना पड़ेगा।
"हमने बैंकों के लिए पांच दिन काम करने का कभी वादा नहीं किया। यह बातचीत का मुद्दा रहा ही नहीं। इस पर कोई समझौता नहीं हुआ और न ही इस पर चर्चा हुई। यह मांग यूनियनों ने एकतरफा उठाई थी।" — वित्त मंत्रालय के वरिष्ठ सूत्र







